शनिवार, 1 नवंबर 2025

नए राज्य: विकास, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ

बहु भाषा बोली, विविध संस्कृति, खानपान, क्षेत्रीय ढांचा, विशाल क्षेत्रफल से परिपूर्ण हमारा देश अपनी प्रशासनिक और क्षेत्रीय जटिलताओं के कारण हमेशा से ही दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही देश में नए राज्यों के गठन की मांग उठती रही है और तत्कालीन सरकारों ने समय समय पर क्षेत्रीय, भाषाई और विकास की जरूरत के आधार पर इन मांगों को पूरा भी किया है।  

 यदि हाल के वर्षों की बात करें तो वर्ष 2000 में एक साथ तीन राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के गठन ने भारत के संघीय ढांचे में एक नया अध्याय जोड़ दिया था। ये तीनों राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुके हैं और इस अवधि में इन्होंने विकास, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। 

हालांकि, नए राज्यों के गठन के साथ देश में प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि, संसाधनों के बंटवारे की चुनौतियाँ और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं लेकिन इन राज्यों की विकास यात्रा ने कई नए राज्यों की उम्मीदों को भी जन्म दिया है। भविष्य में नए राज्यों के गठन के फायदे और नुकसान पर बात करने से पहले हम छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड की 25 वर्षों की यात्रा पर संक्षेप में नजर डालना जरूरी है ।

 जैसा कि हम सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ का गठन वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से एक हिस्से को अलग करके किया गया था। यह राज्य प्राकृतिक संपदा और आदिवासी संस्कृति का अनमोल खजाना है। इन 25 वर्षों में राज्य ने औद्योगिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की। खनिज संसाधनों से समृद्ध छत्तीसगढ़ ने इस्पात, सीमेंट और ऊर्जा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। रायपुर और भिलाई जैसे शहर औद्योगिक विकास के केंद्र बने, जबकि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत ने पर्यटन को बढ़ावा दिया।राज्य सरकार ने ग्रामीण विकास और आदिवासी कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। 

'नरवा, गरवा, घुरवा, बारी' जैसी योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त किया, वहीं जैविक खेती और हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदायों को रोजगार मिला। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सुधार हुआ, जिससे साक्षरता दर और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुईं।हालांकि, नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती रहा, जिसने कई क्षेत्रों में विकास को प्रभावित किया। बुनियादी ढाँचे की कमी और ग्रामीण-शहरी असमानता भी प्रगति में बाधक रही। पर्यावरण संरक्षण और खनन के बीच संतुलन बनाना भी एक जटिल मुद्दा है।

इन चुनौतियों के बावजूद, छत्तीसगढ़ ने अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा का उपयोग कर विकास की राह पर कदम बढ़ाए। अब नक्सलवाद पर मजबूत नियंत्रण, सतत विकास और समावेशी नीतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ भारत के विकसित राज्यों में शुमार हो रहा है। हिमालय की गोद में बसा एक खूबसूरत सा राज्य उत्तराखंड भी वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आया था। इन 25 वर्षों में उत्तराखंड ने विकास, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देहरादून, राज्य की राजधानी, एक प्रमुख शैक्षिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरी, जबकि हरिद्वार और ऋषिकेश आध्यात्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुए।

 चारधाम यात्रा ने न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दी। राज्य ने ऊर्जा क्षेत्र में विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से भी कदम बढ़ाए हैं। टिहरी बांध इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, आयुष और जैविक खेती को बढ़ावा देकर उत्तराखंड ने नवाचार की दिशा में प्रगति की। शिक्षा के क्षेत्र में, आईआईटी रुड़की और अन्य संस्थानों ने राज्य को तकनीकी शिक्षा का केंद्र बनाया है। हालांकि, प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूस्खलन और बाढ़ ने विकास में जरूर कुछ बाधाएँ डालीं। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और पलायन भी चिंता का विषय है। 

फिर भी, उत्तराखंड ने अपनी सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और विकास की संभावनाओं के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है।   वनांचल के नाम से मशहूर झारखंड 15 नवंबर 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था और इसकी 25 वर्षीय विकास यात्रा गौरव, चुनौतियों और संभावनाओं का संगम रही है। प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों से समृद्ध इस राज्य ने अपनी स्थापना के बाद से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। 

शुरुआती वर्षों में, झारखंड ने खनन और औद्योगिक विकास पर खास ध्यान केंद्रित किया। टाटा स्टील और सेल जैसे उद्योगों ने राज्य को औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। हाल के दशकों में, रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचारों में प्रगति की। झारखंड ने बुनियादी ढांचे में निवेश किया, जिसमें सड़कें, रेलवे और बिजली उत्पादन शामिल हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को जोड़ने का काम किया है। राज्य में सामाजिक क्षेत्र में, आदिवासी समुदायों के कल्याण के लिए योजनाएं शुरू की गईं हैं। 

शिक्षा के क्षेत्र में बिरसा मुंडा विश्वविद्यालय और आईआईटी (आईएसएम) धनबाद जैसे संस्थानों ने युवाओं को सशक्त बनाया। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, नक्सलवाद, गरीबी और बेरोजगारी जैसी कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। फिर भी, झारखंड की सांस्कृतिक समृद्धि, आदिवासी कला और पर्यटन स्थल जैसे बेतला और दस्सम फॉल्स इसे वैश्विक मंच पर आकर्षक बनाते हैं। आने वाले वर्षों में, नवीकरणीय ऊर्जा, स्टार्टअप्स और कौशल विकास पर ध्यान देकर झारखंड समृद्धि की नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

 नए राज्यों का गठन क्यों है जरूरी:

 भारत में नए राज्यों के गठन का इतिहास पुराना है। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद से, भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक आधार पर कई राज्यों का निर्माण हुआ। छोटे राज्यों के गठन के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं मसलन: 

प्रशासनिक दक्षता: बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ और संसाधनों का असमान वितरण आम समस्याएँ हैं। छोटे राज्य स्थानीय समस्याओं पर अधिक ध्यान दे सकते हैं और शासन को जनता के करीब ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासी समुदायों की समस्याओं पर केंद्रित नीतियाँ बनाई गईं, जो बड़े राज्यों में संभव नहीं था।

 क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण: कई क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के आधार पर अलग राज्य की माँग करते हैं। यह न केवल उनकी संस्कृति को संरक्षित करता है, बल्कि उन्हें स्वशासन का अवसर भी देता है। उत्तराखंड इसका एक उत्तम उदाहरण है, जहाँ पहाड़ी संस्कृति और भाषा को बढ़ावा मिला। 

आर्थिक विकास: छोटे राज्य अपनी विशिष्ट संसाधनों और संभावनाओं का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का उपयोग करके औद्योगिक विकास को गति दी। 

राजनीतिक सशक्तिकरण: छोटे राज्य स्थानीय नेतृत्व को उभरने का अवसर देते हैं, जिससे राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है। यह विशेष रूप से उपेक्षित क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। 

नए राज्यों के गठन की चुनौतियाँ  

नए राज्यों के गठन के कई लाभ हैं, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं जैसे: 

प्रशासनिक खर्च में वृद्धि: नए राज्यों के गठन से नई राजधानियाँ, सचिवालय, विधानसभाएँ और अन्य प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता होती है। यह केंद्र और राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में देहरादून को राजधानी बनाने,छत्तीसगढ़ में नया रायपुर बसाने और नई प्रशासनिक संरचनाएँ विकसित करने में भारी लागत आई। आंध्रप्रदेश भी अपनी नई राजधानी के निर्माण पर आ रहे भारी खर्च को लेकर ऊहापोह में है। 

संसाधनों का बँटवारा: नए और पुराने राज्यों के बीच जल, बिजली, खनिज और अन्य संसाधनों के बँटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीच जल संसाधनों को लेकर कई बार तनाव देखा गया। क्षेत्रीय असंतुलन: नए राज्यों के गठन से कुछ क्षेत्रों में विकास तेजी से होता है, जबकि अन्य क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। यह असमानता सामाजिक और आर्थिक तनाव को बढ़ा सकती है।

 राजनीतिक अस्थिरता: नए राज्यों की माँग कभी-कभी अलगाववादी आंदोलनों को हवा दे सकती है। तेलंगाना के गठन के बाद विदर्भ, गोरखालैंड और बोडोलैंड जैसे क्षेत्रों में भी अलग राज्य की माँग तेज हुई। 

प्रशासनिक क्षमता की कमी: नए राज्यों में प्रशासनिक ढाँचे को स्थापित करने और कुशल अधिकारियों की नियुक्ति में समय लगता है, जिससे शुरुआती वर्षों में शासन प्रभावित हो सकता है। 

इन सभी विषयों के विश्लेषण के बाद हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या भारत को और नए राज्यों की आवश्यकता है? इसका कारण यह है कि भारत की जनसंख्या, भौगोलिक विविधता और सांस्कृतिक बहुलता को देखते हुए नए राज्यों की माँग समय-समय पर उठती रहती है। वर्तमान में विदर्भ (महाराष्ट्र), गोरखालैंड (पश्चिम बंगाल), बोडोलैंड (असम), बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) और सौराष्ट्र (गुजरात) जैसे क्षेत्रों में अलग राज्य की माँग तेजी पकड़ रही है। मसलन यह तर्क दिया जा है कि विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र लंबे समय से उपेक्षित हैं। अलग राज्य बनने से इन क्षेत्रों में केंद्रित विकास संभव हो सकता है। वहीं, गोरखालैंड के पक्ष में यह बात कही जा रही है कि इस क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करने के लिए अलग राज्य जरूरी है। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ हैं। इसे छोटे राज्यों में विभाजित करने से शासन अधिक प्रभावी हो सकता है। 

वहीं, नए राज्यों के गठन का विरोध करने वालों का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए नए राज्यों का निर्माण महँगा सौदा है। मौजूदा आर्थिक स्थिति में यह बोझ और बढ़ सकता है और आर्थिक संतुलन गड़बड़ा जाएगा। इसके साथ साथ नए राज्य राष्ट्रीय एकता को भी प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि अधिक राज्यों के गठन से क्षेत्रीयता की भावना बढ़ सकती है। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नए राज्य बनने से विकास की गारंटी नहीं होती। झारखंड इसका उदाहरण है, जहाँ खनिज संपदा के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी की स्थिति में आशानुरूप सुधार नहीं आ पाया है । 

 कुल मिलाकर नए राज्यों के गठन का निर्णय लेते समय आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता,प्रशासनिक क्षमता, राष्ट्रीय हित जैसे तमाम बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नए राज्यों के गठन के स्थान पर सरकारें कई अन्य विकल्पों पर काम कर सकती हैं मसलन केंद्र और राज्य सरकारें मौजूदा राज्यों में ही क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए विशेष क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण स्थापित कर सकती हैं जो बिना नए राज्य गठन के इन क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। 

छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के 25 वर्षों की यात्रा से यह साबित हुआ है कि नए राज्यों का गठन विकास और स्थानीय शासन को तो बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी आती हैं।  इसलिए भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में नए राज्यों के गठन का निर्णय सावधानीपूर्वक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ लिया जाना चाहिए। 

70 साल बाद भी 'यंग' है आकाशवाणी का भोपाल केंद्र..!!


मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के सबसे खूबसूरत और वीवीआईपी इलाके श्यामला हिल्स में बने आकाशवाणी केंद्र में बारिश के बाद हल्की ठंडक है। सुबह सुबह स्टूडियो में मानस गान के बाद संगीत की स्वर लहरी बह रही है, जबकि पास ही न्यूज रीडर प्रदेश भर के श्रोताओं को लाइव ताजातरीन खबरें सुनाने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। बाहर पार्किंग में आकाशवाणी से जुड़े स्टाफ की आवा जाही शुरू हो गई है और यहां के शांत वातावरण में कारों के हॉर्न की आवाजें गूंज रही हैं। आज यह केंद्र अपना 70 वां स्थापना दिवस मना रहा है, लेकिन उत्साह और युवा ऊर्जा से लबरेज इस केंद्र को देखकर लगता है जैसे यह कल ही शुरू हुआ हो। 

सात दशक पहले, 1956 में 31 अक्टूबर को और मध्यप्रदेश के बनने से महज एक दिन पहले भोपाल के काशाना बंगले में स्थापित यह केंद्र आज भी शिक्षा, मनोरंजन, सूचना' के मंत्र को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि 70 साल बाद भी, यह केंद्र युवा ही लगता है। आकाशवाणी भोपाल का सफर भारत के रेडियो इतिहास से जुड़ा है। 1927 में मुंबई और कोलकाता में निजी ट्रांसमीटरों से रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई, लेकिन 1936 में इसे 'ऑल इंडिया रेडियो' नाम मिला और 1957 में आज का स्थाई नाम 'आकाशवाणी' । 

 भोपाल में रेडियो केंद्र खोलने का उद्देश्य आम लोगों खासकर ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच, किसानों को मौसम की जानकारी, और युवाओं तक संगीत की पहुंच आसान बनाना था। एफएम और मीडियम वेव पर चलने वाला यह स्टेशन आज मध्य भारत के दिल की धड़कन है। आकाशवाणी भोपाल ने न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच दिया बल्कि लोकगीतों से लेकर हिंदी कविताओं तक मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का रखवाला भी बना।

70 साल का यह सफर आसान नहीं था। चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो या 1971 का भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध हो या फिर कोई अन्य सैन्य संघर्ष आकाशवाणी भोपाल ने मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाकर उनका और उनके परिवारों का हौंसला बुलंद किया । वहीं, भोपाल ही क्या देश के सबसे काले अध्याय 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान आकाशवाणी भोपाल के स्टाफ ने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए निरंतर राहत सूचनाओं का प्रसारण किया। अस्पतालों के पते, उपलब्ध सुविधाओं, सरकारी सहायता केंद्रों की सूचना, दवाओं की जानकारी और सरकारी मदद से जुड़ी खबरों एवं जानकारियों के जरिए यह केंद्र पीड़ित परिवारों की उम्मीद की किरण बन गया।

