सोमवार, 18 अगस्त 2025

हंगामा है क्यों बरपा..शादी ही तो की है!!

गुलाम अली की यह एक लोकप्रिय ग़ज़ल है- ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।’ अकबर इलाहाबादी की लिखी इस ग़ज़ल का मतलब है- ‘ जरा सी बात पर बेवजह शोर क्यों मचा है, क्यों हंगामा कर रहे हैं।’ इस ग़ज़ल का उल्लेख इसलिए क्योंकि कुछ इसी तरह के हंगामे की स्थिति देश के सोशल मीडिया और मीडिया की ‘वायरल प्रवृत्ति’ ने हिमाचल प्रदेश में हुई एक शादी को लेकर बना रखी है। उनके लिए यह शादी किसी अजूबे से कम नहीं है और जब विषय वायरल होने का माद्दा रखता हो तो फिर सोशल मीडिया के वीर कैसे पीछे रह सकते हैं। 

दरअसल,हिमाचल प्रदेश में हाटी समुदाय के दो भाइयों द्वारा एक ही लड़की के साथ विवाह करने के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि देश तो देश, विदेशी मीडिया हाउस भी इसमें दिलचस्पी दिखाने लगे। सामान्य रूप से सामाजिक परंपराओं के लिहाज से यह विवाह अलग और अनूठा भी है लेकिन उस क्षेत्र और समुदाय के लिए सामान्य बात है। 

यही वजह है कि जब मीडिया ने उस गांव या समुदाय के लोगों से इस विवाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो अधिकतर का यही उत्तर था कि इसमें नई बात क्या है? इनका कहना गलत भी नहीं है क्योंकि उस समुदाय और उस क्षेत्र के लिए यह वर्षों पुरानी सामान्य परंपरा है। वैसे तो यह वाकया हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले के शिलाई इलाके का था लेकिन सिरमौर क्या, किन्नौर और लाहौल-स्पीति सहित कई जिलों में विभिन्न समुदायों में बहुपति या बहु पत्नी जैसी प्रथाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। 

यदि हम देश के तमाम राज्यों में खासतौर पर आदिवासी और पारंपरिक संस्कारों के पोषक समाज में प्रचलित संस्कृतियों को देखें तो आज  उन्हें जानकार हमें अचरज ही होगा मसलन मध्यप्रदेश में भील आदिवासियों में दूल्हे को ससुराल में रखने वाली घर जंवाई प्रथा, अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने की नाता प्रथा, विवाह पूर्व यौन संबंध वाली लामसेना प्रथा जैसी तमाम परंपराएं प्रचलित हैं। 

वहीं, इसी प्रदेश के झाबुआ जिले का भगोरिया मेला युवक युवतियों के जीवन साथी चुनने की आजादी के लिए विख्यात है। मणिपुर में मैतेई समाज में लुंहोंगबा प्रथा आज भी चलन में है इसमें लड़का अपनी पसंद की लड़की को समाज और परिवार की स्वीकृति से भगाकर ले जाता है और फिर उनकी सहमति के आधार पर परिवार उनकी शादी कर देता है। वहीं,ढूकु विवाह प्रथा में लड़का लड़की आज के लिव इन की तरह साथ रहने लगते हैं, बाद में समाज कुछ जुर्माना लगाकर उनके विवाह को स्वीकृति देता है। 

जहां तक बहुपति (Polyandry) प्रथा का प्रश्न है तो विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तराखंड के कुछ समुदायों, दक्षिण भारत के नीलगिरी के टोडा आदिवादियों और त्रावनकोर के नांजनाद समाज में,केरल के नायर और थियास समाज में यह परंपरा प्रचलित रही है। मुस्लिम समाज में बहु पत्नी (polygamy) प्रथा तो सामान्य बात है।  

अब बात हिमाचल प्रदेश के उस बहुचर्चित विवाह और वहां की परंपराओं की, तो बहुपति प्रथा यहां सिरमौर, किन्नौर  और लाहौल-स्पीति में सामान्य बात है। ताजा मामला सिरमौर जिले के हाटी समुदाय का है। हाटी समुदाय अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। 

हम सभी जानते हैं कि बहुपति प्रथा का सबसे उल्लेखनीय प्रसंग महाभारत में है जिसमें द्रौपदी का विवाह पांच पांडव भाइयों से हुआ था। हाटी समुदाय में भी बहु पति प्रथा को जोड़ीदारां या द्रौपदी प्रथा जैसे विभिन्न नामों से नाम से जाना जाता है। 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह प्रथा पांडवों की परंपरा से ही प्रेरित है। उल्लेखनीय बात यह है कि  हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा मुख्य रूप से भाइयों के बीच सामूहिक विवाह की प्रणाली है, जहां एक महिला कई भाइयों (आमतौर पर सगे भाइयों) की साझा पत्नी होती है।   

हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारक हैं मसलन पहाड़ी भूभाग और सीमित उपजाऊ भूमि के कारण परिवारों के लिए संपत्ति का बंटवारा चुनौतीपूर्ण है। बहुपति प्रथा के माध्यम से, परिवार की संपत्ति और भूमि एक इकाई के रूप में बनी रहती है, जिससे आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।  

इसी तरह, इस प्रथा से भाइयों के बीच एकता और सहयोग बना रहता है। परिवार के सभी पुरुष सदस्य एक साथ मिलकर खेती, पशुपालन, और अन्य आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। हाटी समुदाय के लोगों का कहना है कि यह प्रथा परिवार और समुदाय की संरचना को मजबूत करती है। 

हिमाचल के वरिष्ठ पत्रकार और हाटी समुदाय के प्रवक्ता रमेश सिंगटा बताते हैं कि हमारे समुदाय में बहुपति प्रथा में एक महिला का विवाह एक परिवार के सभी भाइयों से होता है, चाहे उनकी संख्या दो हो या अधिक। विवाह के बाद, पत्नी परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। बच्चों को सभी भाइयों की साझा संतान माना जाता है, और सबसे बड़े भाई को सामान्यतः पिता के रूप में स्वीकार किया जाता है। 

इस प्रथा में पत्नी को परिवार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता है, और वह घरेलू निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रथा में कुछ नियम और परंपराएं भी हैं, जैसे कि भाइयों के बीच समय का बंटवारा और पारस्परिक सहमति। जो यह सुनिश्चित करता है कि परिवार में सामंजस्य बना रहे।  

हाटी समुदाय की अनुमानित जनसंख्या लगभग 2 लाख है जो हिमाचल के सैकड़ों गांवों और करीब डेढ़ सौ से ज्यादा पंचायतों में फैली है। यहां तकरीबन हर गांव और परिवार में बहुपति प्रथा के तहत विवाह हुआ है और वे पीढ़ियों से मिल जुलकर सहज भाव से रह रहे हैं। हाल में सिरमौर जिले में दो भाइयों प्रदीप और कपिल नेगी द्वारा सुनीता नामक युवती से धूमधाम से किए गए विवाह ने भले ही बहुपति प्रथा को पुनः चर्चा में ला दिया है लेकिन इससे उलट हकीकत यह है कि आधुनिकता, शिक्षा, और शहरीकरण के प्रभाव से हाटी समुदाय में भी बहुपति प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है।   

युवा पीढ़ी, विशेष रूप से शिक्षित युवा, इस प्रथा को अपनाने में कम रुचि दिखा रहे हैं। इसका कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एकल विवाह की अवधारणा के साथ साथ नई पीढ़ी की खेती के अलावा अन्य पेशों में रुचि बढ़ना भी है। इससे संपत्ति के बंटवारे की आवश्यकता भी कम हो रही है।  

हाटी समुदाय की बहुपति प्रथा हालांकि सामुदायिक एकता और संसाधनों के संरक्षण पर आधारित है लेकिन यह प्रथा आधुनिक समाज में कई सामाजिक और कानूनी सवाल भी उठाती है, विशेष रूप से लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह प्रथा महिलाओं की स्वायत्तता को सीमित करती है, जबकि समुदाय के भीतर इसे एक सहमति-आधारित व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। 

वैसे इस प्रथा को समझने के लिए हमें इसे केवल आधुनिक और कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखना होगा तभी हम इसके सभी पहलुओं को समझ सकते हैं।

फिल्म शोले में गीत-संगीत: कालजयी विरासत

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो अपनी कहानी, किरदारों और संगीत के दम पर अमर हो जाती हैं। रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित 1975 में रिलीज़ हुई फिल्म शोले ऐसी ही एक कृति है, जिसने न केवल भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी, बल्कि इसके गीत-संगीत ने भी दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी। 

शोले का संगीत, जिसे संगीतकार आर.डी. बर्मन और पंचम दा के नाम से लोकप्रिय  राहुल देव बर्मन ने तैयार किया, और जिसके बोल आनंद बख्शी ने लिखे, आज भी उतना ही ताज़ा और प्रासंगिक है, जितना वह अपने समय में था।   शोले का संगीत अपने आप में एक अनूठा मिश्रण है, जिसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत का सामंजस्य देखने को मिलता है। 

पंचम दा ने इस फिल्म के लिए संगीत रचते समय न केवल कहानी की गहराई को समझा, बल्कि किरदारों की भावनाओं और परिस्थितियों को भी संगीत के माध्यम से जीवंत किया। फिल्म के गीत विविधता से भरे हैं—कभी रोमांटिक, कभी हास्यपूर्ण, कभी भावनात्मक, और कभी उत्साहवर्धक।  

फिल्म का सबसे मशहूर गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" दोस्ती की भावना को इस तरह व्यक्त करता है कि यह आज भी दोस्ती का प्रतीक बन चुका है। इस गीत में किशोर कुमार और मन्ना डे की जुगलबंदी, आर.डी. बर्मन के संगीत और आनंद बख्शी के सरल लेकिन प्रभावशाली बोलों ने इसे एक कालजयी रचना बना दिया। गीत का संगीत संयोजन, जिसमें गिटार, ड्रम और भारतीय वाद्य यंत्रों का मिश्रण है, इसे एक अनूठा अंदाज़ देता है। यह गीत न केवल जय और वीरू की दोस्ती को दर्शाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति में दोस्ती के मूल्यों को भी रेखांकित करता है।  

शोले के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कहानी के साथ पूरी तरह से एकीकृत हैं। प्रत्येक गीत फिल्म के कथानक को आगे बढ़ाता है और किरदारों की भावनाओं को गहराई देता है। उदाहरण के लिए, "होली के दिन दिल ख़िल जाते हैं" एक उत्सव गीत है, जो होली के रंगों और ग्रामीण परिवेश की मस्ती को दर्शाता है। इस गीत में किशोर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ें, साथ ही आर.डी. बर्मन का जीवंत संगीत, दर्शकों को रामगढ़ के उत्सव में शामिल कर लेता है। इस गीत का चित्रण भी उतना ही प्रभावशाली है, जिसमें रंगों और नृत्य का समन्वय कहानी को हल्का-फुल्का और आनंदमय बनाता है।  

वहीं, "महबूबा महबूबा" एक ऐसा गीत है, जो अपने बोल्ड और कामुक अंदाज़ के लिए जाना जाता है। हेलेन का नृत्य और आर.डी. बर्मन की आवाज़ इस गीत को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है। यह गीत गब्बर के डाकुओं के अड्डे की माहौल को दर्शाता है और फिल्म के खलनायक की क्रूरता और रहस्यमयी व्यक्तित्व को उजागर करता है। इस गीत में पश्चिमी जैज़ और भारतीय लोक संगीत का मिश्रण इसे एक अनोखा स्वाद देता है।  

"जब तक है जान" गीत बसंती के किरदार को और गहराई देता है। इस गीत में लता मंगेशकर की आवाज़ बसंती की मजबूती और जीवटता को दर्शाती है। यह गीत न केवल बसंती के नृत्य कौशल को प्रदर्शित करता है, बल्कि उसकी भावनाओं और उसके प्रेम को भी सामने लाता है।  

शोले का बैकग्राउंड म्यूजिक भी उतना ही प्रभावशाली है, जितने इसके गीत। आर.डी. बर्मन ने फिल्म के हर दृश्य के लिए ऐसा संगीत रचा, जो दर्शकों को कहानी के मूड में डुबो देता है। गब्बर सिंह के प्रवेश दृश्य में भारी और रहस्यमयी संगीत, जय और वीरू की मस्ती भरे दृश्यों में हल्का और चुलबुला संगीत, और ठाकुर के दुखद अतीत को दर्शाने वाले दृश्यों में भावनात्मक संगीत, जया और अमिताभ का आमना सामना होने पर संगीत—हर नोट कहानी को और गहरा बनाता है। 

गब्बर के डायलॉग "कितने आदमी थे?" के साथ बजने वाला संगीत आज भी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है।  शोले के गीत-संगीत का प्रभाव केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहा; इसने भारतीय समाज और संस्कृति पर भी गहरा असर डाला। "ये दोस्ती" गीत आज भी दोस्ती के अवसरों पर गाया जाता है, और "महबूबा महबूबा" का रीमिक्स आज भी डांस नंबर्स में लोकप्रिय है। 

