सोमवार, 1 जनवरी 2024

भोपाल की रावण मंडी: जहां नहीं बिक पाना अभिशाप है…!!

यह भोपाल की रावण गली है। हालांकि भोपाल के लोग इसे बांसखेड़ी के नाम से जानते हैं लेकिन क़रीब महीने भर से यह रावण की गढ़ी है, लंका है…अच्छी खासी चौड़ी सड़क को रावण और उसके भाइयों ने घेर कर गली बना दिया है और आप यहां से बिना रावण निहारे गुजर भी नहीं सकते। यहां एक नहीं, अनेक रावण हैं,सैकड़ों रावण हैं और उतने ही उनके बंधु बांधव। यहां हर किस्म और आकार प्रकार के रावण हैं मतलब दो फुटिया रावण से लेकर बीस और पचास फुटिया तक…सौ फुटिया भी मिल सकते हैं लेकिन उसके लिए पहले से आर्डर देना होगा। छोटे रावण इस सड़क पर मुस्तैदी से सीना तान कर खड़े रहते हैं जबकि बड़े रावण लेटे रहते हैं…शायद,उनका बड़ापन (बड़प्पन नहीं) ही उन्हें लेटे रहने पर मजबूर कर देता है।
भोपाल यदा-कदा आने वाले लोगों की जानकारी के लिए, बांसखेडी से किसी गांव की कल्पना मत कर लीजिए। यह भोपाल के सबसे पॉश इलाकों को जोड़ने वाली अहम सड़क हैं। यहां से अरेरा कालोनी जैसे महंगे घरों वाले लोग भी गुजरते हैं तो प्रशासनिक अकादमी में प्रशासन का ककहरा सीखने और सिखाने वाले छोटे-बड़े अफसर भी। बांसखेड़ी के सामने स्थित भारतीय खान पान प्रबंधन संस्थान दिन-रात अपने लज़ीज़ और प्रयोगधर्मी व्यंजनों की भीनी भीनी खुशबू से यहां से आने जाने वालों को ललचाते रहता है तो सामने की सड़क ग्यारह सौ क्वार्टर और आजकल यहां तेजी से बढ़ रहे इडली डोसे और सांभर के ढेलों तक खींच ले जाती है। यही सड़क कैंपियन स्कूल और कभी उसके सामने लगने वाली लोकप्रिय खाऊ गली यानि चौपाटी तक ले जाती है तो मनीषा मार्केट और शाहपुरा झील तक भी छोड़ती है। यहीं से बंसल अस्पताल जाते हैं और थोड़ा सा आगे जाकर कोलार के कोलाहल घुलमिल जाते हैं ।
जब हम रावण के इस मोहल्ले से गुजरते हैं तो कोई हमें घूरता दिखता है तो कोई मुस्कराकर हमारी हंसी उड़ाता…जो भी हो,रंग बिरंगे कपड़ों में सजे रावण और उसके परिजन हमारा ध्यान खींचते ज़रूर हैं। जलने के कुछ घंटे पहले उनका आकर्षण और भी बढ़ जाता है क्योंकि वे जानते हैं कि उनका पुनर्जन्म तय है और अगले साल फिर उन्हें इसी जगह पर और भी आकर्षक रंग रूप में फिर अवतरित होना है। जितनी आकर्षक सज्जा उतनी अच्छी पूछ परख यानि कीमत। हमें रावण भी सुंदर चाहिए,उसका आकार भी बड़ा चाहिए और उसके अंदर आतिशबाजी भी आकर्षक और विदेशी चाहिए…शायद,रावण के जरिए हम अपनी कमियों को ढकने का प्रदर्शन करते हैं और फिर उसे जलाकर इन कमियों की भरपाई नहीं कर पाने का रोष व्यक्त करते हैं। हमारे अंदर भी राम-रावण द्वंद चलता रहता है। कभी हम बाहर से राम और मन से रावण होते हैं तो कभी इसके उलट…इसलिए, बांसखेड़ी से गुजरते समय रावण और उसका कुनबा हमें देखकर हंसता है। उसे अपनी नियति पता है और हमारी भ्रमित मनोदशा भी..शायद वह इसी का पूरा आनंद लेता है।
अब रावण और उसके कुनबे का परिवहन शुरू हो गया है। वे लेटकर,बैठकर और खड़े रहकर अपनी नियति की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। प्रदेश की इस सबसे बड़ी रावण मंडी में जिनकी बुकिंग पहले हो गई थी,वे रावण भरपूर कीमत में अट्टाहस करते हुए वाहनों में चढ़ रहे हैं। वहीं, अभी मोलभाव में उलझे पुतले हर पल अपनी कीमत घटा रहे हैं। समय पर अपना मूल्य निर्धारित नहीं कर पाने का खामियाजा तो सभी को भुगतना पड़ता है। जैसे जैसे जलने का समय क़रीब आ रहा है,पुतलों की छटपटाहट बढ़ रही है और क़ीमत घट रही है। यदि इस बार जलने से चूक गए तो किसी टोकनी, सूपा का हिस्सा बनकर जीवित रह जाएंगे और फिर अगले साल रावण कुनबे से दूर हो जाएंगे…कोई भी अपनी नियति से दूर नहीं होना चाहता और नियति को पाने के लिए विचारधारा से लेकर रीति/नीति और संस्कृति को त्यागने में भी पीछे नहीं रहता…शायद, इसी लिए चुनाव के दौरान असंतोष और दल बदल आम बात हो गई है। (24 Oct 2023)
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नए दौर के 'रक्तबीज' से कैसे निपटेगा चुनाव आयोग…!!