आज आकाशवाणी भोपाल सिर्फ रेडियो नहीं, एक डिजिटल हब है। फेसबुक जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भरपूर फॉलोअर्स और व्यूज के साथ यह युवा पीढ़ी का भी चहेता बन गया है।  अपने करीब 17 घंटे प्रतिदिन के प्रसारण में ‘नमस्कार भोपाल' से लेकर 'महिला मंच' तक, ‘युववाणी’ से लेकर ‘ग्राम सभा और बुंदेली समाचारों’ तक अपने विविध कार्यक्रमों के जरिए आकाशवाणी भोपाल ने खुद को हर वर्ग के साथ जोड़ लिया है। तभी तो एक बुजुर्ग श्रोता कहते हैं कि "रेडियो ने मुझे जवानी दी और आज भी मेरी शामें सजाता है।" वहीं, युवाओं की कार में विविध भारती की गूंज इसे नई पीढ़ी से जोड़ रही है। इसी तरह, स्टूडियो में काम करने वाले युवा कलाकारों और फ्रेश आवाज से यहां पारंपरिक गरिमा के बीच प्रसारण की नई कहानियां लिखी जा रही हैं।

आज 70 साल बाद भी, आकाशवाणी भोपाल का प्रसारण युवा सा और नया सा लगता है क्योंकि यह बिना अपनी जड़ें छोड़े समय के साथ खुद को बदलता रहा है । रेडियो सेट से डीटीएच, फिर मोबाइल फोन और कार के भीतर घुसपैठ कर आकाशवाणी भोपाल ने प्राइवेट एफएम चैनलों की चमक-दमक के बीच अपनी सार्वजनिक सेवा और ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की पहचान कायम रखी है। आने वाले वर्षों में, नवाचार, डिजिटलीकरण, 5G इंटीग्रेशन और ज्यादा लोकल कंटेंट से यह केंद्र लगातार अपनी प्रतिष्ठा में चार चांद लगाता रहेगा। 

और अंत में,  "ये आकाशवाणी भोपाल है..." आवाज भले ही तरंगों के माध्यम से आकाश से आती है, लेकिन निकलती सीधे दिल से है और उतरती भी सीधे दिल में ही है। अपने सतत् विकास,बदलाव और इंद्रधनुषी कार्यक्रमों से आकाशवाणी भोपाल केंद्र ने यह साबित कर दिया है कि उम्र सिर्फ संख्या है, जज्बा हमेशा जवान रहता है..तो सुनते रहिए आकाशवाणी, क्योंकि कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं।

#आकाशवाणी #रेडियो #radio आकाशवाणी भोपाल @highlight Rajesh Vanjani Rajesh Bhat #भोपाल #bhopal #MadhyaPradesh

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

8 हजार फीट ऊंचे शिखर पर 108 फीट के हनुमान…अद्भुत!!

हिमाचल प्रदेश में ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ शिमला के सबसे लोकप्रिय स्थान मॉल रोड पहुंचते ही दूर पर्वत की चोटी पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा बरबस ही सभी का ध्यान खींच लेती है। इस प्रतिमा और बादलों की आंख मिचौली से शिमला के बदलते मौसम का अंदाजा भी लगता रहता है क्योंकि कभी यह प्रतिमा बादलों में छिपकर अदृश्य हो जाती है तो कभी सूर्य की किरणें को आत्मसात कर दिव्यता से चमकने लगती है। 

यह प्रतिमा इस तरीके से स्थापित की गई है कि मॉल रोड से लेकर इसके आसपास के कई इलाकों से आप हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं और अब यह मॉल रोड के एक प्रमुख आकर्षणों में से एक है। इस पहाड़ को जाखू हिल्स और हनुमान जी को ‘शिमला के रक्षक’ कहा जाता है। आख़िर, हनुमान चालीसा में ऐसे ही थोड़ी लिखा गया है..’तुम रक्षक काहू से डरना।’

जाखू वाले हनुमान जी केवल एक मंदिर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यहां की गाथा रामायण काल से जुड़ी है और यह अकाट्य आस्था का स्थान है। शिमला की ऊंची चोटियों के बीच, समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह जाखू मंदिर आस्था, प्रकृति और रोमांच का एक अद्भुत संगम है एवं शिमला के 'ताज' से कम नहीं  है।

मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के दौरान युद्ध में मेघनाद द्वारा शक्ति बाण चलाने से मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय की और जा रहे थे तो अचानक उनकी दृष्टि जाखू पर्वत पर तपस्या लीन यक्ष ऋषि पर पड़ी। संजीवनी बूटी का परिचय जानने के लिए हनुमान जी यहां पर उतर गए।  बताया जाता है कि उनके वेग से जाखू पर्वत जो पहले काफी उँचा था, आधा पृथ्वी के गर्भ में समा गया। बूटी का परिचय प्राप्त करने के उपरान्त हनुमान  द्रोण पर्वत की और चले गए। 

जाखू पर्वत पर जिस स्थान पर हनुमान जी उतरे थे वहां पर आज भी उनके चरण चिन्हों को संगमरमर से निर्मित करके सुरक्षित रखा गया है। 

हनुमान ने ऋषि यक्ष को वापसी में इसी स्थान पर उनसे मिलते हुए लौटने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा के दौरान हनुमान को मार्ग में कालनेमी राक्षस के कुचक्र सहित कई बाधाओं को पार करना पड़ा और समय अधिक लग गया। 

तब हनुमान समय पर संजीवनी बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने के लिए इस रास्ते की बजाए दूसरे छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए लंका चले गए। जाखू हिल्स पर अन्न जल त्यागकर हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे ऋषि यक्ष की व्याकुलता बढ़ने लगी। उनकी व्याकुलता देख हनुमान जी ने ऋषि को दर्शन दिए और न आने का कारण बताया। उनके अंतर्ध्यान होने के तुरन्त बाद यहां बजरंग बली की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई जो आज भी मन्दिर में पूजी जाती है। यक्ष ऋषि ने ही हनुमान जी के यहां ठहराव की स्मृति में इस मन्दिर का निर्माण किया। ऋषि 'यक्ष' के नाम पर ही पर्वत का नाम पहले 'यक्ष' था, जो समय के साथ बदलते हुए 'याक', फिर 'याखू' और अंत में 'जाखू' बन गया।

जाखू मंदिर का अब सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फीट ऊँची सिंदूरी प्रतिमा है । वर्ष 2010 में स्थापित यह मूर्ति इतनी विशाल है कि इसे शिमला के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है। हनुमान जी की इस मूर्ति का निर्माण बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नन्दा और दामाद निखिल नन्दा ने करवाया है। साल 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इस उद्घाटन किया था. इस दौरान मौके पर अभिनेता और श्वेता के भाई अभिषेक बच्चन भी मौजूद थे। यह प्रतिमा शहर की पहचान बन चुकी है और इसे 'प्राइड ऑफ शिमला' भी कहा जाता है। 2025 में यहां विशाल ध्वज भी स्थापित कर दिया गया है। 

जाखू मंदिर तक पहुँचना भी अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। पर्यटक मॉल रोड के रिज मैदान से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल या टैक्सी का उपयोग कर सकते हैं। पैदल रास्ता घने देवदार के जंगल से होकर गुज़रता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। वहीं संकरे पहाड़ी कच्चे-पक्के मार्ग पर टैक्सी की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। वहीं, जो पर्यटक खड़ी चढ़ाई से बचना चाहते हैं उनके लिए जाखू रोपवे एक बेहतरीन विकल्प है। रिज मैदान से शुरू होकर यह रोपवे कुछ ही मिनटों में सीधे मंदिर परिसर तक पहुँचा देता है, साथ ही शिमला शहर के मनमोहक नज़ारे भी दिखाता है।

जाखू पहाड़ी की चोटी से शिमला शहर, आसपास की चोटियों और घाटियों का मनोरम और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। कुल मिलाकर जाखू मंदिर केवल पत्थर और मूर्तियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह सिद्ध स्थान है जहाँ देवत्व और प्रकृति का मिलन होता है इसलिए शिमला की यात्रा जाखू हनुमान के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

क्या है शिमला का इटली से प्राकृतिक कनेक्शन..!!

क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के बारे में यह तो सभी को पता है कि अंग्रेजों ने अपने आराम के लिए इस स्थान को सजाया संवारा था लेकिन यहां इटेलियन कनेक्शन भी है। अंग्रेजों ने भले ही इसे सत्ता प्रतिष्ठान का केंद्र बनाया था और यहां की वादियों से देश दुनिया को रूबरू कराया लेकिन अन्य देशों के लोग भी शिमला के कैनवास को अपने रंगों से रंगने में पीछे नहीं रहे हैं। इसी शृंखला में एक बेहतरीन स्थान है - क्रेग्नानो नेचर पार्क। 

क्रेग्नानो नेचर पार्क प्रकृति के चितेरो के लिए एक ऐसा कैनवास है जिसपर वे अपनी कलात्मकता से नए नए रंग भर सकते हैं, मनमाफिक पटकथा लिख सकते हैं और सुकून और सेहत के खुशनुमा पल गुजार सकते हैं। देवदार, चीड़ और चिनार के पत्तों के बीच से झांकती सूरज की नटखट किरणें हो या खूबसूरत फूलों पर अठखेलियां करती रंग बिरंगी तितलियां या पक्षियों के कलरव से उपजा दिलकश संगीत..या फिर अनोखी दिल को छू लेने वाली शांति। यहां आकर आपको प्रकृति से निकटता का अनूठा अनुभव होता है।  


शिमला से मशोबरा की ओर तथा लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस क्रैग्नानो नेचर पार्क तक महज 40 मिनट की हरीभरी और ऊंचे देवदार की छत्रछाया में ड्राइव आपको इस मामूली सी दूरी का भी अहसास नहीं होने देती।   मशोबरा में 7,700 फीट की ऊँचाई पर करीब 9.6 हेक्टेयर में फैला यह क्रैग्नानो  पार्क हरी-भरी वादियों में बसा एक ऐसा स्वर्ग है, जहाँ पहाड़ों की ठंडी हवा, घने जंगलों की सिहरन और इतालवी शैली का ऐतिहासिक आकर्षण एक साथ मिल जाते हैं।


 यहां से हिमालय की चोटियाँ बादलों को छूती नजर आती हैं। यह जगह मूल रूप से 19 वीं सदी में इतालवी व्यवसाई और फोटोग्राफर चेवालियर फ्रेडरिको पेलिटी द्वारा बनाई गई थी, जिन्होंने इसे अपने जन्मस्थान क्रैग्नानो (इटली) के नाम पर बसाया था। इस पार्क की खूबसूरती इतनी विविध और मोहक है कि हर मौसम में यह नया रंग-रूप धारण कर लेता है। वसंत और ग्रीष्म में पार्क रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है एवं लाल, पीले और गुलाबी फूलों की चादर यहां बिछी रहती है तो शरद ऋतु में पेड़ सोने-चाँदी के रंगों से जगमगा उठते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर इस जगह को एक परी लोक जैसा बना देती है। 

यहाँ देवदार, ओक और पाइन के घने जंगल हैं, जिनके बीच से बहती ठंडी ताजी हवा जीवन को नए अहसास और मन को शांति से भर देती है। यहाँ तीन ट्रेल्स (रास्ते) हैं – पाइन ट्रेल, ओक ट्रेल और एकेडमी ट्रेल – जो पैदल चलने वालों के लिए अनूठा अनुभव देते हैं। इन रास्तों पर चलते हुए आप तितलियों के झुंड, रंगीन फूलों और शांत वादियों का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहाँ बने ट्री हाउस में पहुँचकर आप शहर की भागदौड़ भूलकर प्रकृति की गोद में सुकून से आराम कर सकते हैं। 

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का..!!

फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्ति/परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?  हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। 

जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।  दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? 

इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।   बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। 

दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं। हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों। 

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी  स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और  2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।   

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं ।   

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।  

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

‘मन की बात’ कैसे बनी जन जन की बात..!!

रविवार को सुबह 11 बजे आकाशवाणी और दूरदर्शन से लेकर विभिन्न संचार माध्यमों पर गूंजने वाली आवाज ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ अब न केवल मासिक मंत्र बन गई है बल्कि जन संवाद की पहचान भी है। इसे हम सभी मन की बात कार्यक्रम के नाम से जानते हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के साथ अराजनीतिक और प्रेरक संवाद करते हैं। 3 अक्टूबर को इस कार्यक्रम की 11वीं वर्षगांठ है। दरअसल श्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के करीब 5 महीने बाद बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व विजयादशमी के दिन 3 अक्टूबर 2014 को अपने इस सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ की शुरुआत की थी। आज यह कार्यक्रम महीने के आखिरी रविवार की पहचान और एक अनिवार्य जरूरत बन गया है।

इस कार्यक्रम को रेडियो माध्यम को नया जन्म देने की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। खास तौर पर जब दुनिया संचार के नए युग के विभिन्न प्लेटफॉर्म के पीछे भाग रही हो तब किसी राष्ट्र प्रमुख द्वारा पारंपरिक और केवल आवाज़ पर केंद्रित माध्यम पर विश्वास जताना वाकई प्रशंसनीय एवं अचरज भरा प्रयास था लेकिन आज मन की बात कार्यक्रम के सवा सौ एपिसोड पूरे हो जाने के बाद हम कह सकते हैं कि श्री मोदी ने रेडियो का चयन कर जमीनी स्तर तक संवाद कायम करने की जो शुरुआत की थी वह आज सफलता का नया इतिहास रच रही है।

मन की बात कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री ने आम जनता के साथ सहज तरीके से सरल भाषा में संवाद कायम किया है। आसान शब्दों में कहें तो अब यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री और आम नागरिकों के बीच सीधे संवाद का एक मजबूत सेतु बन चुका है।  मन की बात कार्यक्रम ने 30 अप्रैल 2023 को 100 एपिसोड का सफर पूरा कर लिया था और अब यह सवा सौ एपिसोड का आंकड़ा पार कर चुका है। बीते रविवार को मन की बात के 126 वे अंक का प्रसारण हुआ। हालांकि, देश में आम चुनाव के मद्देनजर चुनावी आचार संहिता के कारण 2019 में मार्च, अप्रैल और मई माह में यह कार्यक्रम प्रसारित नहीं हुआ था।