इन गीतों ने न केवल उस दौर के दर्शकों को प्रभावित किया, बल्कि नई पीढ़ी के बीच भी उतनी ही लोकप्रियता बरकरार रखी।  आर.डी. बर्मन का संगीत और आनंद बख्शी के बोलों ने शोले को एक ऐसी फिल्म बनाया, जिसके गीत हर उम्र और वर्ग के लोगों को पसंद आए। इन गीतों की सादगी और गहराई ने इसे हर भारतीय के दिल तक पहुंचाया। 

शोले के संगीत में आर.डी. बर्मन की तकनीकी प्रतिभा साफ झलकती है। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों और ध्वनियों का उपयोग कर एक ऐसा अनुभव रचा, जो दर्शकों को बांधे रखता है। उदाहरण के लिए, "महबूबा महबूबा" में ड्रम और सितार का मिश्रण एक अनोखा प्रभाव पैदा करता है। इसी तरह, पृष्ठभूमि संगीत में उन्होंने सस्पेंस और ड्रामा पैदा करने के लिए न्यूनतम लेकिन प्रभावी ध्वनियों का उपयोग किया।  

शोले का गीत-संगीत भारतीय सिनेमा की एक ऐसी धरोहर है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है। आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जोड़ी ने इस फिल्म के लिए ऐसी रचनाएँ दीं, जो न केवल कहानी को समृद्ध करती हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों में गहरी पैठ बनाती हैं। चाहे "ये दोस्ती" की मस्ती हो, "महबूबा" का जादू, या "जब तक है जान" की भावना—हर गीत अपने आप में एक कहानी कहता है। 

शोले  का संगीत न केवल एक फिल्म का हिस्सा है, बल्कि यह भारतीय सिनेमा और संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। यह संगीत आज भी हमें उस दौर में ले जाता है, जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा थी।  हालांकि, 

कुछ फिल्म आलोचकों का यह भी मानना है कि शोले के गीत-संगीत में कुछ सीमाएँ और कमियाँ भी देखी जा सकती हैं, जिन्हें अक्सर इसकी लोकप्रियता के चलते अनदेखा कर दिया जाता है। उनके मुताबिक सबसे पहली कमी यह रही कि फिल्म की गंभीर और एक्शन प्रधान कथा में गीतों की उपस्थिति कुछ स्थानों पर असंगत प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, "मेहबूबा मेहबूबा" गीत कथा की प्रवाहशीलता को थोड़ी देर के लिए रोक देता है और फिल्म की मूल भावनात्मक लय से थोड़ा हटकर लगता है। यह गीत अधिक प्रदर्शनकारी और शैलीपरक है, जो मुख्य कहानी के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता। इसके अलावा, फिल्म की प्रमुख महिला पात्रों – बसंती और राधा – को लेकर कोई गंभीर या भावनात्मक गीत नहीं रचा गया, जिससे उनके किरदारों की गहराई संगीत के माध्यम से व्यक्त नहीं हो सकी।

 हालाँकि आर. डी. बर्मन ने तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट संगीत दिया, पर कुछ गीत फिल्म की कथा से अधिक स्वतंत्र लगते हैं, जिससे संपूर्ण संगीत अनुभव कुछ हद तक असंतुलित हो जाता है। इस दृष्टि से शोले का संगीत कलात्मक रूप से प्रभावशाली होते हुए भी पूरी तरह निष्कलंक नहीं कहा जा सकता।

 समीक्षकों की राय जुदा हो सकती है लेकिन यदि आम दर्शक के लिहाज से देखें तो हिंदी सिनेमा की इस कालजयी फिल्म शोले  का संगीत न केवल फिल्म की आत्मा बन गया, बल्कि भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी साबित हुआ। फिल्म के गीतों में विविधता है—दोस्ती, प्रेम, उत्सव और ताजगी—हर भाव को संगीतमय अभिव्यक्ति मिली है। गीतो की मेलोडी, शब्दों और गायन में जो अपनापन है, वह आज भी दिलों को छू जाता है। 

आर. डी. बर्मन ने पारंपरिक और आधुनिक ध्वनियों का अद्भुत संगम कर फिल्म को संगीतमय ऊँचाई दी। शोले के गीत फिल्म की कथा में सहज रूप से घुलते हैं और हर दृश्य को भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। यही कारण है कि शोले का संगीत आज भी उतना ही ताजा और प्रभावशाली लगता है।

'वर्क फ्रॉम होम' से रचा इतिहास और लिख दी भरोसे की नई इबारत

आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग के राज्य संवाददाता के तौर पर हमारे पास नेशनल न्यूज़ रुम से केवल खबरों और वॉयस ओवर के लिए ही फोन आते हैं लेकिन यदि आकाशवाणी समाचार की प्रमुख महानिदेशक का फोन आए तो चौंकना लाज़िमी है और संदेशा भी ऐसा कि ‘आप तत्काल प्रभाव से प्रादेशिक समाचार एकांश (आरएनयू), भोपाल का प्रसारण 14 दिन के लिए बंद कर दिए दीजिए और अपनी पूरी टीम के साथ क्वारंटाइन हो जाइए.....’।

वैसे तो किसी भी कार्यालय और कर्मचारियों के लिए बिन मांगे एक पखवाड़े की छुट्टी मिलना लाटरी निकलने जैसा था लेकिन हुआ उल्टा....हमारे न्यूज़ रूम में मुर्दैनी सी छा गयी,सभी के चेहरे लटक गए और मुझे लगा कि ज्यादा बात की तो दिन रात धुंआधार समाचार बनाने-टाइप करने-पढने वाली हमारी टीम के कई सदस्य रो पड़ेंगे...।

आखिर जब प्रदेश के लोगों को सबसे ज्यादा हमारी और आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले विश्वसनीय समाचारों की जरूरत थी तब यदि हम चुपचाप घर बैठ जाएँ तो ये हमारे काम और सबसे ज्यादा हमारे साथ सालों से जुड़े श्रोताओं के साथ नाइंसाफी होगी और एक तरह का धोखा होगा।  मैंने जून 2018 में भोपाल में राज्य संवाददाता के साथ साथ एकांश प्रमुख का कार्यभार संभाला था जबकि डीजी के आदेश वाली यह बात है साल 2000 में मार्च के आखिरी हफ्ते की, तब कोविड-19 महज एक बीमारी नहीं बल्कि खौफ़ था, साक्षात् यमराज से साक्षात्कार के समान था और एक ऐसा डर था जिसने आम लोगों, समाज, प्रदेश और देश को हिलाकर रख दिया था। 

भय तो आज भी है लेकिन अब हम इस बीमारी से निपटने में सक्षम हैं और हमारे पास बेहतरीन चिकित्सा सुविधाओं के साथ साथ कोविड वैक्सीन भी हैं। अब भारत ही नहीं दुनिया भर में कोरोना संक्रमण से निपटने के तमाम तरीके तैयार कर लिए गए हैं लेकिन तब बस लॉक डाउन ही एक सहारा था और आज की नवजवान पीढ़ी के साथ पहले की कई पीढ़ियों को भी महीनों के ऐतिहासिक लॉक डाउन से रूबरू होना पड़ा था। 

याद कीजिये, किसी शहर-कालोनी में एक भी कोरोना संक्रमित मिल जाता था तो पूरा इलाक़ा सील कर पुलिस का सघन पहरा बिठा दिया जाता था और जानकारी के अभाव में लोग उस इलाके के आसपास से निकलने से भी डरते थे क्योंकि तब संक्रमण को खतरनाक और छूत की बीमारी जैसा समझा जाता था।  ये वो दौर था, जब सैनेटाइजर किसी चमत्कारी जड़ी-बूटी और मास्क हमारी कारों में लगे एयर बैग से ज्यादा सुरक्षा देने वाले कवच बन रहे थे और अफवाहों, भ्रम फैलाने वाली ख़बरों और अनजाने डर से भयभीत आम लोगों को सत्य, बिना मिलावट के और सौ टका विश्वसनीय समाचारों की सबसे ज्यादा जरुरत थी तब आकाशवाणी के नियमित समाचार बुलेटिन को बंद करना मतलब अफवाहों और सोशल मीडिया पर फ़ैल रही भ्रामक जानकारियों को बढ़ावा देने जैसा था। इसलिए, ऊपर से मिले आदेश के बाद भी हम समाचार बुलेटिन बंद कर आराम से घर बैठ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। 

वैसे भी बतौर स्टेट कॉरेस्पॉन्डेंट मेरी यह अनिवार्य ड्यूटी थी कि रेडियो के श्रोताओं तक सही जानकारी पहुंचाकर उनका भ्रम और डर दोनों दूर करूं।    वैसे, दुनिया की इस सबसे बड़ी आपदा के समय भी नियमित समाचारों का प्रसारण बंद कर घर बैठ जाने की इस हिदायत के पीछे भी एक रोचक (तब डरावनी) कहानी है। एक ऐसी गाथा जिसने आकाशवाणी ही नहीं बल्कि भोपाल-प्रदेश और देश के तमाम समाचार पत्र समूहों और न्यूज़ चैनलों को हिला डाला था। 

 दरअसल मध्यप्रदेश में तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के मुखिया कमलनाथ ने बहुमत खो देने के कारण अपनी 15 माह पुरानी सरकार के इस्तीफे की जानकारी देने के लिए मुख्यमंत्री निवास पर पत्रकारों को आमंत्रित किया था। इस सबसे बड़ी और राज्य की राजनीति में बदलाव लाने वाली खबर की पल पल की जानकारी हासिल करने के लिए प्रदेश और देश के मीडिया समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले 200 से ज्यादा पत्रकार मुख्यमंत्री निवास में जुटे थे। 

खबर मिलने, छपने और सरकार बदलने तक तो सब ठीक था लेकिन उसके दो-तीन दिन बाद आई जानकारी ने मीडिया जगत में भूचाल ला दिया और दूसरों की नींद उड़ाने वाले पत्रकारों की भी कई दिनों तक नींद उड़ी रही।  हुआ यह कि पत्रकार वार्ता के बाद पता चला कि वहां मौजूद एक पत्रकार साथी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि तब कोरोना किसी भूत या काल जैसा था।  ये पत्रकार साथी भोपाल के उन शुरूआती लोगों में शामिल थे जो इस संक्रमण का शिकार बने।

  ....बस फिर क्या था आनन फानन में पत्रकार होम क्वारंटाइन होने लगे और जांच कराने लगे। यह खबर टेलीविजन चैनलों और हवा के घोड़े पर सवार सोशल मीडिया के जरिये हमारे दिल्ली स्थित मुख्यालय तक भी पहुँच गयी और हमें यह बताना पड़ा कि मुख्यमंत्री निवास की उस पत्रकार वार्ता में हमारे एक समाचार सहयोगी भी थे। हालाँकि कोरोना संक्रमण की यह जानकारी सामने आने के बाद बाकी पत्रकारों की तरह वे भी होम क्वारंटाइन में चले गए थे, लेकिन लगभग हफ्ते भर तक हमारे समाचार विभाग की पूरी टीम और लगभग पूरा स्टाफ उनके संपर्क में रहा इसलिए प्रशासन के नियमों, सलाह और मुख्यालय के निर्देश पर सभी को 14 दिन के लिए घरों में अलग थलग कैद होना अनिवार्य था । 

ऐसी सूरत में एक ही रास्ता था कि भोपाल से समाचारों का प्रसारण 14 दिन के लिए बंद कर दिया जाए और यही हम सभी नहीं चाहते थे।  ऐसे में रास्ता क्या था और इतना समय भी नहीं था कि सोच विचारकर फैसला लिया जाए क्योंकि आकाशवाणी के प्राइमरी चैनल के साथ साथ विविध भारती जैसे लोकप्रिय चैनल पर दिन में तीन बार समाचारों का लाइव प्रसारण और एफएम चैनल पर घंटे भर के अन्तराल में हेडलाइन्स का प्रसारण तो करना ही था। कुछ देर की ‘ब्रेन स्टार्मिंग’, अपनी जिम्मेदारी का अहसास और आकाशवाणी भोपाल के उस समय के प्रमुख धर्मेन्द्र कुमार श्रीवास्तव के आगे बढ़कर दिए गए तकनीकी सहयोग ने हमें ‘आपदा में अवसर’ तलाशने और ‘संकट में समाधान’ ढूंढने का हौंसला दिया और फिर हमने उस शुरुआत को अंजाम दिया जो बाद में ‘वर्क फ्राम होम’ के नाम से हर ऑफिस और हर कंपनी का मंत्र बन गया।    