जैसे जैसे मतदान की तारीख़ क़रीब आ रही है चुनाव प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों के माथे की सिकन बढ़ रही है। प्रदेश में चुनाव आयोग के मुखिया और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन भी खुलकर अपनी चिंता जाहिर कर रहें हैं। इस चिंता का कारण है-मीडिया की दो प्रमुख धाराओं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया का तेज़ी से होता विस्तार। भोपाल स्थित प्रशासन अकादमी में पिछले दिनों हुई मीडिया कार्यशाला में जब 'मीडिया की ओर से मीडिया की भूमिका' को लेकर सवालों की बौछार हुई और मास्टर ट्रेनर सहित अन्य अधिकारी उसका पूरी तरह से सामना नहीं कर पाए तो उस मुश्किल वक्त में अनुपम राजन ने मोर्चा संभाला और बड़ी साफगोई से स्वीकार किया कि चुनाव आयोग भी मीडिया की भूमिका को लेकर मीडिया द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब तलाश रहा है और अब तक कोई समीचीन समाधान नहीं मिल पाया है।

अब बात उन चिंताओं की, जिनको लेकर खुद मीडिया भी चिंतित है। सबसे बड़ी चिंता न्यूज़ चैनलों का देशव्यापी विस्तार है। दरअसल,आदर्श आचार संहिता के दौरान 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार बंद करना पड़ता है और किसी भी मीडिया के जरिए सार्वजनिक रूप से चुनाव प्रचार नहीं किया जा सकता लेकिन राज्यों के चुनाव के दौरान यह आम बात हो गई है कि राष्ट्रीय स्तर के नेता किसी अन्य राज्य या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बैठकर टीवी चैनलों पर कुछ ऐसी बातें कह देते हैं जिसका प्रसारण चुनावी राज्यों सहित देशभर में होता है और उसका सीधा असर चुनावी राज्य में भी पड़ सकता है। एक तरह से चुनाव प्रचार भी हो जाता है और वे आचार संहिता के उल्लघंन के आरोप से भी बच जाते हैं। चुनाव आयोग चाहकर भी इस मामले में कुछ नहीं कर पाता।
दूसरा प्रश्न, चुनावी राज्यों में नेताओं के 'वन टू वन इंटरव्यू' से जुड़ा है। सवाल यह है कि ऐसे साक्षात्कार को क्या पेड न्यूज माना जा सकता है ? क्योंकि सूचनात्मक इंटरव्यू और प्रचारात्मक इंटरव्यू के बीच इतनी महीन सी रेखा है कि कब कोई न्यूज चैनल उसे लांघ जाए,पता ही नहीं चलेगा जबकि अख़बार में यह खुलकर स्पष्ट रहता है। न्यूज़ चैनलों को तो किसी तरह मॉनिटर भी किया जा सकता है लेकिन सोशल मीडिया का क्या!!…वह तो आंधी-तूफान की तरह काम करता है। जब तक चुनाव आयोग के कारिंदे सोशल मीडिया पर जारी किसी प्रचार वीडियो/पेड/फेक न्यूज की जड़मूल तक पहुंचकर उसे हटाएंगे तब तक वह पेड/फेक कंटेंट 'रक्तबीज' की तरह हजारों-लाखों में बदलकर 'इनफिनिटी' हो जाएगा जिसका अंतिम छोर तलाशना असंभव है। अब चुनाव आयोग कोई मां दुर्गा तो है नहीं कि रक्त की बूंद बूंद सुखाकर उसे खत्म कर दें इसलिए सोशल मीडिया को लेकर चौतरफा घेराबंदी तक इस पर लगाम कसना आसान नहीं है।
अब सोचिए, एआई यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मायासुर का साथ पाकर सोशल मीडिया चुनाव की निष्पक्षता और खासकर 'लेबल प्लेइंग फील्ड' यानि प्रचार के समान अवसर देने की नीति की कैसे धज्जियां उड़ा सकता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एआई की माया ऐसी है कि यह किसी की भी आवाज़/रूप बदलकर दो मिनट में सालों के परिश्रम को गुड़ गोबर कर सकता है। सोशल मीडिया और एआई की संयुक्त ताक़त से निपटना किसी भी सरकारी तंत्र के लिए अभी तो लगभग नामुमकिन है।
मोटे तौर पर देखें तो चुनाव के लिए बने 'मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट' शुरुआत में प्रिंट मीडिया और आकाशवाणी-दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यमों को ध्यान में रखकर बने थे। ये माध्यम अपने स्तर पर खुद ही इतनी सावधानी बरतते हैं कि चुनाव आयोग को आचार संहिता लागू करने में कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ती लेकिन टीवी और नए दौर के इंटरनेट मीडिया का प्रवाह इतना तीव्र है कि इन दोनों पर बांध बांधना अभी तो दूर की कौड़ी लग रहा है। हालांकि प्रौद्योगिकीय प्रगति ने निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने में मदद की है और निर्वाचन आयोग भी तकनीकी के इस्तेमाल में पीछे नहीं है, फिर भी तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज़ पर आदर्श आचार संहिता तोड़ने/बनाने का खेल जारी है। शायद इसलिए मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन को कहना पड़ा कि चुनौती बहुत बड़ी और दुरूह है। जिस पर किसी कागज़ी इंस्ट्रक्शंस से काबू नहीं पाया जा सकता। इसके लिए व्यवहारिक धरातल पर काम करने की जरूरत है और हम लोग पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं। उन्होंने इस मामले में मीडिया की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए यह भी कहा कि मीडिया की 'क्रेडिबिलिटी' बनाए रखना मीडिया की भी ज़िम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि मीडिया अपने ही सवालों, विश्वसनीयता खोने के खतरे और लोकतंत्र के यज्ञ में अपनी अनिवार्य निष्पक्ष भूमिका को बनाए रखने के लिए अपनी ही नई पीढ़ी से कैसे निपटता है…पांच राज्यों के चुनावों में उठे ये सवाल भविष्य में होने वाले बड़े चुनावों की निष्पक्षता और सभी दलों को समान अवसर की मजबूत बुनियाद बन सकते हैं।