मन की बात कार्यक्रम से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके पहले एपिसोड का प्रसारण शुक्रवार के दिन हुआ था तब से लेकर मार्च 2015 तक इसका प्रसारण हर महीने शुक्रवार को ही होता था लेकिन अप्रैल 2015 से इसके प्रसारण का दिन बदल दिया गया और फिर यह हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने लगा। एक अन्य मजेदार बात यह है कि पहला एपिसोड करीब 14 मिनट का था जबकि नवंबर 2014 में प्रसारित दूसरा एपिसोड 19 मिनट का और तीसरा एपिसोड 26 मिनट अवधि का था। हालांकि चौथे एपिसोड से इसकी अवधि 30 मिनट तय कर दी गई और तब से अब तक यह प्रतिमाह 30 मिनट की अवधि में ही प्रसारित होता है। आकाशवाणी पर यह कार्यक्रम 22 भारतीय भाषाओं, 29 बोलियों और 11 विदेशी भाषा में प्रसारित होता है। इसके अलावा दूरदर्शन तथा अन्य निजी समाचार चैनलों, यूट्यूब और कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी इस कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है।

 मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक करीब 1000 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, प्रेरित करने वाली शख्सियतों और संगठनों का उल्लेख कर चुके हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व के कारण मन की बात कार्यक्रम अब सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात नहीं रह गया है बल्कि यह करोड़ों भारतीय लोगों के मन की बात बन चुका है ।

मन की बात के सौवें एपिसोड के पहले भारतीय प्रबंध संस्थान, रोहतक द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मन की बात के बारे में लगभग 96 प्रतिशत लोग जानते हैं और यह कार्यक्रम 100 करोड़ लोगों तक पहुँच चुका है। इतना ही नहीं, 23 करोड़ लोग नियमित रूप से यह कार्यक्रम देखते/सुनते हैं, जबकि अन्य 41 करोड़ लोग कभी कभी इस कार्यक्रम से जुड़ते हैं। इस कार्यक्रम ने अब तक करीब 35 करोड़ रुपए का राजस्व भी अर्जित किया है। अब सवा सौ एपिसोड का सफर तय कर यह कार्यक्रम सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहा है।

मन की बात परस्पर संवाद का मंच इसलिए भी बन गया है क्योंकि आम लोग इस कार्यक्रम के संबंध में न केवल प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं बल्कि अपने रिकॉर्ड किए गए संदेश भी भेजते हैं इसलिए यह दो तरफा संवाद सकारात्मक पहलुओं को सामने लाने और समाज में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बन गया है। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर नागालैंड तक और पंजाब से लेकर लक्षद्वीप तक से जुड़े मुद्दों को उठाया जाता है,वहां की समस्याओं पर बातचीत होती है और जनसहयोग से उनके समाधान पर भी बात होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वच्छता अभियान है । प्रधानमंत्री ने मन की बात के पहले एपिसोड में ही स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की अपील की थी और अब करीब 10 साल बाद देश स्वच्छता में किन बुलंदियों पर है, यह किसी से छिपा नहीं है। 

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने जुलाई 2022 में घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने की अपील की थी और कभी आयात पर निर्भर मृतप्राय भारतीय खिलौना उद्योग अब लगभग 3000 करोड रुपए के निर्यात का आंकड़ा हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने खादी के वस्त्र खरीदने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने जैसी कई मुहिम इस कार्यक्रम के जरिए शुरू की और आज ये सभी क्षेत्र विकास की रफ़्तार पर सवार हैं ।

विशेषज्ञों का मानना है कि मन की बात कार्यक्रम के लोकप्रिय होने की वजह इसका पारिवारिक शैली में संवाद है और यह बचपन में दादी नानी से सुनी गई कहानियों की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरल, सहज और व्यक्तिगत संवाद शैली लोगों को जोड़ती है। वे आम लोगों की भाषा में बात करते हैं, जिससे श्रोता अपनेपन का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं,पत्रों या MyGov प्लेटफॉर्म के माध्यम से आम लोगों की कहानियों और सुझावों को शामिल करना इसे जन-आधारित बनाता है। यह कार्यक्रम हमें अपने त्योहार, संस्कृति, परंपराओं, समुदाय और परिवेश से जोड़ने में भी मदद करता है। 

मन की बात एआई और मशीन लर्निंग के दौर में पारंपरिक संचार माध्यम के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है जो चुपचाप सामाजिक क्रांति का जरिया भी बन गया है। सेल्फी विद डॉटर, देश के गुमनाम नायकों का गौरवपूर्ण स्मरण, पर्यावरण संरक्षण, वोकल फॉर लोकल,एक पेड़ मां के नाम, कुपोषण से मुक्ति और जल शक्ति अभियान जैसे कई उदाहरण है जिन्हें इस कार्यक्रम के जरिए न केवल राष्ट्रव्यापी सफलता मिली है बल्कि उन्होंने देश की सूरत और सीरत बदलने का काम किया है।


कुल मिलाकर यह कार्यक्रम प्रेरणादायक और सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और लोगों को अच्छा करने के लिए प्रेरित एवं उत्साहित करता है। यही वजह है कि मन की बात भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय हो रहा है। यह हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील का सामूहिक रूप से पालन करें और देश को विकास,बदलाव और सकारात्मक सोच के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर रखने में कोई कसर नहीं छोड़े।

#Mannkibaat #NarendraModi #Radio #Akashvani

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

शिव और प्रकृति का मेल है डमरू घाटी

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के  गाडरवारा शहर के करीब स्थित डमरू घाटी एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण भक्तों के मन को मोह लेता है। यह घाटी शक्कर नदी के तट पर स्थित है, जो नर्मदा की सहायक नदियों में से एक है। 

घाटी का आकार भगवान शिव के डमरू के समान होने के कारण इसका नाम 'डमरू घाटी' पड़ा है। यहाँ की शांत वादियाँ और हरे-भरे पेड़ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करते हैं। गाडरवारा पहले से ही आचार्य रजनीश (ओशो) के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर का उद्घाटन 1980 के दशक में हुआ, और तब से यह शिवभक्तों का प्रमुख केंद्र बन गया है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका विशाल शिवलिंग, जो मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है। यह शिवलिंग लगभग 20-21 फुट ऊँचा है। 

डमरू घाटी का वातावरण इतना शांतिपूर्ण है कि आने वाला हर यात्री मन की शांति का अनुभव करता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 

डमरू घाटी न केवल एक मंदिर है, बल्कि भक्ति, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति का जीवंत चित्रण है। यदि आप मध्य प्रदेश की यात्रा पर हैं, तो यहाँ शिव के दर्शन अवश्य करें । यह जबलपुर-भोपाल मार्ग पर कुछ वक्त गुजारने के लिए बेहतरीन स्थान है।


केवल गंभीर नहीं, विनोदप्रिय भी थे बापू

आज 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन है। आज अगर बापू हमारे बीच होते तो वे 156 साल के होते लेकिन कहते हैं न कि उम्र बड़ी नहीं होनी चाहिए बल्कि जीवन में किए गए कार्य बड़े होने चाहिए और यह बात मोहनदास करमचंद गांधी पर सौ फीसदी लागू होती है। महात्मा गांधी अपने कार्यों, आदर्शों, विचारों, सिद्धांतों और जीवन के उदाहरणों से इतना ऊंचा दर्जा रखते हैं कि देश क्या, दुनिया में उनकी बराबरी का कोई और शख्स नहीं दिखता। आमतौर पर गांधीजी जी की छवि को गंभीर, अत्यधिक अनुशासित और नीरस आंका जाता है लेकिन असलियत यह है कि गांधीजी विनोदप्रियता और हंसी मजाक में किसी से कम नहीं थे लेकिन गांधीजी की विनोदप्रियता में सबसे बड़ा अंतर यह था कि महात्मा गांधी का हास्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि उसमें हमेशा गहरा संदेश छिपा होता था।

हम यह कह सकते हैं कि महात्मा गांधी का व्यक्तित्व जितना गंभीर, त्यागपूर्ण और आदर्शवादी था, उतना ही सहज और विनोदी भी था। उनका हास्य-बोध भी उनके अन्य कार्यों की तरह असाधारण था। अपनी विनोदप्रियता के कारण ही वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सहज भाव बनाए रखते थे । 

गांधीजी अक्सर अपने बारे में ही मजाक करते थे, जो उनकी विनम्रता को दर्शाता है । एक बार, जब किसी ने उनकी पतली काया का मजाक उड़ाया तो गांधीजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, लेकिन मेरी आत्मा में ताकत है। एक अन्य मौके पर, जब किसी ने उनकी सख्त दिनचर्या और कम खाने की आदत पर टिप्पणी की, तो उन्होंने मजाक में कहा कि मैं अपने पेट को ज्यादा काम नहीं देता, ताकि मेरा दिमाग ज्यादा काम कर सके।

इसी तरह, एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े देश का प्रतिनिधित्व करते हुए भी केवल एक धोती क्यों पहनते हैं? तो गांधीजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया कि मेरे देश के करोड़ों लोग पूरे कपड़े नहीं पहन पाते। जब वे सब पहनने लगेंगे, तब मैं भी पहन लूंगा। यह उत्तर व्यंग्य के साथ  करुणा भी जगाता है ।

बताया जाता है कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब बापू जेल में थे, तो एक जेलर ने उनसे मजाक में कहा कि गांधीजी, आप बार-बार जेल क्यों आ जाते हैं? इस पर गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि यहाँ का खाना मुझे घर से बेहतर लगता है। यह जवाब न केवल हास्यपूर्ण था, बल्कि उनकी निर्भीकता को भी दर्शाता है।

गांधीजी बच्चों के साथ विशेष रूप से विनोदप्रिय हो जाते थे। वे बच्चों के साथ मजाक करते, कहानियाँ सुनाते और उनके सवालों का जवाब हल्के-फुल्के अंदाज में देते थे। एक बार, एक बच्चे ने उनसे पूछा कि बापू, आप इतने पतले क्यों हैं? तो गांधीजी ने हँसते हुए कहा कि मैं अपनी सारी ताकत तुम जैसे बच्चों को देने के लिए बचाता हूँ।

इसी प्रकार, एक बार, जब एक ब्रिटिश पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने कम कपड़ों में लंदन की सर्दी में क्या करेंगे? तो गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि मेरे पास तो मेरे देशवासियों से ज्यादा कपड़े हैं, वे तो और भी कम पहनते हैं। यह जवाब न केवल विनोदी था, बल्कि भारत की गरीबी और ब्रिटिश शोषण की ओर भी इशारा करता था।

एक अन्य उदाहरण ऐसा भी है जिसमें भूख से भी उन्होंने हास्य पैदा कर दिया था। एक बार अनशन के दौरान किसी ने  उनसे पूछा कि बापू भूख तो नहीं लग रही? तो उन्होंने हँसकर कहा कि भूख तो लगती है, पर सोच रहा हूँ कि भूख भी कितनी सहनशील है। 

सबसे खास बात यह है कि गांधीजी की विनोदप्रियता कभी किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं होती थी। वह हास्य में व्यंग्य का सहारा लेते थे, लेकिन उसमें करुणा और आत्मीयता झलकती थी। यही कारण है कि उनका विनोद प्रेरक बन जाता था। महात्मा गांधी की विनोदप्रियता उनकी विनम्रता, बुद्धिमत्ता, और मानवता का प्रतीक थी। उनका हास्य न तो आक्रामक था और न ही अपमानजनक, बल्कि यह विचारशील, प्रेरणादायक और सकारात्मक था। यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू था, जो उन्हें न केवल एक महान नेता, बल्कि एक सहज और प्रिय इंसान बनाता था। महात्मा गांधी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गंभीरता और विनोद साथ-साथ चल सकते हैं और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।


रविवार, 28 सितंबर 2025

जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों का खजाना है ‘थैंक यू यारा’

‘थैंक यू यार’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जिसमें दस भावनात्मक और संवेदनशील कहानियाँ शामिल हैं, जो हमारे आसपास की रोज़मर्रा की जिंदगी, मानवीय रिश्तों और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से उकेरती हैं। यह संग्रह पाठकों को भावनाओं के एक गहरे समुद्र में ले जाता है, जहाँ प्रेम, दुख, संघर्ष, और उम्मीद की बारीकियां हर कहानी में स्पष्ट रूप से झलकती हैं।

#थैंकयूयारा की कहानियाँ सामान्य लोगों के जीवन, उनके छोटे-छोटे सपनों, और रोज़मर्रा के संघर्षों को केंद्र में रखती हैं। ये कहानियाँ न केवल भावनात्मक गहराई लिए हुए हैं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों को भी उजागर करती हैं। ‘कटघरे’ से लेकर ‘यूं भी होता है’ तक संग्रह की हर कहानी एक अलग रंग और स्वाद लिए हुए है, फिर भी सभी में एक सामान्य सूत्र है—मानवीय संवेदनाओं का चित्रण और जीवन की साधारण परिस्थितियों में छिपी असाधारणता ।

‘थैंक यू यारा’ संग्रह की तमाम कहानियाँ सीधे हमारे दिल को छूती हैं। चाहे वह ‘कटघरे’ कहानी में एक शिक्षक शबनम में अपने छात्र विजय भूषण के प्रति अपने बच्चे जैसी तड़प हो, ‘दूर्वा’ में शिक्षक और छात्रा रुचिरा के बीच मार्गदर्शन की गर्माहट हो या  ‘सुर्ख गुलाब’ में युवावस्था की दहलीज पर खड़ी तीन सहेलियों के भीतर प्रेम की अनकही पीड़ा...हर कहानी में भावनाएँ जीवंत रूप में उभरती हैं। 

दस कहानियों का यह संग्रह विभिन्न विषयों को छूता है—प्रेम, दोस्ती, परिवार और सामाजिकता। प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है, फिर भी संग्रह के रूप में ये एक-दूसरे की पूरक बनकर मोतियों की माला सी बन जाती हैं।
‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ रिश्तों की विभिन्न छवियों को भी सामने लाती हैं जैसे ‘प्रार्थना’ कहानी में माँ का अपनी बेटी के लिए प्रेम है, तो ‘मावठा’ में दोस्तों के बीच अनकहा विश्वास। 