खास बात यह है कि आकाशवाणी भोपाल ही नहीं बल्कि पूरे आकाशवाणी नेटवर्क के लिए यह पहली, अनूठी,अभिनव और नई शुरुआत थी.. मतलब हम लोगों के पास एक तरह से सरकारी क्षेत्र में नयी शुरुआत का, इतिहास रचने का अवसर था और हमने यह कर भी दिखाया। कारपोरेट सेक्टर में तो वर्क फ्राम होम आसान है लेकिन आकाशवाणी में लाइव समाचार प्रसारण में इसे आजमाना न केवल जोखिम भरा था बल्कि ‘बूमरैंग’ का ख़तरा भी था और इससे आपदा में अवसर के स्थान पर आपदा में हादसे में बदलने की आशंका भी थी । 

 आकाशवाणी भोपाल से समाचारों के प्रसारण में  'वर्क फ्रॉम होम'  का मतलब था कि संपादक अपने घर में रहकर बुलेटिन बनाएं, समाचार वाचक अपने घर में रहकर उस तैयार बुलेटिन को लाइव पढ़े और श्यामला हिल्स स्थित आकाशवाणी भोपाल के स्टूडियो से उसका लाइव प्रसारण किया जाए। समाचार बुलेटिन के लिए खबरों का चयन, संपादन, टाइपिंग, संयोजन, हेडलाइन का चयन जैसे कामों के लिए हमने कार्यालय के अल्पविकसित लैपटाप और रेंगते इंटरनेट के साथ काम शुरू किया। 

समयाभाव में यह भी संभव नहीं था कि मेरी संपादित खबरों को कोई और देख ले या मैं ही किसी और की खबरों को मुख्य संपादक या समाचार प्रमुख के नाते प्रसारण के पहले उन समाचारों की समीक्षा और संशोधन कर सकूं। इसके अलावा, राज्य संवाददाता के तौर पर दिल्ली के समाचारों के लिए दिन भर खुराक उपलब्ध कराना तो अनिवार्य था ही क्योंकि कोरोना संक्रमण ने उनके न्यूज़ स्त्रोत भी सुखा दिए थे । वैसे घर से समाचारों के लाइव प्रसारण का यह काम इतना आसान नहीं था जितना अब पढ़ने में लग रहा है क्योंकि आकाशवाणी में समय की पाबंदी और विश्वसनीयता दो अनिवार्य पाबंदियां हैं और जरा सी चूक किए कराए पर पानी फेर सकती थी। 

समाचार वाचक के लिए घर बैठकर समय की पाबंदी का ख्याल रखना आसान नहीं था और मेरे लिए संवाददाता-सह समाचार संपादक-सह आरएनयू हेड की तिहरी जिम्मेदारी के साथ यह समन्वय और भी दुष्कर क्योंकि दिल्ली स्थित आकाशवाणी के नेशनल न्यूज़ रुम के पास भी खबरों का संकट था और हम संवाददाता उनके एकमात्र संकट मोचक थे। 

वैसे भी, मध्यप्रदेश न केवल बड़ा राज्य है बल्कि खबरों का गढ़ भी है इसलिए बतौर मध्यप्रदेश संवाददाता दायित्व और भी बढ़ गया था। पहले इंदौर में आरएनयू और अलग संवाददाता होने के कारण जिम्मेदारी आधी हो जाती थी लेकिन इंदौर ऑफिस बंद होने के बाद तो यह जिम्मेदारी और खासकर कोविड काल में काम तो कई गुना बढ़ गया था।   

खैर, हमने अपने पूरे अनुभव, साख और टीम भावना का इस्तेमाल कर घर से समाचारों का प्रसारण शुरू किया और पहली ही बुलेटिन की फूल प्रूफ सफलता ने कमाल कर दिया। फिर क्या था हमारी समाचार वाचक संयुक्ता बैनर्जी और दीपा सिंह ने अपनी सधी  आवाज,स्पष्ट उच्चारण और कल कल बहते झरने जैसे अंदाज में वर्क फ्राम होम को ऐसा अपनाया कि श्रोताओं तो क्या आकाशवाणी के अन्य सहयोगियों को भी पता नहीं चल पाया कि समाचारों का प्रसारण कहां से हो रहा है।  

जब हमने समाचार प्रेषण, संपादन, प्रस्तुतीकरण का यह नया अंदाज पेश किया तो जमकर सराहना भी मिली। प्रदेश के मीडिया ने जमकर आशीष लुटाया तो आकाशवाणी मुख्यालय ने भी इसे हाथों हाथ लिया। आरएनयू भोपाल के इन प्रयासों की समाचार सेवा प्रभाग की तत्कालीन प्रमुख महानिदेशक और प्रसार भारती के सीईओ ने भी जमकर सराहना की है। उन्होंने ट्वीट के जरिये इसे देश भर में न केवल प्रचारित किया बल्कि प्रसार भारती ने इस पर बाकायदा एक वीडियो बनवाकर भोपाल के प्रयासों को सोशल मीडिया में साझा करते हुए इसे समाचार प्रसारण का ‘भोपाल मॉडल’ नाम दे दिया। 

यह नाम और काम इतना चर्चित हुआ कि अनेक आरएनयू के साथियों ने मदद मांगी और तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने तो मंत्रालय की मीडिया इकाइयों से संवाद के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि भोपाल वाले यहां हैं न?   मुझे 2014 से लेकर 2025 तक करीब 11 साल तक लगातार संवाददाता और राज्य संवाददाता का दायित्व संभालने का मौका मिला। इसमें लगभग चार साल असम के सिलचर की दुर्गम परिस्थितियों में और सात साल देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में। असम में स्थानीय भाषा की अज्ञानता और दुष्कर परिस्थितियों ने रास्ता मुश्किल बनाया तो मैंने स्थानीय पत्रकारों से मित्रता कर इसे सहज कर लिया। 

रिपोर्टिंग के इन ग्यारह सालों में से भी करीब सात साल संवाददाता के साथ साथ समाचार एकांश के प्रमुख की जिम्मेदारी भी शामिल रही। असम में कार्यकाल के दौरान बंगलादेश से लगी सीमा पर स्थित बराक घाटी से बेहतर समाचार प्रेषण और प्रबंधन के लिए हमें ‘देश के सर्वश्रेष्ठ समाचार एकांश’ का सम्मान भी मिला और तत्कालीन उप राष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी के साथ ईस्ट अफ्रीकी देशों की यात्रा के कवरेज का स्वर्णिम अवसर भी। इस यात्रा के खट्टे मीठे और अनूठे अनुभवों पर मैने ‘चार देश चालीस कहानियां’ नामक पुस्तक भी लिखी है और उसे पाठकों के साथ साथ वरिष्ठ अधिकारियों की सराहना भी मिली। इस पुस्तक में अनजान देशों में  सांस्कृतिक संघर्ष, विकास की पहल, स्वच्छता के प्रयास और खाने पीने के अनुभवों पर कई दिलचस्प किस्से हैं। 

इसी तरह, भोपाल में बेहतर रिपोर्टिंग के कारण  मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान में जी 20 देशों के सम्मेलन को कवर करने का अवसर मिला। भोपाल से दिल्ली, फिर हांगकांग और ओसाका तक की अविस्मरणीय यात्रा और कवरेज का अनुभव वाकई परिपक्व बनाने वाला रहा। फिर तो देश के तकरीबन हर राज्य में चुनाव कवरेज,संसदीय एवं विधानसभा रिपोर्टिंग और भारत में हुए जी 20 सम्मेलन के कवरेज की टीम का मैं अनिवार्य हिस्सा बन गया..और राज्य संवाददाता का दर्जा एक तरह से राष्ट्रीय संवाददाता का हो गया।  इस दौरान यह भी पता चला कि आकाशवाणी को भले ही एक तबका ‘डाइंग मीडियम’ कह रहा हो लेकिन समाचारों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हमारी अच्छी रिपोर्ट पर आज भी देश भर से फोन आ जाते हैं और किसी त्रुटि पर शिकायतों का अंबार लग जाता है। 

एक रिपोर्ट में गणेश चतुर्थी पर ऐच्छिक अवकाश को गलती से अवकाश कह देने पर उसकी पुष्टि के लिए इतने फोन आ गए थे कि कान दर्द करने लगा और फोन करने/ करवाने वालों में कलेक्टर, प्राचार्य और कई उच्च पदस्थ लोग थे। इसी तरह जब  मैने आकाशवाणी भोपाल के समाचारों में हर रविवार को सकारात्मक समाचारों पर केंद्रित ‘अच्छी खबर’ नामक नया प्रयोग किया तो खूब वाहवाही मिली और प्रसार भारती से अनेक पुरस्कार भी। संवाददाता के रूप में मेरे एक अन्य प्रयास ‘मध्यप्रदेश में महात्मा’ को तो देश भर में आकाशवाणी में हुईं अभिनव पहल में सबसे पहला स्थान मिला। इसमें महात्मा गांधी की मध्यप्रदेश की यात्राओं की रोचक अंदाज में रिपोर्टिंग की गई थी । फिर तो  समान नागरिक संहिता पर ‘जानना जरूरी है’, देश एवं प्रदेश के चुनावों पर ‘आपका वोट आपका फैसला’ और समसामयिक कार्यक्रम ‘सुखियों में’ जैसे समाचार कवरेज आधारित सेगमेंट ने हमारी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।  

कुल मिलाकर आकाशवाणी के साथ एक दशक से ज्यादा का यह सफर उपलब्धियों, नई शुरुआत और सराहना से सराबोर रहा। इस दौरान इतना कुछ देखने, सीखने, लिखने के साथ साथ कवरेज के अवसर मिले कि उन पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं। मैं, अपने अनुभव के आधार पर दावे से यह बात कह सकता हूं कि यदि आप सूचना और प्रसारण मंत्रालय की सूचना सेवा के अधिकारी हैं और आपने यदि आकाशवाणी में संवाददाता का दायित्व नहीं निभाया तो समझिए आपने इस सरकारी सेवा का एक स्वर्णिम अवसर खो दिया।

जब सैनिकों के सम्मान में बाहर ही उतार दी चप्पल…!!

वीर सैनिकों के लिए आयोजित कार्यक्रम में जब एक महिला चप्पल बाहर उतारकर शामिल हुई तो कार्यक्रम में मौजूद आम लोगों के साथ सैन्य अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गए। सैनिकों के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा का भाव आजकल कम ही देखने को मिलता है कि उनके सम्मान समारोह को मंदिर की तरह पवित्र भाव से महसूस किया जाए। सनातनी परंपरा में तो मंदिर के बाहर ही जूते चप्पल उतारकर अंदर जाया जाता है लेकिन सैनिकों के सम्मान में चप्पल बाहर उतारकर आना वाकई हतप्रभ करने वाला मामला था।   

दरअसल, कारगिल युद्ध की वर्षगांठ और इस दौरान हुए आपरेशन विजय में हिस्सा लेने वाले पूर्व सैनिकों के सम्मान में हिमाचल प्रदेश में सैन्य प्रशिक्षण कमान, शिमला ने मशहूर रिज (मॉल रोड) पर कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम में एक महिला के चप्पल बाहर उतारकर आने ने सभी का ध्यान खींच लिया। सभागार की व्यवस्था सम्भाल रहे सैनिकों ने उनसे चप्पल पहने रहने का आग्रह किया लेकिन वे तैयार नहीं हुई। दो से तीन बार अनुरोध के बाद ही उस महिला ने चप्पल पहनी। 

यह महज एक वाकया नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश में सैनिकों के प्रति आदर भाव का उदाहरण है। और इतना आदर दिया भी क्यों न जाए…हिमाचल प्रदेश को भले ही आमतौर पर देवभूमि कहा जाता है लेकिन इसे ‘वीर भूमि’ कहना भी उतना ही सार्थक है। सोचिए, जिस राज्य ने अब तक चार परमवीर चक्र और दस महावीर चक्र विजेता जांबाज दिए हों, वह वीरभूमि ही तो होगी। देश का ‘पहला’ सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र भी हिमाचल प्रदेश के हिस्से ही आया था।

 मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले परमवीर चक्र विजेता हैं और इसी प्रदेश के शूरवीर थे। इसके अलावा, इस राज्य से अब तक मेजर धन सिंह थापा, कैप्टन विक्रम बत्रा और राइफलमैन संजय कुमार भी इस सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। इतना ही नहीं, तीन अशोक चक्र और 18 कीर्ति चक्र विजेता भी यहीं से हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि अशोक चक्र शांतिकाल में परमवीर चक्र जैसा ही सम्मान माना जाता है। इसके अलावा, वीर चक्र और सेना मैडल की तो गिनती ही नहीं की जा सकती।  

इस राज्य की माटी में घुली वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कारगिल युद्ध में शहीद हुए कुल 527 सैनिकों में से 52 हिमाचल प्रदेश के थे। करीब 69 लाख की आबादी वाले इस राज्य से हर साल लगभग 5,000 सैनिकों का चयन किया जाता है । सेना में शामिल होने के इच्छुक युवाओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। राज्य में लगभग तीन लाख सेवारत या सेवानिवृत्त सैनिक और उनकी विधवाएँ हैं। अगर उनके परिवारों को भी शामिल कर लिया जाए, तो हिमाचल प्रदेश में रक्षा क्षेत्र से जुड़े लगभग आठ लाख लोग निवास करते हैं। 

  यहां गांव गांव में वीरता की कहानियां बिखरी हैं और नौजवान सेना में जाना नौकरी से ज्यादा अपना कर्तव्य समझते हैं। शायद राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने हिमाचल जैसे किसी राज्य की वीरता से प्रभावित होकर ही ‘पुष्प की अभिलाषा’ नामक कालजयी कविता लिखी थी क्योंकि यहां का युवा भी कहता है:  

चाह नहीं, मैं सुरबाला के  गहनों में गूँथा जाऊँ। 

चाह नहीं, प्रेमी-माला में  बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥  

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर,  हे हरि, डाला जाऊँ। 

चाह नहीं, देवों के सिर पर  चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥  

मुझे तोड़ लेना वनमाली! 