सुनो वोटर…कि अब गए दिन चुनाव (बहार) के..!!

जब टीन के बने सांचे पर कभी 'हलधर किसान' तो कभी 'गाय बछड़ा' या फिर 'पंजा' और 'कमल' के फूल की छाप दीवार पर लगाने के लिए जब रंग के साथ लोग आते थे तो हम बच्चों में यह काम करने की होड़ लग जाती थी। पार्टी पॉलिटिक्स से परे छीना झपटी के बाद बच्चे दीवारें रंगने में तल्लीन हो जाते थे और यह काम करने आए लोग मस्त बीड़ी पीने में।

जब पार्टी के कार्यकर्ता झंडे/बिल्ले/ बैनर और पोस्टर लेकर आते थे तो टीन और गत्ते के बने बिल्लों को लेने और कमीज़ पर लगाने के लिए मारामारी हो जाती थी। जिसको रिबन के साथ या रिबन के फूल वाला बिल्ला मिल जाता था वो स्वयंभू बॉस बन जाता था। झंडे और बैनर तो बच्चों को मिलना दूर की कौड़ी थी।
चुनाव के बाद पार्टियों के बैनर और झंडे कई घरों में पोंछे के कपड़े, खिड़कियों के परदे और इसी तरह के दर्जनों दीगर कामों में खुलकर इस्तेमाल होते थे। गरीब परिवारों में तो वे बुजुर्गों की चड्डी और तकिए के कवर तक बन जाते थे।
शहर मानो रंग बिरंगे पोस्टरों,बैनर और झंडों से पट जाता था और आज की चुनावी तिथियों के संदर्भ में कहें तो दीपावली पर भी होली का सा रंगीन नजारा दिखाई पड़ने लगता था।
शहर से लेकर गांवों तक में लगे भोंपू/चोंगे,रिक्शों पर चलता अनवरत प्रचार और लगभग रोज होने वाली छोटी-बड़ी चुनावी सभाएं यह अहसास करा देती थीं कि चुनाव के दिन आ गए हैं। किसी को कोई शिकवा शिकायत नहीं और न ही दौड़-दौड़ कर चुनाव आयोग में चुगली करने जाने की जरूरत। सब अपनी अपनी हैसियत से भाईचारे के साथ चुनाव लड़ते थे। तब चुनाव राजनीतिक जंग नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया थे।
अब हालात बदल गए हैं और कुछ बदलाव वाकई सराहनीय भी है मसलन दीवारें लिखाई से और शहर पोस्टर बैनर से बदरंग नहीं होते। चुनावी खर्च की सीमा और चुनाव आयोग की सख़्त निगरानी ने सभी उम्मीदवारों को 'लेबल प्लेइंग फील्ड' दे दी है। भोंपूओ का कर्कस शोर नहीं है और न दिन रात की चिल्लपों…अब चुनाव होते नहीं, लड़े जाते हैं और चुनाव की 'तैयारियां' नहीं 'प्रबंधन' होता है। पोस्टर,बैनर और झंडों का स्थान सोशल मीडिया ने लिया है और आमसभाओं की जगह टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों या चुनाव केंद्रित कार्यक्रमों ने।
अब चुनाव की रणनीतियां बनती हैं,पार्टियां मुद्दे चुनती हैं,विवाद पैदा करती हैं,एजेंडा सेट करती हैं और फिर सोशल मीडिया और यूट्यूबर की हुल्लड़ ब्रिगेड उसे आगे बढ़ाकर व्यापक बनाती है। छोटे-छोटे चुनाव कार्यालयों का स्थान भव्य और कॉरपोरेट शैली में बने पार्टी ऑफिस ने लिया है। अब स्थानीय नेताओं द्वारा स्थानीय मुद्दों पर चर्चा की जगह बड़े और मंझे राष्ट्रीय प्रवक्ता बैठने लगे हैं और अब राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय स्तर पर प्रभाव डालने लगे हैं । विधानसभा क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, पार्क और स्कूल जैसे बुनियादी विषयों की जगह हमास-इजराइल संघर्ष जैसे अंतर राष्ट्रीय विषयों ने ले ली है। इसी तरह, जाति/प्रभाव/धर्म के मुताबिक बड़े नेताओं की बड़ी सभाएं होती हैं और वहां जनता की सुनी नहीं बल्कि अपनी बात कही जाती है।
अब चुनाव व्यवस्थित,शांत,खर्चीले, तकनीकी संपन्न और कौशल पूर्ण जरूर हो गए हैं लेकिन उनकी आत्मा यानि उल्लास और उत्साह के साथ जनभागीदारी कम हो गई है लेकिन उसे गुपचुप तौर पर कुछ मिलने की उम्मीद बढ़ गई हैं। कहते हैं न कि समय एक सा नहीं रहता और बदलाव ही विकास का सूचक है। जैसे, हम कागज़ के मतपत्र और मतपेटियों के दौर से वोटिंग मशीन तक आ गए,हो सकता है भविष्य में मतदान केंद्र जाने की जरूरत ही नहीं पड़े और अभी हमें उंगलियों पर नचाने वाला मोबाइल फोन ही हमारा मतपत्र और लोकतंत्र का सबसे बड़ा साधन बन जाए तब तक तो यही कहना ठीक है कि…अब गए दिन चुनावी बहार के !! (4 Nov 2023)

भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण

 


भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण

मतदाता तुम्हें बुलाने को

17 नवंबर भूल न जाना

वोट डालने आने को।'
आमतौर पर विवाह समारोह के निमंत्रण कार्ड पर छपने वाली ये पंक्तियां इस बार मध्य प्रदेश में मतदाताओं को बुलाने और मतदान के लिए जागरूक करने में इस्तेमाल की जा रही हैं। भोपाल में जिला प्रशासन ने मतदाताओें को मतदान केंद्र तक बुलाने के लिए वैवाहिक कार्ड की तर्ज पर आकर्षक निमंत्रण पत्र तैयार किए हैं। ये कार्ड मतदाता पर्चियों के साथ घर घर पहुंचाए गए हैं। जिस प्रकार वैवाहिक कार्ड में दिनांक,समय और कार्यक्रम स्थल का उल्लेख होता है,उसी प्रकार इस कार्ड में भी मतदान की तिथि 17 नवंबर, समय सुबह 7 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक और आयोजन स्थल की जगह आपका मतदान केंद्र लिखा गया है।
कार्ड में स्वागत कर्ता की जगह बूथ लेबल अधिकारी,निवेदक जिला निर्वाचन अधिकारी और दर्शनाभिलाषी में पीठासीन अधिकारी सहित मतदान दल के सभी सदस्य शामिल हैं। वोटवीर की ओर से जारी इन कार्ड का समापन सभी निमंत्रण पत्रों की लोकप्रिय बाल मनुहार पंक्तियों 'हमारे कार्यक्रम में जरूर जरूर आना'... की तर्ज पर किया गया है। इसमें लिखा गया है कि -'हमारे विधानसभा चुनाव में मतदान करने जरूर जरूर पधारना।'
आम लोग भी इस नवाचार की सराहना कर रहे हैं। अब देखना यह है कि वोट डालने कितने लोग घर से निकलते हैं।
"वोट जरूर डालिए,यह अधिकार ही नहीं हमारा कर्त्तव्य भी है।" (16 Nov 2023)

"हम भारत के लोग…!!"



हमारे संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत ही इन शब्दों से होती है, ‘हम भारत के लोग’..। हम भारत के लोग वाकई अद्भुत हैं और अलग भी। हमें समझना आसान नहीं है पर हमसे जुड़ना बहुत सरल है क्योंकि हम सहज हैं। शायद तभी ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ फिल्म में गीतकार ने लिखा है:

“हम लोगों को समझ सको
तो समझो दिलबर जानी
जितना भी तुम समझोगे
उतनी होगी हैरानी”
हम भारत के लोग… वाकई दुनिया से अलग हैं और शायद इसी वजह से पूरी दुनिया में कभी भी-कहीं भी घुल मिल जाते हैं और मौका मिलते ही उस देश के रंग में पूरी तरह मिलकर वहीं बस तक जाते हैं लेकिन फिर भी अपनी पहचान का सबसे गाढ़ा रंग सहेजकर रखते हैं यह रंग है भारतीयता का और उदघोष है हम भारत के लोग का। हम, अमेरिका में भी भारतीय बने रहते हैं और कई बार भारत में भी ‘मेड इन यूएसए’ (उल्लासनगर सिंधी एसोसिएशन) जैसा कारनामा कर दिखाते हैं। हम इतने बेफिक्र हैं कि कारगिल पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को नजर अंदाज़ करते रहते हैं लेकिन जब उन्हें मारकर बाहर निकालने की ठान लेते हैं तो फिर ‘ये दिल मांगे मोर’ को जयघोष बनाकर उन्हें कारगिल की उन्हीं बर्फीली चोटियों पर दफन करके ही छोड़ते हैं। हम हफ्तों तक सुरंग में दिन गुजारने का हौंसला रखते हैं और इसके उलट मामूली सी परेशानी में भी घबराकर पूरे परिवार के साथ आत्महत्या करने जैसा दुस्साहस भी कर डालते हैं।
हम भारत के लोग..दुनिया भर के लोगों से वाकई अलग हैं। यही वजह है कि कोरोना संक्रमण के भीषण दौर में भी हम बिंदास होकर बीमारी से नहीं बल्कि पुलिस से बचने के लिए मास्क लगाते थे जैसे आज भी बाइक पर हेलमेट और कार में सीट बेल्ट बस पुलिस को दिखाने के लिए लगाते हैं। हम हेलमेट भी सुरक्षा की दृष्टि से कम फैशन के लिहाज से ज्यादा खरीदते हैं। लेकिन हमारा यही खिलंदड़पन हमें कोरोना के भीषणतम संक्रमण से भी बचा ले जाता है। यह हमारी सहजता ही है कि हम वायरस को ताली,थाली और दिए से भी भगाते हैं और फिर वैक्सीन लगवाने में भी दुनिया में रिकार्ड बना देते हैं। हम देशसेवा से लेकर समाजसेवा का ज्ञान देने में कभी पीछे नहीं रहते लेकिन जब उस पर अमल करने की बारी आती है तो हम उम्मीद करते हैं कि शुरुआत पड़ोसी के घर से हो।
हम भारत के लोग…वाकई,सबसे अलग हैं तभी तो स्वच्छता अभियान में जी जान से जुट जाते हैं और अपने शहर को नंबर वन बनाने में भी पीछे नहीं रहते लेकिन अगले ही पल उस दीवार को पान गुटखे की पीक से जरूर रंगते हैं जहां लिखा होता है कि ‘यहां थूकना मना है’। दीवारों को गीला करने में तो हमारा कोई सानी नहीं है। हम अन्न की बरबादी पर ज्ञान पेलने में सबसे आगे रहते हैं लेकिन किसी शादी-ब्याह में प्लेट भरकर खाना लेकर छोड़ देना हमारी फितरत का हिस्सा है। हम अपनी बेटी की शादी में दहेज के विरोधी हैं लेकिन बेटे की शादी में भरपूर दहेज की उम्मीद करते हैं। आपदा के समय हम घर के जेवर तक दे देते हैं, जरूरतमंदों के लिए खाने-पीने से लेकर जूते चप्पल तक जुटा लेते हैं और फिर स्थिति सामान्य होते ही मनमाना मुनाफा कमाने से भी नहीं चूकते। तभी तो फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ के गीत की पंक्तियां आगे कहती है:
“अपनी छतरी तुमको दे दे
कभी जो बरसे पानी
कभी नए पैकट मे बेचे
तुमको चीज पुरानी।”
हम भारत के लोग…सबसे जुदा हैं तभी तो एक सौ चालीस करोड़ की आबादी में महज तीन फ़ीसदी लोग ही टैक्स देना जरूरी समझते हैं और यहां चार्टर्ड एकाउंटेंट का काम वित्तीय लेनदेन में ईमानदारी से ज्यादा टैक्स बचाने के नुस्खे बांटना है लेकिन सार्वजनिक सुविधाओं में कमी के लिए सरकार को कोसने में सबसे आगे रहते हैं। हम क्रिकेट पर जान छिड़कते हैं और विश्व कप में हार पर ‘राष्ट्रीय मातम’ मनाते हैं लेकिन अगले ही दिन मिली जीत पर पटाखे चलाने से भी नहीं चूकते। हम प्रदूषण के खिलाफ़ खुलकर बोलते हैं पर अंधेरे में सड़क पर कचरा फेंकने या फिर सड़कों पर कानफोडू हॉर्न बजाने को अपना अधिकार समझते हैं। हम बच्चों को आदर्श नागरिक बनाना चाहते हैं लेकिन अगले ही पल ‘कह दो पापा घर पर नहीं हैं’ जैसे झूठ बोलने से या बच्चों के सामने सिग्लन जंप करने से परहेज नहीं करते।
हम भारत के लोग… सब कुछ हो सकते हैं झूठे,मक्कार,लालची,बिकाऊ,स्वार्थी सब कुछ,लेकिन जब बात लोकतंत्र की मजबूती की हो तो हम पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपनी समझ से अच्छे अच्छे राजनीतिक पंडितों के होश उड़ा देते हैं।..और जब बात देश की आन-बान-शान की हो तो ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झंडा ऊंचा रहे हमारा’ का नारा देश का मंत्र बन जाता है। फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ के गीत की ये पंक्तियां हम भारत के लोगों पर सटीक बैठती हैं:
“थोड़ी मजबूरी है लेकिन
थोड़ी है मनमानी
थोड़ी तू तू मै मै है
और थोड़ी खींचा तानी
हम में काफी बाते हैं
जो लगती है दीवानी।”
हम भारत के लोग…वाकई,दीवाने हैं, विरले हैं, सबसे अलग हैं पर जैसे भी हैं सबसे अच्छे हैं। (28 Nov 2023)

मैं, मुख्यमंत्री निवास हूं…प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास…!!