इस संग्रह की कहानियाँ आधुनिक जीवन की जटिलताओं और उससे उत्पन्न होने वाली भावनात्मक दूरी को भी दर्शाती हैं। जैसे ‘परिक्रमा’ कहानी में कला की कद्र हमें स्कूल के दिनों में पढ़ी महान कहानीकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘ठेस’ और उसके कलाकार सिरचन का स्मरण करा देती है जबकि ‘गोल्डन कर्ल’ कहानी बच्चों की मासूमियत से रूबरू कराती है। पुस्तक का शीर्षक बनी कहानी ‘थैंक यू यारा’ लेखक के मन की उथल पुथल को आत्म संवाद शैली की कहानी में पेश करती है।

आकाशवाणी भोपाल  की लोकप्रिय एनाउंसर Amita Trivedi जी ने संवेदनाओं को इतनी बारीकी से बुना है कि हम स्वतः ही किरदारों के साथ जुड़ते जाते हैं ।  ‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ हमारे आसपास की परिस्थितियों को दर्शाती हैं—चाहे वह मध्यमवर्गीय परिवारों का मानसिक संघर्ष हो, रिश्तों में विश्वास की कमी हो या समाज की छोटी-छोटी रूढ़ियों से जूझते लोग हों । ये कहानियाँ सामाजिक यथार्थ को न केवल उजागर करती हैं, बल्कि उन पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

अमिता जी की भाषा सरल, सहज, और प्रवाहमयी है। यह संग्रह आम पाठक से लेकर साहित्य प्रेमी तक सभी को आकर्षित करेगा । संवाद और वर्णन में एक आत्मीयता है, जो कहानियों को और भी प्रभावी बनाते हुए सीधे दिल से जोड़ देती हैं ।

अमिता त्रिवेदी ने कहानियों को इस तरह बुना है कि वे न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि विचारोत्तेजक भी हैं। किरदारों का चित्रण इतना जीवंत है कि वे हमारे सामने साकार हो उठते हैं। संग्रह की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी और सच्चाई है—यह न तो अतिशयोक्ति में बहता है और न ही बनावटीपन में। हर कहानी में एक ऐसी सच्चाई है, जो हमें अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों से जोड़ती है।

कुल मिलाकर ‘थैंक यू यारा’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जो न केवल पढ़ने में आनंद देता है, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे पलों की गहराई को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। यह उन पाठकों के लिए आदर्श है, जो साहित्य में भावनात्मक गहराई और सामाजिक यथार्थ की तलाश करते हैं। अमिता जी का यह पहला ही कहानी संग्रह हमें याद दिलाता है कि हमारे आसपास की साधारण सी दिखने वाली जिंदगियों में भी असाधारण कहानियाँ छिपी हुई हैं बस, उन्हें देखने और शब्दों में उकेरने की दृष्टि चाहिए । किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है  

पुस्तक: थैंक यू यारा (कहानी संग्रह)
लेखक: अमिता त्रिवेदी 
पृष्ठ: 94  मूल्य: 200 रुपए 
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर

सोमवार, 22 सितंबर 2025

हिमाचल में फलों का गोविंदा...!!

न न, यह टमाटर नहीं है और न ही तेंदू है। रंग भले ही नारंगी है परन्तु संतरा भी नहीं है। यह है हिमाचल का अमर फल या चीनी सेब…जो स्वाद और सेहत का खजाना है। फिल्मों में जैसे पहले मिथुन चक्रवर्ती और बाद में गोविंदा को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था इसी तरह इस फल को भी पहले गरीबों का सेब कहा जाता था लेकिन धीरे धीरे इसने अपने स्वाद,कीमत और सेहत से भरपूर गुणों के कारण अलग पहचान कायम कर ली है..और अब यह सेब का विकल्प बन रहा है।

स्थानीय भाषा में इसे 'जापानी फल' या 'काकी' कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros kaki है और पहली बार 1940 के दशक में शिमला के नारकंडा इलाके में इसका पदार्पण माना जाता है। 

वैसे, अपने जन्मस्थान जापान में इसका मूल नाम काकी है, जिसका अर्थ होता है देवताओं का फल। अंग्रेजी में इसे पर्सिमन (Persimmon) के नाम से जाना जाता है। इजराइल में इसे शैरॉन फ्रूट तो कुछ देशों एबेन फ्रूट कहा जाता है। हिमाचल में इसे लंबे समय तक खराब नहीं होने के कारण अमर फल और सेब से सस्ता और उसका विकल्प होने के कारण चीनी सेब भी कहा जाता है।

दूर से टमाटर की तरह दिखने वाला यह चमकीला नारंगी फल अपने भीतर शहद की मिठास समेटे है। यह अपने स्वाद से हिमाचल के किसानों के लिए न केवल आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के खजाने के रूप में भी उभर रहा है। 

देश में हिमाचल प्रदेश को वैली ऑफ फ्रूट्स कहा जाता है क्योंकि अपने पहाड़ों, ठंडी हवाओं और उपजाऊ मिट्टी के कारण यह सदियों से फलों का स्वर्ग है। यहां सेब की लालिमा से लेकर खुबानी की सुनहरी चमक तक हर मौसम में फलों की खुशबू बिखरी रहती है ।

ऐसा माना जाता है हिमाचल में फलों के राजा सेब ने अपनी यात्रा की शुरुआत ब्रिटिश काल में शुरू की थी । मौसम में बदलाव के साथ यहां की फ्रूट बास्केट में कई फल जुड़ते जा रहे हैं। यह सेब पर निर्भरता कम करने और कमाई के नए रास्ते तलाशने की कवायद भी है। शायद, यही कारण है कि जापानी फल अब शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और चंबा जिलों तक में भरपूर पैदा हो रहा है । 

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल फल उत्पादन 7.53 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें जापानी फल, कीवी और जैकफ्रूट जैसे वैकल्पिक फल भी भरपूर मात्रा में हैं।  जापानी फल की खूबी यह है कि इसे सेब के साथ भी लगाया जा सकता है, जिससे मिश्रित खेती संभव हो जाती है।  सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है ताकि छोटे किसान परिवारों की आय दोगुनी हो सके। हिमाचल में इसकी फ़ुयू और हेचिया जैसी प्रजातियाँ बाजार में लोकप्रिय हैं। 

 जापानी फल स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का खजाना भी है। इसमें आंखों के लिए विटामिन ए, नींबू से दोगुना विटामिन सी और पाचन के लिए भरपूर फाइबर है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे टैनिन, कैटेचिन और गैलिक एसिड कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों से लड़ने में मदद करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह सूजन कम करता है, कोलेस्ट्रॉल घटाता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है। 

पारंपरिक चिकित्सा में, इसके पत्तों की चाय पेट दर्द और दस्त ठीक करती है, जबकि फल रक्तचाप नियंत्रित रखता है। डायबिटीज वाले मरीजों के लिए यह आदर्श है, क्योंकि यह ब्लड शुगर स्थिर रखता है। जापानी फल पोटेशियम और फॉस्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है। 

कुल मिलाकर यह किसी 'सुपरफूड' से कम नहीं है। लेकिन ज्यादा खाने से इसमें मौजूद टैनिन के कारण पेट में गांठ बनने का खतरा भी रहता है। 


संक्षेप में कहें तो जापानी फल हिमाचल में एक फल भर नहीं है, बल्कि आशा का प्रतीक बन रहा है। यह न केवल किसानों को सेब की एकतरफा निर्भरता से मुक्त कर रहा है बल्कि पर्यटकों को नई स्वाद यात्रा पर भी ले जाने के साथ साथ स्वास्थ्य का अनमोल उपहार भी दे रहा है। इसलिए अगली बार जब आप हिमाचल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों तो प्रकृति की इस नारंगी स्वादिष्ट और सेहतमंद नेमत को नजरअंदाज न करें ।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

ये Gen Z- जेन जी क्या है..ये जेन जी?

जब से नेपाल में आंदोलन और सत्ता में बदलाव की खबरें मीडिया में दौड़ रही हैं तब से ‘जेन जी’ और ‘नेपो किड्स’ जैसे शब्द घर-घर में सुनाई देने लगे हैं। हालांकि नेपो किड्स हमारे देश में नया शब्द नहीं है क्योंकि मनोरंजन जगत और खासतौर पर बॉलीवुड, खेल, व्यवसाय एवं राजनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में इसका भरपूर इस्तेमाल होता आ रहा है।  

सामान्य रूप से समझे तो नेपो किड्स  (Nepo Kids) शब्द नेपोटिज्म (Nepotism) से लिया गया है, जिसका सामान्य अर्थ है भाई-भतीजावाद। यह तमगा उन युवाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो अपने परिवार के प्रभाव के कारण राजनीति,मनोरंजन, फिल्म, खेल, व्यवसाय जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आसानी से अवसर प्राप्त कर लेते हैं। इन पर यह आरोप लगता है कि वे प्रतिभा या मेहनत के बजाय अपने परिवार के नाम पर सफलता हासिल कर रहे हैं। हालांकि कई मामलों में यह बात सही नहीं है क्योंकि नेपो किड्स में कई युवा वाकई प्रतिभाशाली होते हैं और वे अपनी लगन, मेहनत और कौशल से लंबी रेस का घोड़ा साबित होते हैं। 

 जहां तक मौजूदा वक्त के सबसे चर्चित शब्द ‘Gen Z’ या जेनरेशन Z की बात है तो यह शब्द आमतौर पर उन युवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। जैसे भारतीय संदर्भ में परदादा, दादा, पिता और बेटे के जरिए पीढ़ियों को समझा जाता है उसी तरह पश्चिमी संदर्भ में पीढ़ियों को अलग अलग नाम से वर्गीकृत किया गया है। फिलहाल जेन जी सबसे युवा पीढ़ी है जो डिजिटल युग में पग कर एवं रच बसकर तैयार हुई है । 

यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है इसलिए कुछ लोग इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहते हैं।  Gen Z को तकनीकी दक्षता, सामाजिक जागरूकता और वैश्विक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के लिए भी जाना जाता है।  

ऐसा भी नहीं है कि पीढ़ियों का नामकरण कोई पहली बार हो रहा है। दशकों से पश्चिमी समाज में बदलती पीढ़ियों को उनके दौर और तात्कालिक घटनाओं के मुताबिक अलग अलग दिलचस्प नामों से संबोधित किया जाता रहा है। मसलन नामकरण की इस श्रृंखला की सबसे पहली एवं 1883–1900 के बीच जन्मी पीढ़ी को ‘लॉस्ट जेनरेशन’ कहा जाता है । 

यह पीढ़ी प्रथम विश्व युद्ध के समय की थी। इस समूह ने युद्ध और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया।  इसके बाद की पीढ़ी को नाम मिला ‘ग्रेटेस्ट जेनरेशन’ । इसमें 1901–1927 के बीच जन्में लोगों को शामिल किया गया ।  देशभक्ति, कठिन परिश्रम और सामूहिक बलिदान से अपनी पहचान बनाने वाली इस पीढ़ी ने प्रथम विश्व युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव किया था।     

 इसके बाद नंबर आता है ‘साइलेंट जेनरेशन’ का । हालांकि इस नाम का इनके चुप/मौन रहने से कोई मतलब नहीं है बल्कि मौन रहकर परिश्रम करने से है। इस पीढ़ी में 1928–1945 के बीच जन्में लोग शामिल किए गए । इस पीढ़ी ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण का दौर देखा है और अपनी मेहनत से अपना संसार रचा था । 

साइलेंट जनरेशन के बाद आई पीढ़ी के नामकरण की वजह भी बहुत ही दिलचस्प है। इन्हे ‘बेबी बूमर्स’  कहा जाता है और इसमें 1946–1964 के बीच जन्में लोग शामिल हैं। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्म दर में एकाएक हुई वृद्धि के कारण इस पीढ़ी को यह नाम मिला।  

यह पीढ़ी आर्थिक समृद्धि, सामाजिक परिवर्तन और उपभोक्तावाद के लिए भी जानी जाती है।  मौजूदा वक्त में अपनी कलम, लेखन, परिश्रम, विचारों और आविष्कारों से दुनिया को समृद्ध करने वाली और अब अधेड़ हो चली पीढ़ी को ‘जेनरेशन X’ कहा जाता है। इसमें 1965–1980 के बीच जन्में हम जैसे तमाम लोग शामिल हैं। 

हमारी यह पीढ़ी इस मामले में सबसे खास है कि इसने परंपराओं और तकनीकी बदलावों को साथ-साथ जिया है। जेन एक्स ने लैंडलाइन फोन से लेकर पेजर एवं मोबाइल फोन के विकास तक और कैसेट से फ्लॉपी,सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव और अब क्लाउड स्टोरेज तक का लंबा परन्तु तेजी से बदलता सफर तय किया है।   

इसके बाद आती है ‘जेनरेशन Y’ अर्थात् वो लोग जिन्होंने 1981–1996 के बीच जन्म लिया है। हम कह सकते हैं कि इसमें हमारे परिवार के बड़े बच्चे शामिल हैं। यह पीढ़ी डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में जवान हुई है और तकनीक समझ के साथ इसके अनुभवों से भी सराबोर है।  अब आती है बारी बहुचर्चित ‘जेनरेशन Z’ या जेन जी की। यह हमारी युवा पीढ़ी है क्योंकि इन्होंने 1997–2012 के बीच जन्म लिया है।  मोबाइल, गेमिंग, सोशल मीडिया में डूबती उतराती इस पीढ़ी के सदस्य अधिकतम 25 से 28 साल के युवा हैं और इन्हें पढ़ाई, नौकरी, बढ़िया लाइफ और व्यक्तिगत हितों की सबसे ज्यादा फिक्र है। इसलिए यह पीढ़ी दुनिया भर में धमा चौकड़ी मचाए हुए है।  

 ऐसा नहीं है कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण जेन जी पर आकर रुक गया है बल्कि इनके पीछे पीछे एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है जिसे ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम मिला है। इसमें 2013 से लेकर मौजूदा साल यानि 2025 तक पैदा हुए बच्चे  शामिल हैं। यह मानव सभ्यता की सबसे नवीनतम पीढ़ी है, जो पूरी तरह से 21वीं सदी में जन्मी है।       

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण मोटे तौर पर जन्म वर्ष, सामाजिक-आर्थिक घटनाओं, और सांस्कृतिक बदलावों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक पीढ़ी को उस समय की प्रमुख घटनाओं और मूल्यों के आधार पर परिभाषित किया जाता है और उसी के मुताबिक उनका नामकरण किया जाता है। बस, सोचने वाली बात यह है कि जब जेन जी दुनिया भर में ऐसा जबरदस्त हड़कंप मचाए हुए है तो जनरेशन अल्फा क्या और कितना कमाल नहीं करेगी।

और हमने नलिनी के ‘गुलाब जामुन’ खा ही लिए..!!