उस पथ में देना तुम फेंक॥ 

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने। 

जिस पथ जावें वीर अनेक॥  

इसलिए, सैनिकों के सम्मान में किसी महिला का चप्पल उतारकर आना यहां के लोगों के लिए खबर नहीं है..कोई और राज्य होता तो अब तक वह महिला मीडिया की सनसनी बन चुकी होती।

केसरिया बालम, आओ नी..पधारो म्हारे देश..!!

शाम का वक्त है, क्वीन ऑफ हिल्स शिमला में दिन भर के बाद थका मांदा सूरज पहाड़ों की चोटियों के पीछे छिपकर आराम करने को बेताब है और यही वह वक्त है जब प्रकृति अपना सबसे अनोखा जादू बिखेर रही है। शिमला और शायद सभी पहाड़ों में सांझ का आलम कुछ ऐसा होता है, मानो आकाश ने सिंदूरी रंग का कंबल ओढ़ लिया हो। लाल, केसरिया और गुलाबी रंगों के मेल से प्रकृति का चितेरा आसमान में एक ऐसी मनमोहक तस्वीर रचता है कि हम बस अचंभित से देखते रह जाते हैं । यह खूबसूरत नजारा केवल आंखों को सुकून नहीं देता, बल्कि दिल को भी शांति और ठहराव का अहसास कराता है।

ऐसा लगता है जैसे ‘सूरज हुआ मद्धम, चांद जलने लगा..’, ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश..’, ‘आ के तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी, मेरे मन को महकाए तेरे मन की कस्तूरी..’, ‘सुरमई शाम इस तरह आए सांस लेते हैं जिसतरह साए..’, ‘वो शाम कुछ अजीब थी..’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए..’ जैसे पुराने लोकप्रिय गीतों से लेकर नए दौर का ‘शाम गुलाबी, सहर गुलाबी पहर गुलाबी है, गुलाबी ये शहर..’ जैसे तमाम गाने गीतकारों ने किसी पहाड़ी शहर में बैठकर ही लिखे होंगे क्योंकि ऐसे अद्भुत दृश्य देखकर कलम अपने आप मचलने लगती है।

वैसे तो, पहाड़ों की एक दूसरे से ऊंचाई में प्रतिस्पर्धा करती चोटियां दिन भर सूरज की किरणों से चमकती रहती हैं लेकिन शाम ढलते ही वे एक सुखमयी शांति में डूब जाती हैं मानो दिनभर की थकान उतारने के लिए वे ‘मेडिटेशन’ कर रही हों। हवा में हल्की ठंडक महसूस होने लगती है और पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और उन पर जमे पक्षियों का कलरव सूरज के लिए विदाई गीत सा प्रतीत होने लगता है। 

यही वह समय होता है जब प्रकृति किसी बहरूपिए की तरह पल-पल में रंग बदलने लगती है जैसे कोई चित्रकार अपनी तूलिका से नए-नए रंग बिखेर रहा हो। पहले हल्का पीला, फिर सुनहरा, और फिर धीरे-धीरे गहरा सिंदूरी। यह रंग जब पेड़ों,पहाड़ों और घाटियों पर उतरते हैं तो ऐसा लगता है जैसे आसमान ने अपने प्रिय चांद के स्वागत के लिए दिन भर का सबसे सुंदर रूप सजा दिया है। आसमान की सुंदरता में चार चांद लगाते बादल भी दिन भर सफेद पहनावे के बाद शाम को सुनहरे रंग में रंग जाते हैं..और फिर जैसे ही शहर रात के आगोश में समाता है,पहाड़ों पर घरों की रोशनी सितारों सी दमकने लगती है।

पहाड़ों पर पर्यटकों को भी शायद इसी समय का इंतजार रहता है और वे इस नजारे को अपने कैमरे और दिल में कैद करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। यही वह पल है जब लगता है समय ठहर-सा गया है और जीवन की आपा धापी को भूलकर हर कोई प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य में खो गया है।

सिंदूरी आसमान सिर्फ रंगों का खेल नहीं बल्कि एक अनुभूति है। यह क्षण हमें स्मरण कराता है कि जीवन में कितनी ही भागदौड़ क्यों न हो, कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जो हमें रुककर शांति और सुकून से जीने का सबक देते हैं। खास बात यह है कि पहाड़ों की सांझ का यह नजारा हर बार नया सा लगता है। 

तो अगली बार जब आप किसी पहाड़ी स्थल पर जाएं और सूरज ढलने लगे तो रुकिए जरूर और महसूस कीजिए उस सिंदूरी छटा को और आनंद लीजिए प्रकृति की उस दिन की कहानी का… और हां, अपने दिल में प्रकृति के इस जादू को पूरीतरह भर भी लीजिए ताकि यह नजारा, यह अनुभव, यह सुकून, यह शांति, रंगों की यह जादूगरी और प्रकृति की चित्रकारी हमेशा आपके साथ रहे ।


सोमवार, 21 जुलाई 2025

ये चमक, ये दमक, फूलवन में महक, सब कुछ सरकार तुम्हई से है..।

यह उन दिनों की बात है…90 का दशक था और हम मध्यप्रदेश के संस्कारधानी के नाम से मशहूर जबलपुर शहर के नामी शासकीय मॉडल विज्ञान कॉलेज से फूल पत्तियों से जुड़े विषय वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) में एमएससी की अंतिम परीक्षा देकर बनी बनाई लकीर पर चलते हुए एम फिल और फिर  पीएचडी के सपने बुन रहे थे। सब कुछ ठीक था, अंक भी अच्छे थे,विषय भी और वातावरण भी अनुकूल था लेकिन फिर भी मन में एक बेचैनी थी..मन कुछ और करना चाहता था..कुछ लीक से हटकर। लेकिन पता नहीं था कि क्या और कैसे? 

 तभी अचानक एक दिन अखबार में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता संस्थान का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। आज के विद्यार्थियों के लिए संस्थान शब्द अचरज लग सकता है क्योंकि उनके लिए तो यह विश्वविद्यालय है। वे भी सही हैं और हम भी क्योंकि उन दिनों यह संस्थान ही था, विश्वविद्यालय बाद में बना। 

खैर, इस विज्ञापन में जनसंपर्क और पत्रकारिता के दो पाठ्यक्रमों के लिए 20-20 सीटों पर देश भर से आवेदन आमंत्रित किए गए थे । पहली बात तो यह है कि यह प्रदेश में अपनी तरह का पहला संस्थान था और दूसरा इसमें जनसंपर्क जैसा बिल्कुल नया पाठ्यक्रम प्रस्तावित था। 

विज्ञापन देखकर ऐसा लगा जैसे यह मन में मची खलबली का इलाज है। वैसे भी, एमएससी के बाद सीधे तौर पर तो नौकरी मिलने की कोई संभावना होती नहीं है और स्कूल के दिनों से ही मेरी लिखने पढ़ने में गहरी रुचि थी इसलिए लगा कि  मैं और यह संस्थान शायद हमराह होने के लिए ही बने हैं।   फिर क्या था, मेरे बहकावे में हमारे कुछ और साथियों ने भी यह सोचकर फार्म भर दिए कि नया संस्थान और नए कोर्स  हैं इसलिए हो सकता है सार्थक भविष्य की कोई राह मिल जाए। 

दिक्कत यह थी कि केवल फार्म भरने से एडमिशन नहीं मिल रहा था बल्कि महज चालीस सीटों के लिए देश भर के सभी प्रमुख शहरों में होने वाली प्रवेश परीक्षा की बाधा भी सफलता पूर्वक पार करनी थी। अब इसे पठन पाठन में रुचि का प्रतिफल कहें या भाग्य का लेखा..हमारे सभी साथियों में बस मेरा चयन हुआ और वह भी मेरे मनचाहे विषय जनसंपर्क में। इसतरह अपन इस संस्थान के सर्वप्रथम (फाउंडर) बैच के लिए देश भर से चुने गए जनसंपर्क विषय के चुनिंदा 20 विद्यार्थियों की खास जमात में शामिल हो गए। 

मनचाही दिशा और विषय ने उत्साह भर दिया और हम भी साइंस में भविष्य गढ़ने का इरादा त्यागकर झोला उठाकर नए सपने लेकर भोपाल चले आए ।  तब यह संस्थान शाहपुरा में सहकारिता विभाग के भवन में था जहां नीचे हमारी कक्षाएं लगती थी और ऊपर हमारा हॉस्टल था..एक तरह से आधुनिक गुरुकुल की तरह… जहां पढ़ाई-लिखाई से लेकर जेएनयू टाइप लड़के और लड़कियों के साथ घूमने फिरने और  खाने पीने को लेकर पूरी आजादी थी। 

लड़के और लड़कियों में किसी तरह का भेदभाव नहीं था।  हमारा जनसंपर्क और पत्रकारिता विषय के 20-20 विद्यार्थियों का बैच भी लताजी के गाए कालजयी गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों.. “ की ‘कोई सिख, कोई जाट-मराठा, कोई गोरखा, कोई बंगाली..’ टाइप मिश्रित था मतलब विभिन्न राज्यों से आए धुरंधर । पढ़ाई के लिए जहां डॉक्टर नंदकिशोर त्रिखा, प्रोफेसर रघुनाथ प्रसाद तिवारी, सुश्री दविंदर कौर उप्पल, श्री कमल दीक्षित, डॉ श्रीकांत सिंह और श्री शशिकांत शुक्ला जैसे नामचीन पत्रकार और अपनी अपनी फील्ड के मंझे हुए दिग्गज  मौजूद थे तो विषयों में विशेषज्ञता के लिए श्री प्रभात जोशी से लेकर डॉ ओम नागपाल तक देश भर के जाने-माने पत्रकार हमें इस पेशे के हुनर सिखाने बुलाए जाते थे। 

उस समय संस्थान के महानिदेशक श्री राधेश्याम शर्मा और कार्यकारी निदेशक श्री अरविंद चतुर्वेदी की जोड़ी ने संस्थान को इस तरह से संचालित किया कि देशभर में पहले दिन से ही इस संस्थान की और हमारी चर्चा होने लगी। पहले बैच से होने के नाते हमसे मीडिया की उम्मीदें भी जुड़ गई थीं।  

अब यह हमारे समर्पण, उत्साह और पत्रकारिता के प्रति जिज्ञासा का नतीजा था या फिर हमारे गुरुओं की मेहनत का, कि 40 विद्यार्थियों में से जो जिस मीडिया संस्थान में गया वहीं से नाम कमाकर लौटा। शुरुआती प्रशिक्षण से मिली यह सफलता आज 3 दशक बाद भी इसी तरह जारी है। ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है। हमारे बैच में न तो कोई विषयगत भेदभाव था और न ही कोई पेशागत पक्षपात। यही कारण है कि जनसंपर्क का कोर्स करने के बाद भी मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने का मौका मिला और अखबारों ने भी पूरे उत्साह से हाथों हाथ लिया। 

दैनिक देशबंधु के भोपाल संस्करण से शुरू हुआ यह सफर नवभारत,पाक्षिक हिंदी मेल, एक्सप्रेस मीडिया सर्विस सहित कुछ अन्य मीडिया हाउस से होता हुआ भारतीय सूचना सेवा के साथ आज अनवरत रूप से जारी है।  मैं, एक और मामले में भाग्यशाली हूं कि अध्ययन के बाद मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय में अध्यापन का भी सुअवसर मिला। 

दरअसल, पहले स्नातक और उसके बाद स्नातकोत्तर में अव्वल स्थान हासिल करने के फलस्वरूप मुझे विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर की कक्षाओं को पढ़ाने का अवसर दिया गया। तब इसे शोधवृत्ति कहा जाता था। कक्षाएं लेने के एवज में 1995- 96 में ₹1500 प्रति माह मिलते थे । जो निश्चित ही उस दौर में एक बड़ी राशि थी क्योंकि हमारे कई साथियों को तो इससे आधी तनख्वाह भी नहीं मिलती थी । एक सुखद और गर्व की बात यह भी है कि आज विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभाल रहे गुरुजनों को दीक्षित करने का मौका भी मुझे उसी दौरान मिला ।  