मैं, मुख्यमंत्री निवास हूं…प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास। फिलहाल मेरी पहचान भोपाल के ‘6-श्यामला हिल्स’ के तौर पर है जहां मौजूदा मुख्यमंत्री रह रहे हैं। यह बंगला शायद मेरा अब तक का सबसे आदर्श पता है। श्यामला हिल्स की ऊंची और हरियाली की चादर ओढ़े खूबसूरत पहाड़ी पर बना मेरा यह घर मुख्यमंत्री पद की आन-बान-शान के बिल्कुल अनुरूप है। मेरे सामने मौजूद बड़ा तालाब अपनी उछलकूद करती लहरों के बाद भी शांत रहकर मुझमें भी धैर्य का संचार करता है और दिन भर की राजनीतिक सरगर्मियों के बाद भी मेरे अंदर ठहराव का कारण यही है। बड़ा तालाब अपने विस्तार और प्रवाह से मेरे अंदर के बड़प्पन का स्मरण कराता रहता है। आखिर,मुख्यमंत्री की मेजबानी,उनकी चिंताओं, खुशियों, दुःख, राजनीतिक उठा पटक, साज़िश और पद के सुकून सहित इतना कुछ सहने के बाद भी बड़े तालाब सा शांत रहने के लिए बड़प्पन तो चाहिए ही।
अब एक बार फिर सभी की निगाह मुझ पर टिकी हैं…राजनीति के उद्भट खिलाड़ियों से लेकर गुणा भाग में माहिर नेताओं तक,मीडिया के सीधे तने सिद्धांत प्रिय पत्रकारों से लेकर रीढ़ विहीन कलमकार और बाइट वीर तक मेरी ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं। आम जनता के साथ साथ मुझे भी हर चुनाव के साथ अपने नए ‘किरायेदार’ का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। किरायेदार इसलिए,क्योंकि मैं और मेरी पहचान तो कमोवेश अब स्थाई हो गई है लेकिन मेरा आतिथ्य स्वीकार करने वाले जरूर अस्थाई होते हैं। कोई पांच साल,कोई ढाई साल तो कोई पंद्रह महीने..और किसी की तो बस कल्पना का हिस्सा ही बन पाता हूं मैं। शिवराज जी जैसे कुछ ही भाग्यशाली हैं जिन्होंने सालों साल मुझे भोगा है,मुझे संवारा है और खुद को भी निखारा है।
ऐसा नहीं है कि मुझे अपने जन्म के साथ ही श्यामला हिल्स का यह भव्य और गरिमामय ठिकाना मिल गया था बल्कि यहां तक पहुंचने के लिए मैंने भी प्रदेश की राजनीति की तरह लंबा फासला तय किया है। अब कहा तो यह भी जा सकता है कि प्रदेश का मुखिया जहां रहेगा वह अपने आप में सबसे बड़ी पहचान है लेकिन मेरी भी तो अपनी कोई हैसियत है न… और इसलिए ठिकाना भी स्थाई होना चाहिए। जब हमारे राज्य मप्र का जन्म हुआ और प्रदेश को पंडित रविशंकर शुक्ल के रूप में पहला मुखिया मिला तो पुराने शहर का आइना बंगला मेरी पहचान बन गया जिसे आज आप स्टेट गेस्ट हाउस के तौर पर जानते हैं। पंडित शुक्ल के बाद डॉ कैलाश नाथ काटजू और भगवंत राव मंडलोई को भी मुझमें कोई खोट नज़र नहीं आया लेकिन पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र पता नहीं क्यों मुझसे कुछ खफा हो गए और मेरा ठिकाना बदलकर श्यामला हिल्स स्थित निशात मंज़िल हो गया । पुराना पता बदलने का दुःख तो हुआ लेकिन नया परिवेश शानदार लगा तो फिर यहीं मन लग गया। प्रकाश चंद सेठी मुझे प्रोफेसर कालोनी ले गए लेकिन मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं श्यामला हिल्स के इर्द गिर्द ही हूं ।
फिर आए पंडित रविशंकर शुक्ल के पुत्र और उस कालखंड में प्रिंस चार्मिंग कहे जाने वाले श्यामाचरण शुक्ल। उनका दिल मेरे वर्तमान ठिकाने ‘6 श्यामला हिल्स’ पर आ गया और उनके साथ ही मेरे सजने संवरने के दिन भी शुरू हो गए। अब तक गेस्ट हाउस बनकर जमाने भर के प्रिय-अप्रिय लोगों की सेवा से मैं भी आजिज आ चुका था इसलिए श्यामा भैया की संगत में मैंने भी रुतबा हासिल करना शुरू किया। अरे, जब दुनिया भर में बड़े नेताओं के स्थाई पते हो सकते हैं तो देश के दिल मध्यप्रदेश के मुखिया का भला स्थाई पता क्यों नहीं होना चाहिए? श्यामा भैया,चाय के शौकीन थे और अपने करीबी लोगों को खुद विलायती रवायत से चाय बनाकर पिलाते थे। उनकी चाय की खुशबू से मेरा भी रोम रोम महकने लगता था। मैंने, अर्जुन सिंह का रूआब भी देखा है तो दिग्विजय सिंह की जिंदादिली भी, उमा भारती की अध्यात्मिकता से लेकर कैलाश जोशी का संतत्व,मोतीलाल वोरा की सादगी, शिवराज का संपर्क, सुंदरलाल पटवा और वीरेंद्र कुमार सखलेचा की गंभीरता भी। मैंने कमलनाथ के छोटे से दौर में खुद को बड़ा होते हुए भी देखा है। वैसे, कमलनाथ और मेरे बीच एक संबंध और भी है। वे इन दिनों जिस बंगले में रह रहे हैं वह गोविंद नारायण सिंह के दौर में कभी मुख्यमंत्री निवास रह चुका है।
अब,एक बार फिर विधानसभा चुनाव मेरे लिए भी पहेली बन गए हैं। जब एक्जिट पोल को भी अपने एक्जैक्ट होने पर शक है तो फिर मैं तो ईंट पत्थर का ढांचा बस हूं। मैं, न तो अपना नया किरायेदार तय कर सकता हूं और न ही कोई भविष्यवाणी। दशकों से मुख्यमंत्रियों का आवास होने का मतलब यह तो नहीं है न, कि मैं राजनीति की उलझी हुई गुत्थियों को सुलझा लूं । मैं,राजनीति के खेल का मूक दर्शक भर हूं जो महसूस तो सब कर लेता है पर कर कुछ भी नहीं सकता। हां,मैं बस इतना चाहता हूं कि प्रदेश का मुखिया कोई भी बने लेकिन मेरे रुतबे में कोई कमी नहीं आए बल्कि मेरी भव्यता दिन ब दिन और निखरती जाए ताकि मैं भी गर्व के साथ कह सकूं कि मैं 6 श्यामला हिल्स हूं, मप्र के मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास। (3 Dec 2023)