हिल क्वीन शिमला में आमद दर्ज कराने के बाद से ही दोस्तों/परिचितों और शुभ चिंतकों ने सुझाव देना शुरू कर दिया था कि शिमला में क्या करना है और क्या नहीं, कहां घूमना है और पता नहीं क्या क्या। खाने पीने को लेकर भी आमतौर पर सुझाव मिलते रहते हैं। सेव और ताजे पहाड़ी फलों का स्वाद लेने के साथ एक सुझाव दो तीन जगह से आया कि  शिमला में नलिनी के गुलाब जामुन जरूर खाना। अब तक तो हम नलिनी को साड़ी के मशहूर ब्रांड के तौर पर जानते थे, लेकिन गुलाब जामुन का ब्रांड..!!


 गुलाब जामुन का ज़िक्र हो और मुंह में पानी न आए,ऐसा संभव ही नहीं है। यह छोटा-सा सुनहरा गोला अपने अंदर स्वाद और नफासत का पूरा रुतबा समेटे है। यह न केवल स्वाद की दुनिया का कोहिनूर है, बल्कि भारतीय पर्वों, घरेलू आयोजनों और शादी ब्याह जैसे आयोजनों का अनिवार्य हिस्सा भी है इसलिए, सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर्स की मीठे से परहेज करने की तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए हम नलिनी तक पहुंच ही गए।

 

माना जाता है कि गुलाब जामुन की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप में खोया और चाशनी की परंपरा में पगी और बढ़ी हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह मिठाई मध्यकालीन भारत में फारस से आई थी और मुगल काल में गुलाब जल और केसर के उपयोग ने इसे और लज़ीज़ बना दिया। 


खैर, अपने को इतिहास से ज्यादा इसके स्वाद से सरोकार था इसलिए इतिहास में ज्यादा सिर नहीं खपाया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नरम,मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला गुलाब जामुन बनाना वाकई एक कला है, जिसमें मीठे से धैर्य और खोया जैसे मुलायम प्यार के बीच संतुलन की जरूरत होती है। इनके बीच सौ फीसद तालमेल से ही बनता है अतुलनीय स्वाद से भरा गुलाब जामुन..एकदम नरम, रसीला और हर टुकड़े में मिठास एवं स्वाद का संसार समेटे हुए ।


स्वाद के ऐसे ही सपने संजोए हम भी पहुंच गए शिमला में मॉल रोड स्थित नलिनी के पास। यदि आप रिज से लिफ्ट की ओर जाएंगे तो आपके बाएं हाथ पर और लिफ्ट से चर्च की ओर आयेंगे तो दाहिने हाथ पर खुशबू बिखेरती यह दुकान मिल जाएगी। वैसे, हमारे यहां गुलाब जामुन को रंग रूप एवं आकार प्रकार के कारण काला जामुन, लाल मोहन, मावा बाटी, बंगाली में पंतुआ, कहीं खीर मोहन तो कहीं रसगुल्ला जैसे कई नामों से जाना जाता है। दरअसल उत्तर भारत में आम बोलचाल में गुलाब जामुन अपने ठंडे और श्वेत वर्णी बिरादर रसगुल्ला के नाम से मशहूर हैं… आखिर है तो यह भी रस का गोला, भले ही सांवला सलोना है।


अब गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। दीवाली हो, राखी हो, जन्मदिन या शादी का भोज, खाने पीने की सूची में गुलाब जामुन का स्थान अडिग है। जब इसे गर्म परोसा जाता है तो यह जीभ पर मिठास बिखेरता हुआ होले से पिघल सा जाता है और ठंडा खाएं तो चाशनी की मिठास तालू पर रच-बस जाती है। आजकल पार्टियों में इनकी जोड़ी वनीला आइसक्रीम के साथ भी खूब जम रही है जो ठंडे और गर्म के सम्मिश्रण से अलग स्वाद रचता है।


नलिनी पर गुलाब जामुन का स्वाद और आकार तो बेजोड़ है ही, मूल्य की भी अलग कहानी है। यदि आप नलिनी के काउंटर पर ही खड़े होकर गुलाब जामुन खाते हैं तो यह 50 रुपए में मिल जाता है लेकिन यदि आप इनके रेस्तरां में बैठकर सुकून से कतरा कतरा इसका स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको 80 रुपए चुकाने पड़ते हैं। हालांकि हमें तो काउंटर पर खाना ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि आप मॉल रोड की ठंडी बयार के बीच गरमागरम गुलाब जामुन का आनंद ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं। इस रसीले जादूगर का जादू अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा है बल्कि यह अब वैश्विक मंच पर भी पहचान बना रहा है। अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक और ब्रिटेन से लेकर कनाडा तक यह भारतीय रेस्तरां से लेकर मिठाई की दुकानों तक, लोकप्रियता का नया मुकाम बना रहा है। 


कुल मिलाकर गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि खुशियों का प्रतीक है। शायद, सबसे तेजी से डोपामिन भी यही बढ़ाता होगा। इसका हर टुकड़ा आपको प्यार भरे स्वाद, मिठास की परंपरा और उत्सव की याद दिलाता है। चाहे आप इसे नलिनी जैसी आपके शहर की किसी भी मशहूर मिठाई की दुकान से खरीदें या घर पर बनाएं, इसका स्वाद हमेशा मन को मिठास से भर देता है। 


तो अगली बार जब आप कहीं भी गुलाब जामुन के स्वाद का आनंद लें और वह आपको अच्छा लगे तो इसके पीछे की कहानी और कारीगरी को भी जानने का प्रयास करिए ताकि गुलाब जामुन की मिठास की स्मृतियां जीभ भर के लिए नहीं, दिल और दिमाग के लिए भी अमिट हो जाएं ।


सोमवार, 8 सितंबर 2025

देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!!

देवभूमि में डायनों का क्या काम? तो फिर हिमाचल में इन दिनों डायन या चुड़ैल क्यों नाच रही हैं ? और ऐसा क्या है कि आम लोग भी उनका रंग रूप धरकर नाचने गाने में मशगूल है? क्यों महिलाएं घर में बैठकर कभी डायन की नाक तो कभी हाथ पैर काट रही है ? और डायनों के इतने खुले प्रदर्शन के बाद भी देवता क्यों चुप है? आप भी यह सब सवाल पढ़कर चौंक रहे होंगे और अचरज में पड़ना लाजमी भी है क्योंकि देवभूमि हिमाचल प्रदेश में जहां पग पग पर देवताओं का वास है ऐसे में किसी भी बुरी आत्मा की मौजूदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या पर करीब दो दिन तक राज्य के कई इलाकों में कथित तौर पर डायनों का बोलबाला रहता है।कहीं यह स्थिति जन्माष्टमी के हफ्ते भर बाद बनती है तो कहीं रक्षाबंधन के पखवाड़े भर बाद।  

दरअसल,हिमाचल प्रदेश की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ साथ समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। यहां के पर्व, मेलों और परंपराओं में पहाड़ के लोगों की आस्था, डर, विश्वास और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं लोकपर्वों में से एक है डगैली पर्व, जो इन दिनों मनाया जाता है। इसे डगयाली, दगाली, अघोरा चतुर्दर्शी, कुशाग्रहणी अमावस्या और डायनों का पर्व जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है। 

हम इसे हिमाचल का हैलोवीन भी कह सकते हैं। मेक्सिको का डिया डे लॉस मुर्टोस भी कुछ इसी तरह का पर्व है।  हम यह पर्व सीधे-सीधे उन कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा है जिनमें डायन का जिक्र आता है। लोकमान्यता के अनुसार डायन बुरी शक्तियों का प्रतीक होती है, और डगैली पर्व उसी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाने का सामूहिक प्रयास है। 

 डगैली पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह पर्व सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं। 

धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है।  जानकारों के अनुसार डगैली शब्द का संबंध डग यानी चलने या घूमने से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की रात डायनें गांव में डग भरती हैं और लोग सामूहिक नृत्य-गीतों के जरिए उन्हें भगाते हैं। 

डगैली पर्व में डायन का रूप धारण करने के लिए चेहरे पर कालिख लगाई जाती है और डरावने मुखौटे पहने जाते हैं। कांगड़ा और मंडी क्षेत्र में इसे मुखौटों के साथ तो कुल्लू और चंबा में यह लोकगीत और घर-घर टोली जाने की परंपरा के साथ मनाया जाता है। 

यह पर्व शिमला, सिरमौर और सोलन जैसे शहरी जिलों में भी मनाया जाता है। लद्दाख़, नेपाल और सिक्किम में भी इसतरह के आयोजन होते हैं।   आजकल कुछ जगहों पर प्रतीकात्मक रूप से डायन का पुतला भी जलाया जाता है। 

डगैली पर्व में गाए जाने वाले गीतों में अक्सर डायन के स्वभाव, उसकी शरारतों और उससे मुक्ति पाने के उपायों का जिक्र होता है। यह कुछ कुछ मैदानी इलाकों में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन बुराई के प्रतीक चुगलखोर की पिटाई जैसा पर्व है। यहां भी डायन या बुराई से बचने के लिए दरवाजों पर कांटे लगाए जाते हैं,हाथ में मंत्र शक्ति वाले कलावे या रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।  

डगैली पर्व का असली महत्व इसकी सामूहिकता है। पूरा गांव एक साथ मिलकर नृत्य करता है, गीत गाता है और भोज का आनंद उठाता है। इससे लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत होती है। वहीं,धार्मिक दृष्टि से देखें तो डगैली पर्व गांव को बुरी शक्तियों से बचाने का सामूहिक प्रयास है। 

सौम्य सूरज का मतवाला अंदाज़

लगातार कई दिन की घनघोर और तबाही भरी बारिश के बाद शिमला में आज शाम को सूरज ने बादलों का सीना चीरकर अपनी आमद दर्ज करा ही दी। 

जब देशभर में सूरज ढल रहा हो तब पहाड़ों की रानी के माथे पर सूरज निकलना प्रकृति का जादू ही है।  बादलों और बूंदों में जकड़े पहाड़ भी सूरज की शह पाकर जकड़न को तोड़कर चमक उठे। 

सूरज की किरणें अपनी सुनहरी तूलिका से पाइन और देवदार के पेड़ों के साथ साथ लाल हरी छतों पर हल्के-हल्के रंग बिखेर रहीं हैं। गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में तैर रही है, और कोहरे की पतली चादर धीरे-धीरे हट रही है, मानो सूरज के स्वागत में रास्ता दे रही हो।

 कई दिन बाद सूरज भी पूरी सौम्यता से बादल और बूंदों के रथ पर सवार मतवाला होकर अपने प्रिय पहाड़ों से मिलने आ गया है।

पेड़ों की पत्तियों पर कब्जा जमाए बूंदों की लड़ियां भी चमकने लगी हैं जैसे सूरज के स्वागत में वंदनवार सज गए हो । रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर खड़े होकर देखो, तो लगता है सूरज ने बादलों के साथ लुकाछिपी का खेल खत्म कर दिया है। 

कल तक बारिश की मोटी और ढीठ बूंदे में छिपी दूर हिमालय की चोटियाँ अब सुनहरे और गुलाबी रंग में नहाई दिखती हैं। सूरज के करीब कुछ चोटियों ने तो स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है जैसे अब सूरज के साथ उनकी सत्ता लौट आई है। 

चाय की दुकानों से उठती अदरक इलायची की भाप के बीच चुस्कियां लेते हुए स्थानीय लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं- "सूरज निकला, अब शिमला की रौनक लौट आएगी!"

यह नजारा सिर्फ़ आँखों का सुख नहीं, बल्कि आत्मा को ताज़गी देने वाला अनुभव है—जैसे शिमला ने बारिश की थकान उतारकर सूरज को गर्मजोशी से गले लगा लिया हो।


सोमवार, 18 अगस्त 2025

हंगामा है क्यों बरपा..शादी ही तो की है!!