 पठन-पाठन के साथ-साथ अखबार की नौकरी का सिलसिला भी चलता रहा और फिर शिक्षा, अपराध, राजनीति, कला, संस्कृति और धर्म से लेकर तमाम विषयों पर रिपोर्टिंग और संपादन का भरपूर मौका मिला। विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई के फलस्वरुप हासिल कार्य कुशलता ने संपादकों का दिल जीता तो उन्होंने भी अखबार के हर पन्ने पर कलम के रंग बिखेरने के भरपूर अवसर दिए। 

तकरीबन पौन दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद मेरा चयन भारतीय सूचना सेवा में हो गया। इससे राह जरूर बदली लेकिन काम का तरीका वही रहा। यही कारण है कि रक्षा मंत्रालय की 100 साल से प्रकाशित तेरह भाषाओं वाली पत्रिका ‘सैनिक समाचार’ के संपादन का मौका मिला तो प्रतिष्ठित ‘आकाशवाणी’ से जुड़कर पूर्वोत्तर से लेकर भोपाल तक प्रादेशिक समाचार एकांश संभालने का महत्वपूर्ण जिम्मा भी । असम में कार्यकाल के दौरान हमारे प्रादेशिक समाचार एकांश,सिलचर को देश में सर्वश्रेष्ठ समाचार एकांश के पुरस्कार से नवाजा गया वहीं भोपाल में कोरोना काल के समय प्रसार भारती द्वारा शुरू की गई स्पेशल स्टोरी की प्रतियोगिता में हमारी टीम ने हर सप्ताह अधिकतर पुरस्कारों पर कब्जा जमाया।  

इन सफलताओं ने सीनियर अधिकारियों का भी ध्यान खींचा और फिर  राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति जैसे दिग्गजों के देश में कवरेज के साथ-साथ विदेश में कवरेज करने का अवसर भी दिया। तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ मुझे अफ्रीकी देशों में जाने का मौका मिला तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान में जी 20 देशों के महत्वपूर्ण सम्मेलन के कवरेज की जिम्मेदारी भी मिली। यह अनुभव न केवल अविस्मरणीय थे बल्कि आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने की परीक्षा भी। 

इन देशों की यात्रा से हासिल अनुभव पर मैंने ‘चार देश चालीस कहानियां’ नामक पुस्तक लिखी है जिसे पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला। आकाशवाणी भोपाल के कार्यकाल के दौरान ही मैने अयोध्या में मंदिर निर्माण पर केंद्रित ‘अयोध्या 22 जनवरी’ नामक एक और पुस्तक लिखी। इसे भी सुधि जनों ने भरपूर सराहा । पुस्तक लिखने का सिलसिला अभी भी जारी है और जल्दी ही कुछ और विषयों पर नए किस्से पढ़ने को मिल सकते हैं। फिलहाल मैं केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पत्र सूचना कार्यालय पीआईबी) के शिमला क्षेत्रीय ऑफिस में सहायक निदेशक के रूप में प्रदेश भर की पब्लिसिटी का जिम्मा संभाल रहा हूं।  

जब उपलब्धियां जुड़ती हैं तो पुरस्कार और सम्मानों से झोली भरने लगती है । मुझे अब तक प्रतिष्ठित माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान, पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया, बंग साहित्य परिषद असम, मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ, प्रेरणा भारती  के प्रतिष्ठा सम्मानों के साथ साथ बेस्ट ब्लॉगर का शोभना सम्मान, नईदिल्ली सहित अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं । मेरा ‘जुगाली’ ( jugaali.blogspot.com ) के नाम से एक लोकप्रिय ब्लॉग भी है और सोशल मीडिया पर लेखन भी सतत रूप से जारी है ।   

इसके अलावा, मुझे माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान के परामर्श मंडल के सम्मानित सदस्य और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के सम्मानित सदस्य का गौरव भी हासिल है। अपने लगभग साढ़े तीन दशक के पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि मेरी इस यात्रा में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय की सबसे अहम भूमिका है। 

विश्वविद्यालय से जुड़ने के बाद न केवल एक अलग पहचान बनाने का अवसर मिला है बल्कि विश्वविद्यालय की शिक्षा ने स्थाई रोजगार का अवसर भी दिया है। आज जो भी नाम और दाम हासिल है, उसमें निश्चित ही विश्वविद्यालय से हासिल शिक्षा और कार्य कुशलता की सबसे अहम भूमिका है। सीधे शब्दों में कहे तो ये चमक, ये दमक, फूलवन में महक, सब कुछ सरकार तुम्हई से है..।   

अक्सर यह होता है कि हम सभी बहुत सारी बातों को जानते हैं और बहुत ज्ञान भी रखते हैं लेकिन उस ज्ञान को कुशलता के साथ व्यवस्थित सांचे और खांचे में बिठाने का कौशल शिक्षा से ही हासिल होता है। शिक्षा के जरिए हमें अपनी धार को पैना करने और उसे सकारात्मक रूप से इस्तेमाल करने के गुण भी हासिल होते हैं । अपने कार्यकाल के दौरान मैंने हमेशा अपने साथियों और  विश्वविद्यालय में कक्षाएं लेने के दौरान छात्रों को यही सलाह दी है कि जब भी मौका मिले पढ़ते और लिखते रहना चाहिए क्योंकि पढ़ने से आपकी समझ बेहतर होती है और लिखने से आपकी कलम को पारंगतता हासिल होती है।

 जाहिर सी बात है कि हम जितना पढ़ेंगे और लिखेंगे हमारी लेखन शैली उतनी ही सुव्यवस्थित और सुगठित होती जाएगी और वह अपने साथ-साथ पाठकों को भी अपनी ओर खींचेगी।   अंत में, मैं, एक बार पुनः हमारे गुरुकुल यानि विश्वविद्यालय के प्रति आभार व्यक्त करता हूं क्योंकि यदि मुझे विश्वविद्यालय से जुड़ने का मौका नहीं मिलता तो शायद आज यह मकाम हासिल नहीं होता। मैं विश्वविद्यालय के उन सभी गुरुओं के प्रति भी आभारी हूं जिन्होंने हमें मीडिया का ककहरा सिखाकर इस लायक बनाया कि आज हम न केवल कुशलता के साथ अपना काम कर पा रहे हैं बल्कि अपने से जुड़े लोगों को भी सही दिशा दे पा रहे हैं।

 (भोपाल स्थित एशिया के एकमात्र पत्रकारिता विश्वविद्यालय और मेरे गुरुकुल माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व छात्रों के अनुभव पर केंद्रित पुस्तक माखन के लाल के लिए लिखा गया मेरा आलेख।)

सायोनारा भोपाल…अल्पविराम के बाद फिर रचेंगे किस्सों का नया संसार!!

मेरे लिए भी यह बहुत ही भावुक और खास पल हैं। जिस शहर में पत्रकारिता का ककहरा सीखा, जहां ‘जब हम जवां होंगे..’ से ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे.. ‘ मार्का दिन गुजारे..उसे कैसे छोड़कर जा सकते हैं?  

जहां दोस्ती और रिश्तों को सतत संवाद के साथ बुना-गढ़ा और निरंतर मुलाकात की खाद-पानी से जीवंत बनाए रखा..उस शहर एवं वहां बने रिश्तों के ताने बाने से बाहर निकलना आसान कैसे हो सकता है ?   भोपाल ने पहली नौकरी से लेकर नौकरी की अंतिम पंचवर्षीय पारी के पहले तक फ्रंट फुट पर खुलकर बल्लेबाजी करने का मौका दिया …उस महबूब शहर भोपाल से फिर कुछ साल दूर जाना वाकई मुश्किल है। 

दरअसल, नौकरी की अपनी सीमाएं, दुश्वारियां, परिवार की जरूरत और शहर से प्यार के बीच के उलझे धागों को सुलझाना आसान नहीं है । शहर और परिवार में से किसी एक को चुनना तो और भी जटिल था..काफी सोच विचारकर मैंने परिवार चुना और शायद कोई भी भावनात्मक व्यक्ति यही करता।  वैसे भी, शहर तो स्थायी है,कायम है ही अपनी जगह पर,लेकिन परिवार के सदस्यों की जरूरत समय के साथ घटती बढ़ती रहती है और जब बात इकलौती बिटिया के स्नेह एवं साथ की हो तो उसके आगे सब कुर्बान है । फिर जब यह निश्चित हो कि वापस यहीं आना है एवं यहीं बसना है..इसलिए शहर भी दिल खोलकर कह रहा है कि जाओ कुछ दिन और वतन के नए इलाकों के दीदार कर आओ..मेरी बाहें हमेशा वापसी के इंतजार में खुली हुई हैं..तब जाने का दर्द भी कम हो जाता है । 

खैर, भोपाल में दो पारियों में करीब सात-सात साल जोड़कर कुल 14 साल अब तक गुजारे हैं। पहली पारी की ही तरह इस दूसरी पारी में बिताए सात साल मेरे जीवन का अनमोल हिस्सा हैं। यहाँ दिल खोलकर मिला प्यार, काम के मौके, बेतहाशा सम्मान और आकाशवाणी भोपाल में टीम न्यूजरूम से मिला पारिवारिक माहौल मेरे दिल में हमेशा बसा रहेगा। न्यूजरूम टीम ने तो अपनत्व से दफ्तर को न केवल घर बना दिया, बल्कि एक ऐसा विस्तारित परिवार दिया, जिसने हर कदम पर मेरा साथ निभाया। सिटी ऑफ लेक का ज़र्रा ज़र्रा और आकाशवाणी भोपाल का हर गलियारा, हर चेहरे पर खिली मुस्कान,  साथ बिताए हँसी-खुशी के पल और हर छोटी-बड़ी यादें मेरे लिए जीवंत खजाना हैं। 

इस शहर ने ‘चार देश चालीस कहानियां’ और ‘अयोध्या 22 जनवरी’ जैसी किताबें, सैकड़ों खबरें, हजारों बार रेडियो पर आने का मौका और अनगिनत लेख लिखने का हौंसला दिया।  यहां रहकर सबसे बड़े मीडिया संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्विद्यालय में ‘बोर्ड ऑफ स्ट्डीज’ का सम्मानित सदस्य बनने और दुनिया में अपनी तरह के अनूठे माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के प्रतिष्ठित ‘परामर्श मंडल’ का मानद सदस्य होने जैसे गौरव के पल दिए।  

इसी शहर में हमने ‘रीडर्स क्लब’ नामक एक ऐसा पौधा रोपा जो पठन पाठन की मुहिम को आगे बढ़ाकर लगातार पुष्पित पल्लवित हो रहा है। यहां मीडिया के  मित्रों सहित सभी साथियों ने मुझे इतना प्यार, सम्मान, सहयोग और समर्थन दिया कि मैं इसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। 

 इस शहर ने मुझे नई ऊँचाइयों तक पहुँचने ( शिमला भी ऊंचाई पर है😆) का बल दिया और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी दी। अब जब मैं एक नए शहर देवभूमि हिमाचल की राजधानी और मशहूर पर्यटन स्थल शिमला में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की जिम्मेदारी उठाने की ओर कदम बढ़ा रहा हूँ, तो मेरा दिल इन सभी यादों और भोपाल की गर्मजोशी से भरा हुआ है। मैं उन सभी का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मेरे इस सफर को इतना सुंदर बनाया।  

मेरे इन सात सालों के सफर को भोपाल ने खूबसूरत,सहज और संग्रहणीय बनाया है और मैं इन पलों को हमेशा संजोकर रखूँगा । यहां बिताए लम्हे और आपका साथ मेरे लिए अनमोल है। हम भौगोलिक दूरियों को कभी हमारे बीच नहीं आने देंगे और निश्चित ही यहां की यादें मेरी नई शुरुआत को आसान बनाएंगी और मजबूती से मेरे साथ हमेशा डटी रहेंगी। 

 …अंत में अपने शहर से एक वादा भी कि अब तीसरी पारी स्थायी होगी और फिर साथ साथ किस्सों का नया संसार रचेंगे…फिलहाल अलविदा..सायोनारा!!  