शनिवार, 7 अक्टूबर 2023

भोपाल में क्यों मंडरा रहे हैं खौफनाक गर्जना के साथ लड़ाकू विमान...!!


आमतौर पर अपनी शांत तासीर के लिए मशहूर भोपाल का आसमान इन दिनों लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा है, बिल्कुल युद्ध सा माहौल है…सुखोई,जगुआर,मिराज जैसे दुश्मन के कलेजे में खौफ पैदा कर देने वाले 50 से ज्यादा लड़ाकू एवं परिवहन विमान और हेलीकाप्टर भोपाल के ऊपर मंडरा रहे है। उनकी गर्जना से पूरे शहर और खासतौर पर मुख्यमंत्री निवास,भारत भवन, श्यामला हिल्स और न्यू मार्केट सहित तमाम इलाक़े इन विमानों की गर्जना से थरथरा रहे हैं। आलम यह है कि नए जमाने की तकनीक संपन्न कारें इन विमानों की गर्जना से पिपयाने लगती हैं और जैसे ही वे किसी तरह शांत होती हैं फिर कोई विमान गड़गड़ाहट के जरिए अपनी आन-बान और शान का मुजाहरा पेश करते हुए गुजर जाता है और फिर बेचारी कारें डर के कारण घिघयाने लगती हैं।

हालांकि,बच्चों और महिलाओं को यह गर्जना अचंभित कर रही है तो युवाओं के लिए यह किसी जयघोष के समान है,देश की शक्ति संपन्नता का जयकार और सुरक्षित भविष्य का विजयनाद है। वहीं,बुजुर्ग हो चली पीढ़ी के लिए आसमान में मंडरा रहे ये विमान पुराने युद्धों पर यादों की जुगाली का मसाला प्रदान कर रहे हैं।

विमानों की यह चहलकदमी बीते कुछ दिनों से जारी है और 30 सितंबर तक इसी तरह अपने अट्टाहस से आसमां को गुंजायमान रखेगी। भोपाल के बतोलेबाज कभी इसे प्रधानमंत्री की भोपाल यात्रा की ड्रिल करार देते हैं तो कभी इसे चुनावों से तो कभी पाकिस्तान से युद्ध की तैयारी बना देते हैं। असलियत यह है कि, भारतीय वायुसेना इस साल वायुसेना दिवस के अवसर पर इसे जनभागीदारी का और जनता का उत्सव बनाने में जुटी है इसलिए दिल्ली में सालाना तौर पर होने वाला फ्लाईपास्ट देश के अलग अलग शहरों में हो रहा है।

भोपाल को जरूर पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हो रहे फ्लाईपास्ट यानि लड़ाकू विमानों के कारनामों की मेजबानी का अवसर मिला है इसलिए लोग अचंभित है और उल्लासित भी। वायुसेना द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक फ्लाईपास्ट में विभिन्न किस्म के 50 के करीब विमान शामिल होंगे और वे 30 सितंबर को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सहित कई सैन्य-असैन्य दिग्गजों की मौजूदगी में सुबह 10 बजे से क़रीब घंटे भर तक भोपाल के आकाश में हैरतअंगेज अठखेलियां करेंगे। इनमें लड़ाकू विमानों के साथ सूर्यकिरण और सारंग नामक हेलीकाप्टर टीमों के कारनामे तो दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर देते हैं। 30 तारीख को फाइनल प्रदर्शन से पहले 28 सितंबर को फुल ड्रेस रिहर्सल यानि सौ टका टंच अभ्यास होगा और उसके पहले कुछ दिन तक सामान्य अभ्यास जिससे तमाम कौशल के बाद भी चूक की कोई गुंजाइश न रहे…इसलिए भोपाली दिल धड़का देने वाली गर्जना के लिए कुछ और दिन अपने कान और कलेजा मजबूत किए रहें और फिर पूरे जोश,उल्लास और देश प्रेम के साथ सपरिवार आनंद लें अनूठे एयर शो का..जो शायद वर्षों तक उनके दिलो दिमाग पर छाया रहेगा।