गुलाम अली की यह एक लोकप्रिय ग़ज़ल है- ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।’ अकबर इलाहाबादी की लिखी इस ग़ज़ल का मतलब है- ‘ जरा सी बात पर बेवजह शोर क्यों मचा है, क्यों हंगामा कर रहे हैं।’ इस ग़ज़ल का उल्लेख इसलिए क्योंकि कुछ इसी तरह के हंगामे की स्थिति देश के सोशल मीडिया और मीडिया की ‘वायरल प्रवृत्ति’ ने हिमाचल प्रदेश में हुई एक शादी को लेकर बना रखी है। उनके लिए यह शादी किसी अजूबे से कम नहीं है और जब विषय वायरल होने का माद्दा रखता हो तो फिर सोशल मीडिया के वीर कैसे पीछे रह सकते हैं। 

दरअसल,हिमाचल प्रदेश में हाटी समुदाय के दो भाइयों द्वारा एक ही लड़की के साथ विवाह करने के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि देश तो देश, विदेशी मीडिया हाउस भी इसमें दिलचस्पी दिखाने लगे। सामान्य रूप से सामाजिक परंपराओं के लिहाज से यह विवाह अलग और अनूठा भी है लेकिन उस क्षेत्र और समुदाय के लिए सामान्य बात है। 

यही वजह है कि जब मीडिया ने उस गांव या समुदाय के लोगों से इस विवाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो अधिकतर का यही उत्तर था कि इसमें नई बात क्या है? इनका कहना गलत भी नहीं है क्योंकि उस समुदाय और उस क्षेत्र के लिए यह वर्षों पुरानी सामान्य परंपरा है। वैसे तो यह वाकया हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले के शिलाई इलाके का था लेकिन सिरमौर क्या, किन्नौर और लाहौल-स्पीति सहित कई जिलों में विभिन्न समुदायों में बहुपति या बहु पत्नी जैसी प्रथाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। 

यदि हम देश के तमाम राज्यों में खासतौर पर आदिवासी और पारंपरिक संस्कारों के पोषक समाज में प्रचलित संस्कृतियों को देखें तो आज  उन्हें जानकार हमें अचरज ही होगा मसलन मध्यप्रदेश में भील आदिवासियों में दूल्हे को ससुराल में रखने वाली घर जंवाई प्रथा, अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने की नाता प्रथा, विवाह पूर्व यौन संबंध वाली लामसेना प्रथा जैसी तमाम परंपराएं प्रचलित हैं। 

वहीं, इसी प्रदेश के झाबुआ जिले का भगोरिया मेला युवक युवतियों के जीवन साथी चुनने की आजादी के लिए विख्यात है। मणिपुर में मैतेई समाज में लुंहोंगबा प्रथा आज भी चलन में है इसमें लड़का अपनी पसंद की लड़की को समाज और परिवार की स्वीकृति से भगाकर ले जाता है और फिर उनकी सहमति के आधार पर परिवार उनकी शादी कर देता है। वहीं,ढूकु विवाह प्रथा में लड़का लड़की आज के लिव इन की तरह साथ रहने लगते हैं, बाद में समाज कुछ जुर्माना लगाकर उनके विवाह को स्वीकृति देता है। 

जहां तक बहुपति (Polyandry) प्रथा का प्रश्न है तो विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तराखंड के कुछ समुदायों, दक्षिण भारत के नीलगिरी के टोडा आदिवादियों और त्रावनकोर के नांजनाद समाज में,केरल के नायर और थियास समाज में यह परंपरा प्रचलित रही है। मुस्लिम समाज में बहु पत्नी (polygamy) प्रथा तो सामान्य बात है।  

अब बात हिमाचल प्रदेश के उस बहुचर्चित विवाह और वहां की परंपराओं की, तो बहुपति प्रथा यहां सिरमौर, किन्नौर  और लाहौल-स्पीति में सामान्य बात है। ताजा मामला सिरमौर जिले के हाटी समुदाय का है। हाटी समुदाय अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। 

हम सभी जानते हैं कि बहुपति प्रथा का सबसे उल्लेखनीय प्रसंग महाभारत में है जिसमें द्रौपदी का विवाह पांच पांडव भाइयों से हुआ था। हाटी समुदाय में भी बहु पति प्रथा को जोड़ीदारां या द्रौपदी प्रथा जैसे विभिन्न नामों से नाम से जाना जाता है। 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह प्रथा पांडवों की परंपरा से ही प्रेरित है। उल्लेखनीय बात यह है कि  हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा मुख्य रूप से भाइयों के बीच सामूहिक विवाह की प्रणाली है, जहां एक महिला कई भाइयों (आमतौर पर सगे भाइयों) की साझा पत्नी होती है।   

हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारक हैं मसलन पहाड़ी भूभाग और सीमित उपजाऊ भूमि के कारण परिवारों के लिए संपत्ति का बंटवारा चुनौतीपूर्ण है। बहुपति प्रथा के माध्यम से, परिवार की संपत्ति और भूमि एक इकाई के रूप में बनी रहती है, जिससे आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।  

इसी तरह, इस प्रथा से भाइयों के बीच एकता और सहयोग बना रहता है। परिवार के सभी पुरुष सदस्य एक साथ मिलकर खेती, पशुपालन, और अन्य आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। हाटी समुदाय के लोगों का कहना है कि यह प्रथा परिवार और समुदाय की संरचना को मजबूत करती है। 

हिमाचल के वरिष्ठ पत्रकार और हाटी समुदाय के प्रवक्ता रमेश सिंगटा बताते हैं कि हमारे समुदाय में बहुपति प्रथा में एक महिला का विवाह एक परिवार के सभी भाइयों से होता है, चाहे उनकी संख्या दो हो या अधिक। विवाह के बाद, पत्नी परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। बच्चों को सभी भाइयों की साझा संतान माना जाता है, और सबसे बड़े भाई को सामान्यतः पिता के रूप में स्वीकार किया जाता है। 

इस प्रथा में पत्नी को परिवार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता है, और वह घरेलू निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रथा में कुछ नियम और परंपराएं भी हैं, जैसे कि भाइयों के बीच समय का बंटवारा और पारस्परिक सहमति। जो यह सुनिश्चित करता है कि परिवार में सामंजस्य बना रहे।  

हाटी समुदाय की अनुमानित जनसंख्या लगभग 2 लाख है जो हिमाचल के सैकड़ों गांवों और करीब डेढ़ सौ से ज्यादा पंचायतों में फैली है। यहां तकरीबन हर गांव और परिवार में बहुपति प्रथा के तहत विवाह हुआ है और वे पीढ़ियों से मिल जुलकर सहज भाव से रह रहे हैं। हाल में सिरमौर जिले में दो भाइयों प्रदीप और कपिल नेगी द्वारा सुनीता नामक युवती से धूमधाम से किए गए विवाह ने भले ही बहुपति प्रथा को पुनः चर्चा में ला दिया है लेकिन इससे उलट हकीकत यह है कि आधुनिकता, शिक्षा, और शहरीकरण के प्रभाव से हाटी समुदाय में भी बहुपति प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है।   

युवा पीढ़ी, विशेष रूप से शिक्षित युवा, इस प्रथा को अपनाने में कम रुचि दिखा रहे हैं। इसका कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एकल विवाह की अवधारणा के साथ साथ नई पीढ़ी की खेती के अलावा अन्य पेशों में रुचि बढ़ना भी है। इससे संपत्ति के बंटवारे की आवश्यकता भी कम हो रही है।  

हाटी समुदाय की बहुपति प्रथा हालांकि सामुदायिक एकता और संसाधनों के संरक्षण पर आधारित है लेकिन यह प्रथा आधुनिक समाज में कई सामाजिक और कानूनी सवाल भी उठाती है, विशेष रूप से लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह प्रथा महिलाओं की स्वायत्तता को सीमित करती है, जबकि समुदाय के भीतर इसे एक सहमति-आधारित व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। 

वैसे इस प्रथा को समझने के लिए हमें इसे केवल आधुनिक और कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखना होगा तभी हम इसके सभी पहलुओं को समझ सकते हैं।

फिल्म शोले में गीत-संगीत: कालजयी विरासत

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो अपनी कहानी, किरदारों और संगीत के दम पर अमर हो जाती हैं। रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित 1975 में रिलीज़ हुई फिल्म शोले ऐसी ही एक कृति है, जिसने न केवल भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी, बल्कि इसके गीत-संगीत ने भी दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी। 

शोले का संगीत, जिसे संगीतकार आर.डी. बर्मन और पंचम दा के नाम से लोकप्रिय  राहुल देव बर्मन ने तैयार किया, और जिसके बोल आनंद बख्शी ने लिखे, आज भी उतना ही ताज़ा और प्रासंगिक है, जितना वह अपने समय में था।   शोले का संगीत अपने आप में एक अनूठा मिश्रण है, जिसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत का सामंजस्य देखने को मिलता है। 

पंचम दा ने इस फिल्म के लिए संगीत रचते समय न केवल कहानी की गहराई को समझा, बल्कि किरदारों की भावनाओं और परिस्थितियों को भी संगीत के माध्यम से जीवंत किया। फिल्म के गीत विविधता से भरे हैं—कभी रोमांटिक, कभी हास्यपूर्ण, कभी भावनात्मक, और कभी उत्साहवर्धक।  

फिल्म का सबसे मशहूर गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" दोस्ती की भावना को इस तरह व्यक्त करता है कि यह आज भी दोस्ती का प्रतीक बन चुका है। इस गीत में किशोर कुमार और मन्ना डे की जुगलबंदी, आर.डी. बर्मन के संगीत और आनंद बख्शी के सरल लेकिन प्रभावशाली बोलों ने इसे एक कालजयी रचना बना दिया। गीत का संगीत संयोजन, जिसमें गिटार, ड्रम और भारतीय वाद्य यंत्रों का मिश्रण है, इसे एक अनूठा अंदाज़ देता है। यह गीत न केवल जय और वीरू की दोस्ती को दर्शाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति में दोस्ती के मूल्यों को भी रेखांकित करता है।  

शोले के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कहानी के साथ पूरी तरह से एकीकृत हैं। प्रत्येक गीत फिल्म के कथानक को आगे बढ़ाता है और किरदारों की भावनाओं को गहराई देता है। उदाहरण के लिए, "होली के दिन दिल ख़िल जाते हैं" एक उत्सव गीत है, जो होली के रंगों और ग्रामीण परिवेश की मस्ती को दर्शाता है। इस गीत में किशोर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ें, साथ ही आर.डी. बर्मन का जीवंत संगीत, दर्शकों को रामगढ़ के उत्सव में शामिल कर लेता है। इस गीत का चित्रण भी उतना ही प्रभावशाली है, जिसमें रंगों और नृत्य का समन्वय कहानी को हल्का-फुल्का और आनंदमय बनाता है।  

वहीं, "महबूबा महबूबा" एक ऐसा गीत है, जो अपने बोल्ड और कामुक अंदाज़ के लिए जाना जाता है। हेलेन का नृत्य और आर.डी. बर्मन की आवाज़ इस गीत को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है। यह गीत गब्बर के डाकुओं के अड्डे की माहौल को दर्शाता है और फिल्म के खलनायक की क्रूरता और रहस्यमयी व्यक्तित्व को उजागर करता है। इस गीत में पश्चिमी जैज़ और भारतीय लोक संगीत का मिश्रण इसे एक अनोखा स्वाद देता है।  

"जब तक है जान" गीत बसंती के किरदार को और गहराई देता है। इस गीत में लता मंगेशकर की आवाज़ बसंती की मजबूती और जीवटता को दर्शाती है। यह गीत न केवल बसंती के नृत्य कौशल को प्रदर्शित करता है, बल्कि उसकी भावनाओं और उसके प्रेम को भी सामने लाता है।  

शोले का बैकग्राउंड म्यूजिक भी उतना ही प्रभावशाली है, जितने इसके गीत। आर.डी. बर्मन ने फिल्म के हर दृश्य के लिए ऐसा संगीत रचा, जो दर्शकों को कहानी के मूड में डुबो देता है। गब्बर सिंह के प्रवेश दृश्य में भारी और रहस्यमयी संगीत, जय और वीरू की मस्ती भरे दृश्यों में हल्का और चुलबुला संगीत, और ठाकुर के दुखद अतीत को दर्शाने वाले दृश्यों में भावनात्मक संगीत, जया और अमिताभ का आमना सामना होने पर संगीत—हर नोट कहानी को और गहरा बनाता है। 

गब्बर के डायलॉग "कितने आदमी थे?" के साथ बजने वाला संगीत आज भी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है।  शोले के गीत-संगीत का प्रभाव केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहा; इसने भारतीय समाज और संस्कृति पर भी गहरा असर डाला। "ये दोस्ती" गीत आज भी दोस्ती के अवसरों पर गाया जाता है, और "महबूबा महबूबा" का रीमिक्स आज भी डांस नंबर्स में लोकप्रिय है। 

इन गीतों ने न केवल उस दौर के दर्शकों को प्रभावित किया, बल्कि नई पीढ़ी के बीच भी उतनी ही लोकप्रियता बरकरार रखी।  आर.डी. बर्मन का संगीत और आनंद बख्शी के बोलों ने शोले को एक ऐसी फिल्म बनाया, जिसके गीत हर उम्र और वर्ग के लोगों को पसंद आए। इन गीतों की सादगी और गहराई ने इसे हर भारतीय के दिल तक पहुंचाया। 

शोले के संगीत में आर.डी. बर्मन की तकनीकी प्रतिभा साफ झलकती है। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों और ध्वनियों का उपयोग कर एक ऐसा अनुभव रचा, जो दर्शकों को बांधे रखता है। उदाहरण के लिए, "महबूबा महबूबा" में ड्रम और सितार का मिश्रण एक अनोखा प्रभाव पैदा करता है। इसी तरह, पृष्ठभूमि संगीत में उन्होंने सस्पेंस और ड्रामा पैदा करने के लिए न्यूनतम लेकिन प्रभावी ध्वनियों का उपयोग किया।  

शोले का गीत-संगीत भारतीय सिनेमा की एक ऐसी धरोहर है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है। आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जोड़ी ने इस फिल्म के लिए ऐसी रचनाएँ दीं, जो न केवल कहानी को समृद्ध करती हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों में गहरी पैठ बनाती हैं। चाहे "ये दोस्ती" की मस्ती हो, "महबूबा" का जादू, या "जब तक है जान" की भावना—हर गीत अपने आप में एक कहानी कहता है। 

शोले  का संगीत न केवल एक फिल्म का हिस्सा है, बल्कि यह भारतीय सिनेमा और संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। यह संगीत आज भी हमें उस दौर में ले जाता है, जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा थी।  हालांकि, 

कुछ फिल्म आलोचकों का यह भी मानना है कि शोले के गीत-संगीत में कुछ सीमाएँ और कमियाँ भी देखी जा सकती हैं, जिन्हें अक्सर इसकी लोकप्रियता के चलते अनदेखा कर दिया जाता है। उनके मुताबिक सबसे पहली कमी यह रही कि फिल्म की गंभीर और एक्शन प्रधान कथा में गीतों की उपस्थिति कुछ स्थानों पर असंगत प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, "मेहबूबा मेहबूबा" गीत कथा की प्रवाहशीलता को थोड़ी देर के लिए रोक देता है और फिल्म की मूल भावनात्मक लय से थोड़ा हटकर लगता है। यह गीत अधिक प्रदर्शनकारी और शैलीपरक है, जो मुख्य कहानी के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता। इसके अलावा, फिल्म की प्रमुख महिला पात्रों – बसंती और राधा – को लेकर कोई गंभीर या भावनात्मक गीत नहीं रचा गया, जिससे उनके किरदारों की गहराई संगीत के माध्यम से व्यक्त नहीं हो सकी।