शिमला: प्रेम की कविता सा अहसास


‘क्वीन ऑफ हिल्स’ के नाम से विख्यात शिमला इन दिनों घनी धुंध और अल्हड़ बादलों की एक अलौकिक चादर में लिपटी हुई है, मानो प्रकृति ने इस पहाड़ी नगर को अपने रोमांटिक रहस्य में छिपा लिया हो। ऐसा लगता है जैसे स्वप्नदर्शी निर्देशक राज कपूर ने अपनी फिल्म राम तेरी गंगा मैली का लोकप्रिय गीत कोहरे की चादर लपेटे हूं.. इसी शहर से प्रेरित होकर फिल्माया था। यहां की यह अनूठी सुंदरता पर्यटकों और इस स्वनिल आभाष से अनजान हम जैसे लोगों को एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती है। शहर की ढलान वाली सड़कों पर बने घरों की लाल और हरी छतें कोहरे की सफेद परतों से ढककर दूर से देखने पर किसी काल्पनिक चित्र की तरह प्रतीत होती हैं। ये घर, पुराने औपनिवेशिक आकर्षण के साथ, कोहरे में तैरते हुए एक ऐसी शांति और गहराई पैदा करते हैं, जो  सीधे दिल को छू जाती है।

हवा में फैली हल्की ठंडक और नटखट बादलों से जन्म लेती रिमझिम फुहारें चेहरे को हौले से छूकर हनीमून के लिए आए प्रेमियों के लिए रोमांटिक माहौल रच देती हैं । रिज पर चर्च के सामने दिन भर हाथों में हाथ डाले प्रेमी जोड़े जमा रहते हैं। उनके पीछे शिमला का मशहूर चर्च कोहरे से ढका हुआ है जैसे छिपकर उनके प्रेम का आनंद ले रहा हो और वे युगल भी दुनिया की नजरों से बचकर इस कोहरे में गुम हो जाना चाहते हैं। एक-दूसरे के करीब कई युगल कोहरे की नमी को अपनी साँसों में उतारते हुए सोच रहे है कि काश उनके लिए यह पल अनंत काल तक ठहर जाए । वे यहां आकर बस एक-दूसरे में खोए जाते हैं और धुंध की घनी चादर उनके इर्द-गिर्द एक निजी संसार रच देती है। 

कभी, एकाएक परिवार के परिवार बादलों का कंबल हटाकर सामने आ जाते हैं जैसे बादलों की सीढ़ियां उतर रहे हों। हर कोई कोहरे, धुंध और बादलों में ढकी ऐतिहासिक मॉल रोड का हर हिस्सा कैमरे के जरिए अपनी स्मृतियों में सहेज लेना चाहता है। कहीं कहीं वाहनों की रोशनियाँ धुंध के बीच ऐसे चमक उठती हैं, मानो सितारे सड़क पर उतर आए हों। ये रोशनी कोहरे में निखरकर एक सुनहरा आलोक बना देती है। सड़कों पर चलते लोग सुदूर से धीरे धीरे उनकी मौजूदगी की झलक देते हैं। वे भी प्रकृति के इस अद्भुत चित्रण का हिस्सा लगते हैं। वहीं, कोहरे में धुंधली दिखाई दे रही पेड़ों की हरी-भरी चादर इस दृश्य को एक काव्यात्मक सुंदरता प्रदान कर देती है । जबकि दूर से पहरेदारी कर रहीं पर्वतों की चोटियाँ बादलों के ऊपर से इस तरह झाँकती सी लगती हैं, जैसे वे प्रकृति के आगोश में पल रही नवयुगलों की प्रेम कहानी की साक्षी बनना चाहती हैं।

शाम ढलने ही दिनभर बादलों की गिरफ्त में रहा सूरज किसी तरह डूबने की औपचारिक निभाने लगता है। तभी हवा में एक मीठी खुशबू फैलने लगती र है—शायद देवदार के पेड़ों की या किसी पास की चाय की दुकान से आ रही अदरक इलायची की । यह खुशबू एक अनकही बातचीत को जन्म देती है, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं है और इसे बस महसूस किया जा सकता है । 

शिमला इस मौसम में सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि प्रेम की एक कविता बन जाता है, जहाँ धुंध, कोहरा, बादल और रोशनी की हर किरण प्रकृति से मानव के रिश्ते की गहराई को प्रतिबिंबित करते हैं ।

जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, कोहरे एवं धुंध की परतें और घनी होती जाती हैं और स्ट्रीट लाइट से लेकर शहर के घरों की रोशनियाँ धीरे-धीरे मंद पड़कर अदृश्यता से एकाकार होने लगती  हैं लेकिन यह मंदता रोमांस को कम नहीं करती बल्कि इसे और गहरा बना देती है। 

धुंधलका बढ़ते ही नवयुगलों के जोड़े अपनी होटलों की ओर बढ़ने लगते हैं, हाथों में हाथ लिए, कोहरे के इस जादुई आलिंगन में खोए हुए और शिमला को अपनी प्रेम कहानी का गवाह बनाकर भविष्य के सपने बुनते हुए ।  धुंध और बादलों से ढके शहर का यह दृश्य न केवल आँखों को भाता है, बल्कि दिल को भी छू जाता है और एक ऐसी छाप छोड़ जाता है जो हमेशा के लिए, सालों साल तक दिल में संजोई जा सके ।


शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

स्वर्ण जयंती अंदाज कुछ इस तरह का हो !!


आज 10 जुलाई 2025 को मनीषा जी का 50वां जन्मदिन है..स्वर्ण जयंती वर्ष..जीवन की साझा स्वर्णिम यादों का साल और हमारे रजत जयंती साथ का सुनहरा अध्याय। मनीषा जी सिर्फ मेरी पत्नी ही नहीं, बल्कि हमारे परिवार की धुरी हैं, उन्होंने प्यार, त्याग और समर्पण से हमारे घर को स्वर्ग बनाया है। यह दिन केवल उम्र का उत्सव नहीं, बल्कि मनीषा जी के अनमोल योगदान का सम्मान है।

मनीषा जी मेरे जीवन की वह रोशनी हैं, जिन्होंने हर अंधेरे को दूर किया। आधी सदी का यह सफर एक अनमोल तोहफा है। तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी हिम्मत, और तुम्हारा अटूट प्यार हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा है।

तुम्हारी छोटी-छोटी बातें—सुबह की चाय में तुम्हारा प्यार, खाने में मिठास, पल पल का साथ, कठिन दिनों में तुम्हारा धैर्य और हर खुशी में तुम्हारा साथ—ये सब मेरे जीवन की सबसे अनमोल यादें हैं। तुमने मेरे साथ हर चुनौती को मुस्कुराते हुए अपनाया है।

इन 50 वर्षों में मनीषा जी ने हर भूमिका—माँ, पत्नी, बहू, और दोस्त—को इतने प्यार और जिम्मेदारी से निभाया कि हम सभी कायल हैं। इनकी हंसी बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाती है, और धैर्य मुश्किल वक्त में हिम्मत देता है। हमारे परिवार की हर छोटी-बड़ी खुशी में इनका हाथ है—चाहे वह बच्चों की सफलता हो, हमारे घर की रौनक हो, या एक साथ बिताए पल।

आज हम सब मिलकर तुम्हें धन्यवाद कहना चाहते हैं। तुमने हमें प्यार करना, एक-दूसरे का सम्मान करना और हर परिस्थिति में मुस्कुराना सिखाया। इस खास दिन पर, मैं और हमारा परिवार  चाहते हैं कि तुम्हारा हर दिन खुशियों से भरा हो।

तुम्हारा यह 50वां जन्मदिन नई शुरुआतों का प्रतीक है—नए सपनों, नई खुशियों और अनगिनत यादों का। ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम्हें लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और अनंत खुशियाँ मिलें। यह 50वां जन्मदिन महज एक पड़ाव है… हम साथ साथ और अनगिनत यादें बनाएंगे। 

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!




बुधवार, 9 जुलाई 2025

न्यूजरूम परिवार के नाम एक पाती

 

मेरे न्यूजरूम परिवार के सभी प्रिय सदस्यों,

  • सभी को नमस्कार


मजरूह सुल्तानपुरी 

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया


आज मेरे लिए एक ऐसा क्षण है, जो मन में मिश्रित भावनाओं का तूफान लिए हुए है—खुशी, गर्व, और कहीं न कहीं एक हल्की-सी उदासी। सात साल पहले जब मैंने इस दफ्तर में कदम रखा था, तब यह स्थान मेरे लिए सिर्फ एक कार्यस्थल था। लेकिन आप सभी ने इसे मेरे लिए एक घर बना दिया, एक ऐसा परिवार जहाँ हर दिन नई सीख, हँसी, और अपनत्व का एहसास हुआ। आज, जब मैं ट्रांसफर के साथ एक नए सफर की ओर बढ़ रहा हूँ, तो यह विदाई मेरे लिए उतनी ही मुश्किल है, जितनी किसी अपने को अलविदा कहना।


इन सात सालों में हमने मिलकर अनगिनत चुनौतियों का सामना किया। चाहे वो डेडलाइन का दबाव हो, प्रोजेक्ट्स की जटिलताएँ हों, या फिर नई योजनाओं को आकार देना हो—आप सभी का साथ मेरे लिए एक ढाल की तरह रहा। कॉफी ब्रेक में की गई हल्की-फुल्की बातें, लंच टाइम की वो छोटी-छोटी कहानियाँ, और उत्सवों में एक साथ नाचना-गाना—ये वो पल हैं जो मेरे दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे। आप में से हर एक ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया—कोई धैर्य, कोई मेहनत, तो कोई मुस्कुराते हुए हर मुश्किल को आसान बनाने का हुनर।

मुझे याद है वो दिन जब हमने एक साथ मिलकर असंभव-से लगने वाले लक्ष्य को हासिल किया था, और वो रातें जब हम सब देर तक बैठकर हँसते-बतियाते रहे। यहाँ के हर गलियारे, हर डेस्क, और हर मीटिंग रूम में मेरी यादें बसी हैं। यह दफ्तर मेरे लिए सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि एक जीवंत कहानी है, जिसमें आप सभी किरदार हैं।

इस मौके पर मुझे मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर याद आ रहा है, जो मेरे मन की बात को बयान करता है:

"याद इतनी सी बनी रहे बस हमारे बाद,

कोई मुड़कर देख ले हमें, ये तमन्ना है बहुत।"

मैं चाहता हूँ कि मेरी मेहनत, मेरी मौजूदगी, और मेरे योगदान की एक छोटी-सी छाप यहाँ रह जाए। और अगर मैंने अनजाने में किसी का दिल दुखाया हो, कोई गलती की हो, तो इसके लिए मैं आप सभी से दिल से माफी माँगता हूँ।

ट्रांसफर मेरे लिए एक नया अध्याय है, एक नई राह, जहाँ मैं आप सभी से मिली सीख और प्रेरणा को साथ ले जा रहा हूँ। मैं वादा करता हूँ कि जहाँ भी रहूँ, इस परिवार की गरिमा और मूल्यों को ऊँचा रखूँगा। आप सभी से मेरा निवेदन है कि इस दफ्तर के इस पारिवारिक माहौल को हमेशा बनाए रखें, क्योंकि यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।


अंत में, मैं एक और कविता की पंक्तियाँ साझा करना चाहूँगा, जो मेरे इस सफर को बयान करती हैं। ये पंक्तियाँ हैं हरिवंश राय बच्चन की:

"मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह,

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, जिंदगानी फिर कहाँ।"

आप सभी का हृदय से आभार, जो आपने मुझे इतना प्यार, सम्मान, और साथ दिया। मेरी कामना है कि यह परिवार हमेशा यूँ ही मुस्कुराता रहे, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाता रहे। मेरे नए सफर के लिए आपकी शुभकामनाएँ मेरी ताकत होंगी। उम्मीद है, भविष्य में हम फिर मिलेंगे, और नई यादें बनाएंगे।

धन्यवाद, और अलविदा नहीं, बल्कि फिर मिलने की उम्मीद के साथ!



अभिशाप नहीं,सीधे संवाद का सटीक माध्यम है भी सोशल मीडिया

इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया को खरी-खोटी सुनाना एक फैशन बन गया है. मीडिया की कार्यप्रणाली के बारे में ‘क-ख-ग’ जैसी प्रारंभिक समझ न रखने वाला व्यक्ति भी ज्ञान देने में पीछे नहीं रहता. हालाँकि यह आलोचना कोई एकतरफा भी नहीं है बल्कि टीआरपी/विज्ञापन और कम समय में ज्यादा चर्चित होने की होड़ में कई बार मीडिया भी अपनी सीमाएं लांघता रहता है और निजता और सार्वजनिक जीवन के अंतर तक को भुला देता है. वैसे जन-अभिरुचि की ख़बरों और भ्रष्टाचार को सामने लाने के कारण न्यूज़ चैनल तो फिर भी कई बार तारीफ़ के हक़दार बन जाते हैं लेकिन सोशल मीडिया को तो समय की बर्बादी तथा अफवाहों का गढ़ माना लिया गया है. 

आलम यह है कि सोशल मीडिया पर वायरल होते संदेशों के कारण अब ‘वायरल सच’ जैसे कार्यक्रम तक आने लगे हैं  लेकिन, वास्तविक धरातल पर देखें तो न्यू मीडिया के नाम से सुर्खियाँ बटोर रहे  मीडिया के इस नए स्तम्भ का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो यह वरदान बन सकता है. कई बार मुसीबत में फंसे लोगों तक सहायता पहुँचाने में फेसबुक,ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के लोकप्रिय प्लेटफार्म ने गज़ब की तेज़ी दिखाते हुए अनुकरणीय उदाहरण पेश किए हैं. बाढ़,भूकंप,आग प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इस मीडिया की सकारात्मक भूमिका अब सामने आने लगी है.


निजी तौर पर सोशल मीडिया की सक्रियता के तो बेशुमार उदाहरण मौजूद हैं लेकिन सरकारी स्तर पर भी यह मीडिया इन दिनों कारगर भूमिका निभा रहा है. हाल ही में रेलमंत्री और उनके मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता के कारण मुसीबत में फंसे यात्रियों को समय पर सार्थक मदद मिलने के कई किस्से सामने आ रहे है. यहाँ तक कि इस मीडिया के चलते नवजात बच्चे को ट्रेन में दूध से लेकर डायपर तक उपलब्ध कराने जैसी मानवीय पहल देखने को मिली है. ट्रेन में महिलाओं से छेड़छाड़ रोकने और बदमाशों को मौके पर ही गिरफ्त में लेने में भी इस मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया पर सक्रियता किसी से छिपी नहीं है. वे इस मंच का इस्तेमाल आम जनता के संपर्क में रहने के लिए बखूबी करते हैं और शायद यही कारण है कि ‘स्वच्छ भारत’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ जैसे सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यक्रम शुरू होते ही न केवल आम जनता तक पहुँच जाते हैं बल्कि जन-सामान्य के मन की थाह लेने में भी सहायक बनते हैं. यदि कुछ साल पहले के परिपेक्ष्य में देखे तो यह सब अविश्वसनीय सा लगता है. पहले सामाजिक कल्याण से जुडी सरकारी योजनाएं जन-सामान्य तक तब पहुँच पाती थीं जब कि वे या तो समाप्त होने के कगार पर होती थीं या फिर जन-भागीदारी के अभाव में वे असफल हो जाती थीं. आकाशवाणी से प्रसारित प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में आम लोगों की भागीदारी सोशल मीडिया की वजह से ही संभव हो पायी है. प्रधानमंत्री द्वारा विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान सोशल मीडिया के जरिए उस देश की भाषा में सन्देश प्रेषित करने से गर्मजोशी और परस्पर उत्साह का जो माहौल बनता है उससे सुदृढ़ रणनीतिक संबंधों की नींव रखने में भी मदद मिलती है.     


अब तो सरकार के अधिकतर मंत्रालय सोशल मीडिया पर सक्रिय है लेकिन विदेश मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता से कई परिवारों को नया जीवन मिल गया. चाहे वह रूस और यूक्रेन युद्ध में भारतीय विद्यार्थियों को वापस लाने का मामला हो या खाड़ी देशों से लेकर इजरायल तक में फंसे भारतीयों को महज सोशल मीडिया पर मिले संदेशों के आधार पर मदद पहुंचाना हो, सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका सामने आई है।


चंद शब्दों में अपनी बात को सीधे सम्बंधित व्यक्ति तक तुरंत पहुंचा पाने की कुशलता के कारण इस नए मीडिया ने इन परिवारों के परिजनों को विदेश से सुरक्षित वापस लाने में अनुकरणीय सहायता की.


असम की आराधना बरुआ यूक्रेन में डाक्टरी की पढाई कर रही हैं और सालभर में कम से कम एक बार अपने वतन आना उनके लिए सामान्य बात थी,लेकिन हाल ही में आराधना के लिए यूक्रेन से इन्स्ताबुल होते हुए गुवाहाटी का सफ़र किसी बुरे सपने से कम नहीं था. चूँकि इन्स्ताबुल में विमान को काफी देर तक रुकना था इसलिए आदत के मुताबिक आराधना विमान से बाहर निकलकर चहलकदमी करने लगी. पहले भी वे ऐसा करती रही हैं और यह सामान्य बात थी लेकिन इन्स्ताबुल में हाल ही हुए आतंकी हमले के बाद वहां के सुरक्षा हालात बदल गए थे. इस बार जैसे ही आराधना विमान से बाहर निकली सुरक्षा एजेंसियों ने बिना ट्रांजिट वीसा के बाहर घूमने के आरोप में उसे हिरासत में ले लिया. बिन बुलाए आई इस मुसीबत ने आराधना के होश उड़ा दिए. फिर धीरज से काम लेते हुए उसने किसी तरह असम की बराक घाटी में इन्स्पेक्टर आफ स्कूल के पद पर तैनात अपने पिता को फोन किया. मामले की गंभीरता को समझते हुए बदहवास पिता ने अपने ज़िले हैलाकांदी के डिप्टी कमिश्नर से मदद मांगी. डिप्टी कमिश्नर मलय बोरा ने भी मामले की नजाकत को समझते हुए और सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर बिना समय गँवाए तत्काल ट्विटर पर विदेश मंत्रालय को सन्देश भेजकर सहायता की गुहार लगाई. सरकार ने भी बिना देर किए इन्स्ताबुल में भारतीय दूतावास के एक अधिकारी को आराधना को सुरक्षित भारत भेजने का दायित्व सौंप दिया.

सोशल मीडिया की इस सक्रियता का असर दिखा और आराधना के लिए न केवल सभी जरुरी दस्तावेजों का इंतजाम हो गया बल्कि उसे दूसरी फ्लाइट से भारत रवाना भी कर दिया गया. असम में अपने घर पहुंचकर आराधना ने चैन की सांस ली और सरकार की इस मानवीय पहल के प्रति आभार जताया क्योंकि इसके फलस्वरूप ही वह सुरक्षित अपने घर आ पायी.


असम के ही सिलचर के निवासी जायफुल रोंग्मेई की कहानी तो और भी दिल दहलाने वाली है. एक तेल कंपनी के जहाज पर नाविक की नौकरी कर रहे रोंग्मेई को बिना किसी गलती के नाइजीरिया में तेल चोरी के आरोप में बंदी बना लिया गया था जबकि असलियत में उसके जहाज को ईंधन की कमी के कारण मज़बूरी में नाइजीरिया की सीमा में लंगर डालना पड़ा था. किसी तरह रोंग्मेई की परेशानी की कहानी उसके घर तक पहुंची और फिर स्थानीय विधायक और सांसद के जरिए विदेश मंत्री को इस बात का पता चला तो उन्होंने बिना देर किए रोंग्मेई और उनके साथ नाइजीरिया की जेल में बंद उनके ग्यारह अन्य  भारतीय साथियों को छुड़ाने के प्रयास तेज कर दिए. सरकार की मध्यस्तता के फलस्वरूप रोंग्मेई  अपनी पत्नी और छह साल के बेटे के पास घर वापस आ गए.

जरा सोचिए, संपर्कों और साधनों के लिहाज से देश के सबसे कमजोर इलाके पूर्वोत्तर के भी दूर दराज के हिस्सों में रहने वाले इन लोगों के न तो कोई बड़े संपर्क थे और न ही इतना पैसा की उन देशों तक जाकर अपने परिजनों की कोई मदद कर पाते लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार ने एक के बाद एक कड़ियाँ जोड़ दी और महीनों का सफ़र मिनटों में पूरा हो गया.


नए भारत के इस नए मीडिया के इन सकारात्मक पहलुओं से एक बात तो पूरी तरह साफ़ हो जाती है कि यदि सोशल मीडिया का समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो यह मीडिया आम जनता के कल्याण में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उन इलाकों तक भी अपनी पहुँच बना सकता है जहाँ आज तक ट्रेन जैसी बुनियादी सेवा भी उपलब्ध नहीं है

बस,चाय पकौड़े की कमी थी..

ऐसा लगा जैसे प्रकृति अपने पूरे शबाव के साथ हमारे इस्तकबाल के लिए आ गई है। भोपाल से दिल्ली और फिर पंचकूला तक यात्रा सामान्य सी ही रही लेकिन जैसे ही हमने welcome to Himachal Pradesh का बोर्ड पार किया…बादलों के एक युवा उत्साही समूह ने तेज फुहारों के साथ हुलसकर हमारा स्वागत किया बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी नए हवाईजहाज की पहली यात्रा में पानी की फुहारों से वेलकम किया जाता है। 


इस दौरान मौसम इतना खुशगवार था कि चाय पकौड़े की कमी खलने लगी। अब प्रकृति भले ही अपने बंधु बांधवों के साथ पूरे मूड में थी लेकिन चलती सड़क पर बारिश के बीच हमारे लिए चाय और पकौड़े बनाने की हिम्मत कौन दिखाता।


बारिश ने विराम लिया तो धुंध को चीरकर पहाड़ों और घने पेड़ों ने हमें निहारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर धुंध भी छट गई और हमें हिमाचल के असली सौंदर्य से साक्षात्कार  का मौका मिलने लगा। बीच बीच में सड़क किनारे परिवार के साथ भुट्टे और गरमागरम मैगी खाते लोग अपने शहर भोपाल का अहसास करा रहे थे और यह संदेश भी दे रहे थे कि मौसम के अनुकूल खाने के मामले में हम सब एक हैं। 


सड़क के बीचों बीच निडर होकर इठलाते कनेर और बोगनवेलिया के फूल यहां के अनुकूल मौसम के कारण सड़क पर अतिक्रमण करने में भी पीछे नहीं थे । वहीं,सनवारा टोल प्लाजा पर वाहनों की लंबी कतार बता रही थी कि दिल्ली और पंजाब के साथ अन्य राज्यों के लोग वीकेंड शिमला में मनाने निकल पड़े हैं। कार की छत फाड़कर (सन रुफ) बाहर निकले बच्चों के स्पर्श के लिए बादल भी कुछ नीचे आ गए थे। 


अब हम भी बादलों के बीच से ऊपर पहाड़ की परिक्रमा करते हुए शिमला पहुंच गए । शिमला में मित्र प्रकाश पंत के सौजन्य से मिले शानदार गेस्ट हाउस के आलीशान कमरे ( हाल कहना बेहतर होगा) और कमरे नुमा बाथरूम से यात्रा के शानदार समापन का सुकून मिला। गरमागरम चाय और आलू प्याज के परांठे के साथ पहले दिन की कथा पूरी हुई।

परंपराएं तोड़कर बदलाव की अंगड़ाई लेता रेडियो

कल्पना कीजिए कि आप रेडियो पर फरमाइशी गीत जैसा कोई कार्यक्रम सुन रहे हैं और अपने फिल्म नदिया के पार का कौन दिशा में ले के चला रे गीत सुनाने का अनुरोध किया है। जैसे ही गीत शुरू होता है आपके मोबाइल या रेडियो सेट पर इस गाने के दृश्य भी दिखाई देने लगें। इसी तरह, आप रेडियो पर समाचार सुन रहे हैं और एकाएक न्यूज रीडर की जानी पहचानी आवाज़ के साथ उसका चेहरा भी दिखने लगे…आश्चर्य हो रहा है न!! तो इस अचंभे के लिए तैयार रहिए क्योंकि जल्दी ही नए जमाने का यह रेडियो आपके जीवन का हिस्सा बनने वाला है। इसे फिलहाल विजुअल रेडियो नाम दिया गया है। विजुअल रेडियो वास्तव में रेडियो प्रसारण का भविष्य है, जो ऑडियो और विजुअल अनुभव को एक साथ लाता है। 

विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है। इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं। इसको हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं। मन की बात मूलतः रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं ।

विजुअल रेडियो तकनीक मौजूदा डिजिटल युग में रेडियो को और अधिक इंटरैक्टिव और आकर्षक बना रही  है। विजुअल रेडियो में रेडियो जॉकी (RJ) या स्टूडियो गतिविधियों का लाइव प्रसारण किया जा सकता है। इंटरैक्टिव सामग्री के माध्यम से श्रोताओं के लिए पोल, क्विज, या कमेंट सेक्शन बनाए जा सकते हैं । रेडियो प्रसारण को सीधे फेसबुक, यूट्यूब, या अन्य प्लेटफॉर्म पर साझा किया जा सकता है । यह तकनीक रेडियो को पारंपरिक ऑडियो माध्यम से डिजिटल मल्टीमीडिया प्लेटफॉर्म में बदल रही है जिससे रेडियो युवा पीढ़ी और डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए अधिक प्रासंगिक हो रहा है।