 हालाँकि आर. डी. बर्मन ने तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट संगीत दिया, पर कुछ गीत फिल्म की कथा से अधिक स्वतंत्र लगते हैं, जिससे संपूर्ण संगीत अनुभव कुछ हद तक असंतुलित हो जाता है। इस दृष्टि से शोले का संगीत कलात्मक रूप से प्रभावशाली होते हुए भी पूरी तरह निष्कलंक नहीं कहा जा सकता।

 समीक्षकों की राय जुदा हो सकती है लेकिन यदि आम दर्शक के लिहाज से देखें तो हिंदी सिनेमा की इस कालजयी फिल्म शोले  का संगीत न केवल फिल्म की आत्मा बन गया, बल्कि भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी साबित हुआ। फिल्म के गीतों में विविधता है—दोस्ती, प्रेम, उत्सव और ताजगी—हर भाव को संगीतमय अभिव्यक्ति मिली है। गीतो की मेलोडी, शब्दों और गायन में जो अपनापन है, वह आज भी दिलों को छू जाता है। 

आर. डी. बर्मन ने पारंपरिक और आधुनिक ध्वनियों का अद्भुत संगम कर फिल्म को संगीतमय ऊँचाई दी। शोले के गीत फिल्म की कथा में सहज रूप से घुलते हैं और हर दृश्य को भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। यही कारण है कि शोले का संगीत आज भी उतना ही ताजा और प्रभावशाली लगता है।

'वर्क फ्रॉम होम' से रचा इतिहास और लिख दी भरोसे की नई इबारत

आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग के राज्य संवाददाता के तौर पर हमारे पास नेशनल न्यूज़ रुम से केवल खबरों और वॉयस ओवर के लिए ही फोन आते हैं लेकिन यदि आकाशवाणी समाचार की प्रमुख महानिदेशक का फोन आए तो चौंकना लाज़िमी है और संदेशा भी ऐसा कि ‘आप तत्काल प्रभाव से प्रादेशिक समाचार एकांश (आरएनयू), भोपाल का प्रसारण 14 दिन के लिए बंद कर दिए दीजिए और अपनी पूरी टीम के साथ क्वारंटाइन हो जाइए.....’।

वैसे तो किसी भी कार्यालय और कर्मचारियों के लिए बिन मांगे एक पखवाड़े की छुट्टी मिलना लाटरी निकलने जैसा था लेकिन हुआ उल्टा....हमारे न्यूज़ रूम में मुर्दैनी सी छा गयी,सभी के चेहरे लटक गए और मुझे लगा कि ज्यादा बात की तो दिन रात धुंआधार समाचार बनाने-टाइप करने-पढने वाली हमारी टीम के कई सदस्य रो पड़ेंगे...।

आखिर जब प्रदेश के लोगों को सबसे ज्यादा हमारी और आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले विश्वसनीय समाचारों की जरूरत थी तब यदि हम चुपचाप घर बैठ जाएँ तो ये हमारे काम और सबसे ज्यादा हमारे साथ सालों से जुड़े श्रोताओं के साथ नाइंसाफी होगी और एक तरह का धोखा होगा।  मैंने जून 2018 में भोपाल में राज्य संवाददाता के साथ साथ एकांश प्रमुख का कार्यभार संभाला था जबकि डीजी के आदेश वाली यह बात है साल 2000 में मार्च के आखिरी हफ्ते की, तब कोविड-19 महज एक बीमारी नहीं बल्कि खौफ़ था, साक्षात् यमराज से साक्षात्कार के समान था और एक ऐसा डर था जिसने आम लोगों, समाज, प्रदेश और देश को हिलाकर रख दिया था। 

भय तो आज भी है लेकिन अब हम इस बीमारी से निपटने में सक्षम हैं और हमारे पास बेहतरीन चिकित्सा सुविधाओं के साथ साथ कोविड वैक्सीन भी हैं। अब भारत ही नहीं दुनिया भर में कोरोना संक्रमण से निपटने के तमाम तरीके तैयार कर लिए गए हैं लेकिन तब बस लॉक डाउन ही एक सहारा था और आज की नवजवान पीढ़ी के साथ पहले की कई पीढ़ियों को भी महीनों के ऐतिहासिक लॉक डाउन से रूबरू होना पड़ा था। 

याद कीजिये, किसी शहर-कालोनी में एक भी कोरोना संक्रमित मिल जाता था तो पूरा इलाक़ा सील कर पुलिस का सघन पहरा बिठा दिया जाता था और जानकारी के अभाव में लोग उस इलाके के आसपास से निकलने से भी डरते थे क्योंकि तब संक्रमण को खतरनाक और छूत की बीमारी जैसा समझा जाता था।  ये वो दौर था, जब सैनेटाइजर किसी चमत्कारी जड़ी-बूटी और मास्क हमारी कारों में लगे एयर बैग से ज्यादा सुरक्षा देने वाले कवच बन रहे थे और अफवाहों, भ्रम फैलाने वाली ख़बरों और अनजाने डर से भयभीत आम लोगों को सत्य, बिना मिलावट के और सौ टका विश्वसनीय समाचारों की सबसे ज्यादा जरुरत थी तब आकाशवाणी के नियमित समाचार बुलेटिन को बंद करना मतलब अफवाहों और सोशल मीडिया पर फ़ैल रही भ्रामक जानकारियों को बढ़ावा देने जैसा था। इसलिए, ऊपर से मिले आदेश के बाद भी हम समाचार बुलेटिन बंद कर आराम से घर बैठ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। 

वैसे भी बतौर स्टेट कॉरेस्पॉन्डेंट मेरी यह अनिवार्य ड्यूटी थी कि रेडियो के श्रोताओं तक सही जानकारी पहुंचाकर उनका भ्रम और डर दोनों दूर करूं।    वैसे, दुनिया की इस सबसे बड़ी आपदा के समय भी नियमित समाचारों का प्रसारण बंद कर घर बैठ जाने की इस हिदायत के पीछे भी एक रोचक (तब डरावनी) कहानी है। एक ऐसी गाथा जिसने आकाशवाणी ही नहीं बल्कि भोपाल-प्रदेश और देश के तमाम समाचार पत्र समूहों और न्यूज़ चैनलों को हिला डाला था। 

 दरअसल मध्यप्रदेश में तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के मुखिया कमलनाथ ने बहुमत खो देने के कारण अपनी 15 माह पुरानी सरकार के इस्तीफे की जानकारी देने के लिए मुख्यमंत्री निवास पर पत्रकारों को आमंत्रित किया था। इस सबसे बड़ी और राज्य की राजनीति में बदलाव लाने वाली खबर की पल पल की जानकारी हासिल करने के लिए प्रदेश और देश के मीडिया समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले 200 से ज्यादा पत्रकार मुख्यमंत्री निवास में जुटे थे। 

खबर मिलने, छपने और सरकार बदलने तक तो सब ठीक था लेकिन उसके दो-तीन दिन बाद आई जानकारी ने मीडिया जगत में भूचाल ला दिया और दूसरों की नींद उड़ाने वाले पत्रकारों की भी कई दिनों तक नींद उड़ी रही।  हुआ यह कि पत्रकार वार्ता के बाद पता चला कि वहां मौजूद एक पत्रकार साथी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि तब कोरोना किसी भूत या काल जैसा था।  ये पत्रकार साथी भोपाल के उन शुरूआती लोगों में शामिल थे जो इस संक्रमण का शिकार बने।

  ....बस फिर क्या था आनन फानन में पत्रकार होम क्वारंटाइन होने लगे और जांच कराने लगे। यह खबर टेलीविजन चैनलों और हवा के घोड़े पर सवार सोशल मीडिया के जरिये हमारे दिल्ली स्थित मुख्यालय तक भी पहुँच गयी और हमें यह बताना पड़ा कि मुख्यमंत्री निवास की उस पत्रकार वार्ता में हमारे एक समाचार सहयोगी भी थे। हालाँकि कोरोना संक्रमण की यह जानकारी सामने आने के बाद बाकी पत्रकारों की तरह वे भी होम क्वारंटाइन में चले गए थे, लेकिन लगभग हफ्ते भर तक हमारे समाचार विभाग की पूरी टीम और लगभग पूरा स्टाफ उनके संपर्क में रहा इसलिए प्रशासन के नियमों, सलाह और मुख्यालय के निर्देश पर सभी को 14 दिन के लिए घरों में अलग थलग कैद होना अनिवार्य था । 

ऐसी सूरत में एक ही रास्ता था कि भोपाल से समाचारों का प्रसारण 14 दिन के लिए बंद कर दिया जाए और यही हम सभी नहीं चाहते थे।  ऐसे में रास्ता क्या था और इतना समय भी नहीं था कि सोच विचारकर फैसला लिया जाए क्योंकि आकाशवाणी के प्राइमरी चैनल के साथ साथ विविध भारती जैसे लोकप्रिय चैनल पर दिन में तीन बार समाचारों का लाइव प्रसारण और एफएम चैनल पर घंटे भर के अन्तराल में हेडलाइन्स का प्रसारण तो करना ही था। कुछ देर की ‘ब्रेन स्टार्मिंग’, अपनी जिम्मेदारी का अहसास और आकाशवाणी भोपाल के उस समय के प्रमुख धर्मेन्द्र कुमार श्रीवास्तव के आगे बढ़कर दिए गए तकनीकी सहयोग ने हमें ‘आपदा में अवसर’ तलाशने और ‘संकट में समाधान’ ढूंढने का हौंसला दिया और फिर हमने उस शुरुआत को अंजाम दिया जो बाद में ‘वर्क फ्राम होम’ के नाम से हर ऑफिस और हर कंपनी का मंत्र बन गया।    

खास बात यह है कि आकाशवाणी भोपाल ही नहीं बल्कि पूरे आकाशवाणी नेटवर्क के लिए यह पहली, अनूठी,अभिनव और नई शुरुआत थी.. मतलब हम लोगों के पास एक तरह से सरकारी क्षेत्र में नयी शुरुआत का, इतिहास रचने का अवसर था और हमने यह कर भी दिखाया। कारपोरेट सेक्टर में तो वर्क फ्राम होम आसान है लेकिन आकाशवाणी में लाइव समाचार प्रसारण में इसे आजमाना न केवल जोखिम भरा था बल्कि ‘बूमरैंग’ का ख़तरा भी था और इससे आपदा में अवसर के स्थान पर आपदा में हादसे में बदलने की आशंका भी थी । 

 आकाशवाणी भोपाल से समाचारों के प्रसारण में  'वर्क फ्रॉम होम'  का मतलब था कि संपादक अपने घर में रहकर बुलेटिन बनाएं, समाचार वाचक अपने घर में रहकर उस तैयार बुलेटिन को लाइव पढ़े और श्यामला हिल्स स्थित आकाशवाणी भोपाल के स्टूडियो से उसका लाइव प्रसारण किया जाए। समाचार बुलेटिन के लिए खबरों का चयन, संपादन, टाइपिंग, संयोजन, हेडलाइन का चयन जैसे कामों के लिए हमने कार्यालय के अल्पविकसित लैपटाप और रेंगते इंटरनेट के साथ काम शुरू किया। 

समयाभाव में यह भी संभव नहीं था कि मेरी संपादित खबरों को कोई और देख ले या मैं ही किसी और की खबरों को मुख्य संपादक या समाचार प्रमुख के नाते प्रसारण के पहले उन समाचारों की समीक्षा और संशोधन कर सकूं। इसके अलावा, राज्य संवाददाता के तौर पर दिल्ली के समाचारों के लिए दिन भर खुराक उपलब्ध कराना तो अनिवार्य था ही क्योंकि कोरोना संक्रमण ने उनके न्यूज़ स्त्रोत भी सुखा दिए थे । वैसे घर से समाचारों के लाइव प्रसारण का यह काम इतना आसान नहीं था जितना अब पढ़ने में लग रहा है क्योंकि आकाशवाणी में समय की पाबंदी और विश्वसनीयता दो अनिवार्य पाबंदियां हैं और जरा सी चूक किए कराए पर पानी फेर सकती थी। 

समाचार वाचक के लिए घर बैठकर समय की पाबंदी का ख्याल रखना आसान नहीं था और मेरे लिए संवाददाता-सह समाचार संपादक-सह आरएनयू हेड की तिहरी जिम्मेदारी के साथ यह समन्वय और भी दुष्कर क्योंकि दिल्ली स्थित आकाशवाणी के नेशनल न्यूज़ रुम के पास भी खबरों का संकट था और हम संवाददाता उनके एकमात्र संकट मोचक थे। 

वैसे भी, मध्यप्रदेश न केवल बड़ा राज्य है बल्कि खबरों का गढ़ भी है इसलिए बतौर मध्यप्रदेश संवाददाता दायित्व और भी बढ़ गया था। पहले इंदौर में आरएनयू और अलग संवाददाता होने के कारण जिम्मेदारी आधी हो जाती थी लेकिन इंदौर ऑफिस बंद होने के बाद तो यह जिम्मेदारी और खासकर कोविड काल में काम तो कई गुना बढ़ गया था।   

खैर, हमने अपने पूरे अनुभव, साख और टीम भावना का इस्तेमाल कर घर से समाचारों का प्रसारण शुरू किया और पहली ही बुलेटिन की फूल प्रूफ सफलता ने कमाल कर दिया। फिर क्या था हमारी समाचार वाचक संयुक्ता बैनर्जी और दीपा सिंह ने अपनी सधी  आवाज,स्पष्ट उच्चारण और कल कल बहते झरने जैसे अंदाज में वर्क फ्राम होम को ऐसा अपनाया कि श्रोताओं तो क्या आकाशवाणी के अन्य सहयोगियों को भी पता नहीं चल पाया कि समाचारों का प्रसारण कहां से हो रहा है।  

जब हमने समाचार प्रेषण, संपादन, प्रस्तुतीकरण का यह नया अंदाज पेश किया तो जमकर सराहना भी मिली। प्रदेश के मीडिया ने जमकर आशीष लुटाया तो आकाशवाणी मुख्यालय ने भी इसे हाथों हाथ लिया। आरएनयू भोपाल के इन प्रयासों की समाचार सेवा प्रभाग की तत्कालीन प्रमुख महानिदेशक और प्रसार भारती के सीईओ ने भी जमकर सराहना की है। उन्होंने ट्वीट के जरिये इसे देश भर में न केवल प्रचारित किया बल्कि प्रसार भारती ने इस पर बाकायदा एक वीडियो बनवाकर भोपाल के प्रयासों को सोशल मीडिया में साझा करते हुए इसे समाचार प्रसारण का ‘भोपाल मॉडल’ नाम दे दिया। 