हालांकि, भारत में विजुअल रेडियो का विकास अभी प्रारंभिक चरण में है लेकिन आकाशवाणी ने डिजिटल युग में प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विजुअल रेडियो की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। प्रसार भारती ने न्यूज़ ऑन एयर मोबाइल ऐप और वेबसाइट लॉन्च की है, जिसके माध्यम से आकाशवाणी के रेडियो कार्यक्रमों को लाइव स्ट्रीम किया जाता है। आकाशवाणी के कुछ प्रमुख केंद्र, जैसे दिल्ली और मुंबई, अपने चुनिंदा कार्यक्रमों को यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लाइव स्ट्रीम करते हैं, जिसमें रेडियो जॉकी और स्टूडियो गतिविधियों के वीडियो शामिल होते हैं। आकाशवाणी की लोकप्रिय सेवा विविध भारती के कुछ कार्यक्रम, जैसे हवा महल या जयमाला, को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऑडियो के साथ-साथ विजुअल सामग्री जैसे गाने के वीडियो या पुरानी तस्वीरें के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। विविध भारती ने अपने यूट्यूब चैनल पर पुराने रेडियो कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग को विजुअल तत्वों जैसे गाने के दृश्य या कलाकारों की तस्वीरें के साथ अपलोड किया है, जो विजुअल रेडियो का एक प्रारंभिक रूप है।

आकाशवाणी के एफएम रेनबो चैनल के स्टेशन कई बार अपने लाइव शो को सोशल मीडिया पर वीडियो स्ट्रीम करते हैं, जिसमें रेडियो जॉकी की बातचीत, स्टूडियो का माहौल, और श्रोताओं के साथ इंटरैक्शन शामिल होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि प्रसार भारती ने हाल के वर्षों में डिजिटल परिवर्तन पर जोर दिया है।  इसके तहत आकाशवाणी के स्टेशनों को अपग्रेड किया जा रहा है। प्रसार भारती की वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी आकाशवाणी के कार्यक्रमों को विजुअल सामग्री के साथ प्रचारित करने की शुरुआत की जा चुकी है।

निजी क्षेत्र की बात करें तो रेडियो मिर्ची,रेड एफएम और रेडियो सिटी जैसे चैनल अपने लोकप्रिय शो को यूट्यूब, फेसबुक, और इंस्टाग्राम पर लाइव स्ट्रीम कर रहे हैं, जिसमें रेडियो जॉकी के वीडियो, मेहमानों के साक्षात्कार, और स्टूडियो की गतिविधियां शामिल होती हैं।  इसके अलावा,हंगामा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी विजुअल रेडियो को बढ़ावा दिया है। उनके रेडियो चैनल गानों के साथ वीडियो, गाने के बोल, और कलाकारों की जानकारी प्रदान करते हैं।

विजुअल रेडियो की औपचारिक शुरुआत 2005 में मानी जाती है जब नोकिया ने इसे एक ट्रेडमार्क उत्पाद के रूप में पेश किया। नोकिया का विजुअल रेडियो कॉन्सेप्ट पारंपरिक FM रेडियो के साथ डेटा कनेक्शन के माध्यम से ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और इंटरैक्टिव सामग्री को जोड़ता था। यह तकनीक सबसे पहले फिनलैंड में किस FM में लागू की गई थी। इसके बाद ब्रिटेन, सिंगापुर, भारत,फिलीपींस और स्पेन जैसे कई देशों में विभिन्न रेडियो स्टेशनों ने इसे अपनाया। हालांकि, विजुअल रेडियो का विचार इससे पहले भी विभिन्न रूपों में मौजूद था। उदाहरण के लिए, डिजिटल ऑडियो ब्रॉडकास्टिंग (DAB) के तहत 1990 के दशक के अंत में कुछ देशों में रेडियो प्रसारण के साथ स्लाइड शो या टेक्स्ट जैसी विजुअल सामग्री को शामिल करने के प्रयोग शुरू हो चुके थे। 

विजुअल रेडियो ने पिछले दो दशकों में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जो डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के विकास के साथ-साथ तेजी से बढ़ी है। 2010 के दशक में फेसबुक, यूट्यूब, और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के उदय के साथ विजुअल रेडियो के विस्तार को पंख लग गए । 2010 के बाद, DIGISPOT जैसे सॉफ्टवेयर प्रदाताओं ने विजुअल रेडियो को स्वचालित करने के लिए समाधान पेश किए। इनमें स्टूडियो में कैमरे, ऑटोमेटेड विजुअल्स जैसे मौसम अपडेट, गाने की जानकारी और स्ट्रीमिंग फीड शामिल हैं। जबकि VisualRadioAssist जैसे प्लेटफॉर्म ने छोटे रेडियो स्टेशनों के लिए सस्ते और उपयोगी समाधान पेश किए, जिससे विजुअल रेडियो को वैश्विक स्तर पर सुलभ बनाया गया।

अब सवाल यह उठता है कि जब हमारे पास टीवी और मोबाइल के रूप में पहले ही विजुअल्स के बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं तो रेडियो में विजुअल जोड़ने की क्या जरूरत आन पड़ी। इसी सवाल के जवाब भी शामिल है। सीधी सी बात है कि आप रेडियो सुनने के लिए और टीवी देखने के लिए इस्तेमाल करते हैं और इन माध्यमों के ताजी गुण इन्हें एक दूसरे से अलग भी करते हैं। सामान्य समझ के हिसाब से विजुअल रेडियो और टीवी प्रसारण दोनों ही दृश्य और श्रव्य सामग्री का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन उनके उद्देश्य, प्रारूप, तकनीक, और दर्शक अनुभव में महत्वपूर्ण अंतर हैं। 


विजुअल रेडियो का मूल आधार रेडियो प्रसारण है, जिसमें ऑडियो सामग्री जैसे संगीत, टॉक शो, समाचार प्राथमिक हैं । दृश्य तत्व  जैसे वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट केवल ऑडियो को पूरक और आकर्षक बनाने के लिए जोड़े जा रहे हैं। इसका उद्देश्य पारंपरिक रेडियो को डिजिटल युग में प्रासंगिक बनाना और श्रोताओं को इंटरैक्टिव अनुभव प्रदान करना है।

 वहीं, टीवी प्रसारण का फोकस दृश्य सामग्री पर होता है, जहां वीडियो, कहानी और विजुअल प्रभाव प्राथमिक होते हैं। ऑडियो मसलन संवाद और संगीत दृश्यों को समर्थन देते हैं । इसका उद्देश्य मनोरंजन, सूचना या शिक्षा के लिए पूरी तरह से दृश्य-केंद्रित अनुभव प्रदान करना है।

विजुअल रेडियो मुख्य रूप से इंटरनेट-आधारित प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या मोबाइल ऐप जैसे न्यूज़ ऑन एयर के माध्यम से प्रसारित होता है। जबकि टीवी प्रसारण मुख्य रूप से टेलीविजन चैनलों के माध्यम से प्रसारित होता है, जो सैटेलाइट, केबल, या डिजिटल टेरेस्ट्रियल टीवी (DTT) का उपयोग करते हैं। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम भी टीवी सामग्री का हिस्सा हैं। इसे देखने के लिए टीवी सेट, सेट-टॉप बॉक्स, या स्ट्रीमिंग डिवाइस की आवश्यकता होती है।

एक बड़ा अंतर उत्पादन लागत का भी है। विजुअल रेडियो में उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि यह न्यूनतम उपकरण जैसे एक कैमरा, माइक्रोफोन और स्ट्रीमिंग सॉफ्टवेयर के साथ शुरू हो सकता है। छोटे रेडियो स्टेशन भी इसे लागू कर सकते हैं जबकि टीवी प्रसारण में उत्पादन लागत बहुत अधिक होती है, क्योंकि इसमें मल्टी-कैमरा सेटअप, पेशेवर लाइटिंग, साउंड डिज़ाइन, और पोस्ट-प्रोडक्शन की आवश्यकता होती है।

कुल मिलाकर देखें तो यह प्रसारण माध्यमों का नवाचार है जो श्रोताओं और दर्शकों को जोड़े रखने के लिए लगातार किया जा रहा है। अंतिम फैसला तो सुनने वालों के हाथ में ही है कि उन्हें रेडियो सुनना है या देखना भी है। फिलहाल तो विजुअल रेडियो कुछ नया, कुछ हटकर और रेडियो की पारंपरिक सीमाएं तोड़कर सृजन और रचनात्मकता का नया अनुभव नजर आ रहा है।

शिमला में स्कैंडल पॉइंट!! क्या है असल माजरा

पर्यटन स्थल में स्कैंडल प्वाइंट…पर्यटन स्थलों या नामचीन शहरों में सन सेट प्वाइंट, माउंटेन व्यू, लेक व्यू और सुसाइड प्वाइंट जैसे नाम तो हम सभी ने आमतौर पर सुने हैं और ये हमेशा ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के सबसे लोकप्रिय स्थान का नाम स्कैंडल प्वाइंट भी हो सकता है?

हिमाचल प्रदेश ही नहीं देश दुनिया के सबसे चर्चित पर्यटन स्थल शिमला में पर्यटकों के सर्वाधिक आकर्षण की केंद्र मॉल रोड (स्थानीय लोगों के लिए केवल मॉल) पर स्थित है यह स्कैंडल प्वाइंट। मौजूदा दौर में यह मॉल रोड के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहां सबसे ज्यादा संख्या में लोग जुटते हैं और ठंड के दिनों में धूप तापते हैं। पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रशासन ने यहां भरपूर मात्रा में बेंच भी लगाई हुई हैं ताकि वे आराम से बैठ सकें।

जैसा कि हम सभी जानते है कि शिमला, हिमाचल प्रदेश की राजधानी के साथ साथ भारत का एक प्रमुख हिल स्टेशन भी है। यह अपने औपनिवेशिक आकर्षण और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है। शिमला के केंद्र में स्थित माल रोड को शहर की धड़कन माना जाता है। इसी माल रोड का पश्चिमी छोर स्कैंडल पॉइंट के नाम से जाना जाता है। यह रास्ता आगे जाकर रिज रोड से मिल जाता है। 

 हम यह भी बखूबी जानते हैं औपनिवेशिक काल में शिमला ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। माल रोड उस समय ब्रिटिश अधिकारियों, उनके परिवारों और भारतीय रियासतों के राजा-महाराजाओं के लिए एक सामाजिक केंद्र था। कहा तो यह भी जाता है कि उस समय आम भारतीयों को मॉल रोड पर जाने की अनुमति नहीं दी। इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है क्योंकि अंग्रेज हम भारतीयों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार के कुख्यात थे और महात्मा गांधी तक को इस दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा था। जाहिर सी बात है कि वे हम काले भारतीयों को उनके मनोरंजन के लिए सृजित मॉल रोड पर कैसे आने देते।

अब आते हैं स्कैंडल प्वाइंट के पीछे की कहानी पर। स्कैंडल पॉइंट का नामकरण 19वीं सदी के अंत में हुई एक कथित घटना से हुआ। लोककथाओं के अनुसार, 1892 में पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह और तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय की बेटी के बीच प्रेम प्रसंग की अफवाहें उड़ी थीं। कहानी यह है कि महाराजा, जो अपनी आकर्षक शख्सियत और रईसी के लिए जाने जाते थे, ने वायसराय की बेटी को शिमला में भगा लिया था। यह घटना उस समय के रूढ़िगत ब्रिटिश और भारतीय समाज में एक बड़े विवाद का कारण बनी। इस प्रकरण ने शिमला के सामाजिक दायरे में इतनी हलचल मचाई कि इस स्थान को "स्कैंडल पॉइंट" नाम दे दिया गया। हालांकि, इस कहानी की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर कुछ इतिहासकार संदेह जताते हैं, लेकिन यह किंवदंती स्कैंडल पॉइंट की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

स्कैंडल पॉइंट का इतिहास औपनिवेशिक भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिशीलता को  भी दर्शाता है, जो आज भी शिमला के आगंतुकों को लुभाता है। वैसे भी, स्कैंडल पॉइंट अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण लोगों के मिलने-जुलने और गपशप करने का एक प्रमुख स्थान है। यह स्थान न केवल यहां सामाजिक गतिविधियों का केंद्र है बल्कि शिमला की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का भी साक्षी है। यहां स्थित जनरल पोस्ट ऑफिस और अन्य औपनिवेशिक इमारतें इस क्षेत्र के प्रशासनिक,ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ा देती हैं ।

स्वतंत्रता के बाद, स्कैंडल प्वाइंट के पास महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके फलस्वरूप यह स्थान ऐतिहासिक और देशभक्ति का प्रतीक भी है। पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे। यहां दर्ज विवरण के अनुसार उनकी यह प्रतिमा लाहौर से लाकर इस स्थान पर 15 अगस्त 1948 को स्थापित की गई थी ।

आज, स्कैंडल पॉइंट शिमला के सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है। यह अपने खुलेपन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यहां से हिमालय की चोटियों का मनोरम दृश्य दिखता है, और माल रोड की चहल-पहल इसे जीवंत बनाती है। पर्यटक यहां बैठकर शिमला की ठंडी हवाओं और औपनिवेशिक वास्तुकला का आनंद लेते हैं। कुल मिलाकर स्कैंडल पॉइंट शिमला की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का एक प्रतीक है, जो अतीत को वर्तमान को जोड़ता है।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...