यह नाम और काम इतना चर्चित हुआ कि अनेक आरएनयू के साथियों ने मदद मांगी और तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने तो मंत्रालय की मीडिया इकाइयों से संवाद के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि भोपाल वाले यहां हैं न?   मुझे 2014 से लेकर 2025 तक करीब 11 साल तक लगातार संवाददाता और राज्य संवाददाता का दायित्व संभालने का मौका मिला। इसमें लगभग चार साल असम के सिलचर की दुर्गम परिस्थितियों में और सात साल देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में। असम में स्थानीय भाषा की अज्ञानता और दुष्कर परिस्थितियों ने रास्ता मुश्किल बनाया तो मैंने स्थानीय पत्रकारों से मित्रता कर इसे सहज कर लिया। 

रिपोर्टिंग के इन ग्यारह सालों में से भी करीब सात साल संवाददाता के साथ साथ समाचार एकांश के प्रमुख की जिम्मेदारी भी शामिल रही। असम में कार्यकाल के दौरान बंगलादेश से लगी सीमा पर स्थित बराक घाटी से बेहतर समाचार प्रेषण और प्रबंधन के लिए हमें ‘देश के सर्वश्रेष्ठ समाचार एकांश’ का सम्मान भी मिला और तत्कालीन उप राष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी के साथ ईस्ट अफ्रीकी देशों की यात्रा के कवरेज का स्वर्णिम अवसर भी। इस यात्रा के खट्टे मीठे और अनूठे अनुभवों पर मैने ‘चार देश चालीस कहानियां’ नामक पुस्तक भी लिखी है और उसे पाठकों के साथ साथ वरिष्ठ अधिकारियों की सराहना भी मिली। इस पुस्तक में अनजान देशों में  सांस्कृतिक संघर्ष, विकास की पहल, स्वच्छता के प्रयास और खाने पीने के अनुभवों पर कई दिलचस्प किस्से हैं। 

इसी तरह, भोपाल में बेहतर रिपोर्टिंग के कारण  मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान में जी 20 देशों के सम्मेलन को कवर करने का अवसर मिला। भोपाल से दिल्ली, फिर हांगकांग और ओसाका तक की अविस्मरणीय यात्रा और कवरेज का अनुभव वाकई परिपक्व बनाने वाला रहा। फिर तो देश के तकरीबन हर राज्य में चुनाव कवरेज,संसदीय एवं विधानसभा रिपोर्टिंग और भारत में हुए जी 20 सम्मेलन के कवरेज की टीम का मैं अनिवार्य हिस्सा बन गया..और राज्य संवाददाता का दर्जा एक तरह से राष्ट्रीय संवाददाता का हो गया।  इस दौरान यह भी पता चला कि आकाशवाणी को भले ही एक तबका ‘डाइंग मीडियम’ कह रहा हो लेकिन समाचारों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हमारी अच्छी रिपोर्ट पर आज भी देश भर से फोन आ जाते हैं और किसी त्रुटि पर शिकायतों का अंबार लग जाता है। 

एक रिपोर्ट में गणेश चतुर्थी पर ऐच्छिक अवकाश को गलती से अवकाश कह देने पर उसकी पुष्टि के लिए इतने फोन आ गए थे कि कान दर्द करने लगा और फोन करने/ करवाने वालों में कलेक्टर, प्राचार्य और कई उच्च पदस्थ लोग थे। इसी तरह जब  मैने आकाशवाणी भोपाल के समाचारों में हर रविवार को सकारात्मक समाचारों पर केंद्रित ‘अच्छी खबर’ नामक नया प्रयोग किया तो खूब वाहवाही मिली और प्रसार भारती से अनेक पुरस्कार भी। संवाददाता के रूप में मेरे एक अन्य प्रयास ‘मध्यप्रदेश में महात्मा’ को तो देश भर में आकाशवाणी में हुईं अभिनव पहल में सबसे पहला स्थान मिला। इसमें महात्मा गांधी की मध्यप्रदेश की यात्राओं की रोचक अंदाज में रिपोर्टिंग की गई थी । फिर तो  समान नागरिक संहिता पर ‘जानना जरूरी है’, देश एवं प्रदेश के चुनावों पर ‘आपका वोट आपका फैसला’ और समसामयिक कार्यक्रम ‘सुखियों में’ जैसे समाचार कवरेज आधारित सेगमेंट ने हमारी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।  

कुल मिलाकर आकाशवाणी के साथ एक दशक से ज्यादा का यह सफर उपलब्धियों, नई शुरुआत और सराहना से सराबोर रहा। इस दौरान इतना कुछ देखने, सीखने, लिखने के साथ साथ कवरेज के अवसर मिले कि उन पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं। मैं, अपने अनुभव के आधार पर दावे से यह बात कह सकता हूं कि यदि आप सूचना और प्रसारण मंत्रालय की सूचना सेवा के अधिकारी हैं और आपने यदि आकाशवाणी में संवाददाता का दायित्व नहीं निभाया तो समझिए आपने इस सरकारी सेवा का एक स्वर्णिम अवसर खो दिया।

जब सैनिकों के सम्मान में बाहर ही उतार दी चप्पल…!!

वीर सैनिकों के लिए आयोजित कार्यक्रम में जब एक महिला चप्पल बाहर उतारकर शामिल हुई तो कार्यक्रम में मौजूद आम लोगों के साथ सैन्य अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गए। सैनिकों के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा का भाव आजकल कम ही देखने को मिलता है कि उनके सम्मान समारोह को मंदिर की तरह पवित्र भाव से महसूस किया जाए। सनातनी परंपरा में तो मंदिर के बाहर ही जूते चप्पल उतारकर अंदर जाया जाता है लेकिन सैनिकों के सम्मान में चप्पल बाहर उतारकर आना वाकई हतप्रभ करने वाला मामला था।   

दरअसल, कारगिल युद्ध की वर्षगांठ और इस दौरान हुए आपरेशन विजय में हिस्सा लेने वाले पूर्व सैनिकों के सम्मान में हिमाचल प्रदेश में सैन्य प्रशिक्षण कमान, शिमला ने मशहूर रिज (मॉल रोड) पर कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम में एक महिला के चप्पल बाहर उतारकर आने ने सभी का ध्यान खींच लिया। सभागार की व्यवस्था सम्भाल रहे सैनिकों ने उनसे चप्पल पहने रहने का आग्रह किया लेकिन वे तैयार नहीं हुई। दो से तीन बार अनुरोध के बाद ही उस महिला ने चप्पल पहनी। 

यह महज एक वाकया नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश में सैनिकों के प्रति आदर भाव का उदाहरण है। और इतना आदर दिया भी क्यों न जाए…हिमाचल प्रदेश को भले ही आमतौर पर देवभूमि कहा जाता है लेकिन इसे ‘वीर भूमि’ कहना भी उतना ही सार्थक है। सोचिए, जिस राज्य ने अब तक चार परमवीर चक्र और दस महावीर चक्र विजेता जांबाज दिए हों, वह वीरभूमि ही तो होगी। देश का ‘पहला’ सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र भी हिमाचल प्रदेश के हिस्से ही आया था।

 मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले परमवीर चक्र विजेता हैं और इसी प्रदेश के शूरवीर थे। इसके अलावा, इस राज्य से अब तक मेजर धन सिंह थापा, कैप्टन विक्रम बत्रा और राइफलमैन संजय कुमार भी इस सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। इतना ही नहीं, तीन अशोक चक्र और 18 कीर्ति चक्र विजेता भी यहीं से हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि अशोक चक्र शांतिकाल में परमवीर चक्र जैसा ही सम्मान माना जाता है। इसके अलावा, वीर चक्र और सेना मैडल की तो गिनती ही नहीं की जा सकती।  

इस राज्य की माटी में घुली वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कारगिल युद्ध में शहीद हुए कुल 527 सैनिकों में से 52 हिमाचल प्रदेश के थे। करीब 69 लाख की आबादी वाले इस राज्य से हर साल लगभग 5,000 सैनिकों का चयन किया जाता है । सेना में शामिल होने के इच्छुक युवाओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। राज्य में लगभग तीन लाख सेवारत या सेवानिवृत्त सैनिक और उनकी विधवाएँ हैं। अगर उनके परिवारों को भी शामिल कर लिया जाए, तो हिमाचल प्रदेश में रक्षा क्षेत्र से जुड़े लगभग आठ लाख लोग निवास करते हैं। 

  यहां गांव गांव में वीरता की कहानियां बिखरी हैं और नौजवान सेना में जाना नौकरी से ज्यादा अपना कर्तव्य समझते हैं। शायद राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने हिमाचल जैसे किसी राज्य की वीरता से प्रभावित होकर ही ‘पुष्प की अभिलाषा’ नामक कालजयी कविता लिखी थी क्योंकि यहां का युवा भी कहता है:  

चाह नहीं, मैं सुरबाला के  गहनों में गूँथा जाऊँ। 

चाह नहीं, प्रेमी-माला में  बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥  

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर,  हे हरि, डाला जाऊँ। 

चाह नहीं, देवों के सिर पर  चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥  

मुझे तोड़ लेना वनमाली! 

उस पथ में देना तुम फेंक॥ 

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने। 

जिस पथ जावें वीर अनेक॥  

इसलिए, सैनिकों के सम्मान में किसी महिला का चप्पल उतारकर आना यहां के लोगों के लिए खबर नहीं है..कोई और राज्य होता तो अब तक वह महिला मीडिया की सनसनी बन चुकी होती।

केसरिया बालम, आओ नी..पधारो म्हारे देश..!!

शाम का वक्त है, क्वीन ऑफ हिल्स शिमला में दिन भर के बाद थका मांदा सूरज पहाड़ों की चोटियों के पीछे छिपकर आराम करने को बेताब है और यही वह वक्त है जब प्रकृति अपना सबसे अनोखा जादू बिखेर रही है। शिमला और शायद सभी पहाड़ों में सांझ का आलम कुछ ऐसा होता है, मानो आकाश ने सिंदूरी रंग का कंबल ओढ़ लिया हो। लाल, केसरिया और गुलाबी रंगों के मेल से प्रकृति का चितेरा आसमान में एक ऐसी मनमोहक तस्वीर रचता है कि हम बस अचंभित से देखते रह जाते हैं । यह खूबसूरत नजारा केवल आंखों को सुकून नहीं देता, बल्कि दिल को भी शांति और ठहराव का अहसास कराता है।

ऐसा लगता है जैसे ‘सूरज हुआ मद्धम, चांद जलने लगा..’, ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश..’, ‘आ के तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी, मेरे मन को महकाए तेरे मन की कस्तूरी..’, ‘सुरमई शाम इस तरह आए सांस लेते हैं जिसतरह साए..’, ‘वो शाम कुछ अजीब थी..’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए..’ जैसे पुराने लोकप्रिय गीतों से लेकर नए दौर का ‘शाम गुलाबी, सहर गुलाबी पहर गुलाबी है, गुलाबी ये शहर..’ जैसे तमाम गाने गीतकारों ने किसी पहाड़ी शहर में बैठकर ही लिखे होंगे क्योंकि ऐसे अद्भुत दृश्य देखकर कलम अपने आप मचलने लगती है।

वैसे तो, पहाड़ों की एक दूसरे से ऊंचाई में प्रतिस्पर्धा करती चोटियां दिन भर सूरज की किरणों से चमकती रहती हैं लेकिन शाम ढलते ही वे एक सुखमयी शांति में डूब जाती हैं मानो दिनभर की थकान उतारने के लिए वे ‘मेडिटेशन’ कर रही हों। हवा में हल्की ठंडक महसूस होने लगती है और पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और उन पर जमे पक्षियों का कलरव सूरज के लिए विदाई गीत सा प्रतीत होने लगता है। 

यही वह समय होता है जब प्रकृति किसी बहरूपिए की तरह पल-पल में रंग बदलने लगती है जैसे कोई चित्रकार अपनी तूलिका से नए-नए रंग बिखेर रहा हो। पहले हल्का पीला, फिर सुनहरा, और फिर धीरे-धीरे गहरा सिंदूरी। यह रंग जब पेड़ों,पहाड़ों और घाटियों पर उतरते हैं तो ऐसा लगता है जैसे आसमान ने अपने प्रिय चांद के स्वागत के लिए दिन भर का सबसे सुंदर रूप सजा दिया है। आसमान की सुंदरता में चार चांद लगाते बादल भी दिन भर सफेद पहनावे के बाद शाम को सुनहरे रंग में रंग जाते हैं..और फिर जैसे ही शहर रात के आगोश में समाता है,पहाड़ों पर घरों की रोशनी सितारों सी दमकने लगती है।

पहाड़ों पर पर्यटकों को भी शायद इसी समय का इंतजार रहता है और वे इस नजारे को अपने कैमरे और दिल में कैद करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। यही वह पल है जब लगता है समय ठहर-सा गया है और जीवन की आपा धापी को भूलकर हर कोई प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य में खो गया है।

सिंदूरी आसमान सिर्फ रंगों का खेल नहीं बल्कि एक अनुभूति है। यह क्षण हमें स्मरण कराता है कि जीवन में कितनी ही भागदौड़ क्यों न हो, कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जो हमें रुककर शांति और सुकून से जीने का सबक देते हैं। खास बात यह है कि पहाड़ों की सांझ का यह नजारा हर बार नया सा लगता है। 

तो अगली बार जब आप किसी पहाड़ी स्थल पर जाएं और सूरज ढलने लगे तो रुकिए जरूर और महसूस कीजिए उस सिंदूरी छटा को और आनंद लीजिए प्रकृति की उस दिन की कहानी का… और हां, अपने दिल में प्रकृति के इस जादू को पूरीतरह भर भी लीजिए ताकि यह नजारा, यह अनुभव, यह सुकून, यह शांति, रंगों की यह जादूगरी और प्रकृति की चित्रकारी हमेशा आपके साथ रहे ।


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