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चार देश चालीस कहानियां

 पुस्तक: चार देश चालीस कहानियां


लेखक:संजीव शर्मा

विधा: यात्रा वृतांत/रिपोर्ताज

पृष्ठ: 164

मूल्य: 200 रुपए

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

समीक्षक: प्रवीण दुबे,वरिष्ठ पत्रकार

इन दिनों अपने नए काम की व्यस्तता में इतना उलझा हूँ कि कुछ पढने लिखने का वक्त ही नहीं मिल पा रहा है..इस बीच संजीव शर्मा जी की नई किताब "चार देश चालीस कहानियां" की प्रति प्राप्त हुई... अमूमन मैं कोई भी किताब निरंतरता में ही पढ़ता हूँ यानी जब तक ख़त्म नहीं होती,तब तक छोड़ता नहीं... इसके साथ वैसी संभावना मेरी नई ज़िम्मेदारियों के चलते नहीं थी लेकिन जैसे ही मैंने पढ़ना शुरू किया तो इतनी रोचक और इतने प्रवाह के साथ इसमें तथ्यों को पिरोया गया है कि वही पाठक वाली निरंतरता इसमें भी बनी रही... पूरा पढने के बाद खुद तय नहीं कर पाया कि इसे किस श्रेणी में रखा जाए...ये यात्रा संस्मरण है....रिपोर्ताज है..सांस्कृतिक संकलन है...या फिर किसी यायावरी का दस्तावेज...चूंकि संजीव जी खुद बेहतरीन पत्रकार हैं..भाषा पर नियंत्रण उनका बहुत अच्छा है...दूसरे, वे उस इलाके से आते हैं जहाँ भगोने का पका हुआ एक चावल देखना हो तो ओशो और यदि दूसरा चावल देखना हो तो दादा आशुतोष राणा... कहने का आशय ये है कि उस इलाक़े में मां सरस्वती की कृपा कैसे बरसती है, ये दो नाम ही उसे झलकाने के पर्याप्त है.... संजीव शर्मा जी ने भी अपने उस इलाकाई गौरव को जीवंत रखा है... जब वे जापान में रहने वालों की देहयष्टि का जिक्र करते हैं तो, जो उनके अपने क्षेपक होते हैं,वे बेहद लाजवाब होते हैं... नार्थ ईस्ट के बारे में इतने रोचक तरीक़े से तथ्यों का प्रतुतिकरण मैंने नहीं पढ़ा कहीं और....मैं उस इलाके में जाने का इच्छुक बहुत हूँ लेकिन अब तक कोई ऐसा संयोग उपस्थित नहीं हो पाया...इनकी किताब के ज़रिए मैंने वहां की यात्रा सी कर ली..वो भी घर बैठे बैठे... बेहतरीन संग्रह है यदि आप अलग अलग जगह के लोगों की तासीर समझने के इच्छुक रहते हैं तो इसे पढ़ना 

चाहिए।

फ्लाईपास्ट और आलू की सब्जी-पूरी…

हालांकि, बीच में एक दौर ऐसा भी आया था जब हवाई यात्रा के दौरान भी कभी-कभार पूरी-सब्जी महकने लगी थी। यह वह दौर था, जब केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए पूर्वोत्तर राज्यों, कश्मीर और लद्दाख की यात्रा के दौरान हवाई यात्रा के दरवाजे खोल दिए थे। तब, पहली बार परिवार के परिवार इस उड़न खटोले की यात्रा का स्वप्न लेकर अचार-पूरी के साथ हवाई अड्डों पर नजर आने लगे थे। हवाई जहाज़ में सीट पर पालती मारकर आलू की सब्जी और पूरी के साथ चूड़ा/नमकीन खाते परिवारों ने 'इलीट क्लास' या संपन्न वर्ग को नाक-मुंह सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि, अब तो ट्रेन में भी घर की बनी आलू-पूरी का स्थान जोमेटो, स्वीगी और इस तरह के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सुविधा के साथ मिलने वाले गर्मागर्म चाइनीज और पिज़्ज़ा-बर्गर ने ले लिया है, बिल्कुल वैसे ही, जैसे पानी के लिए घर की खूबसूरत छोटी सी सुराही की जगह ट्रेन में प्लास्टिक की बॉटल काबिज हो गई है।

खैर, विषय पर लौटते हैं और फ्लाईपास्ट में आलू-पूरी की गुत्थी सुलझाते हैं। भारतीय वायुसेना इस साल अपना 91 वा स्थापना दिवस मना रही है और आम लोगों को वायुसेना से जोड़ने के लिए अलग-अलग शहरों में विविध कार्यक्रम किए जा रहे हैं। जनभागीदारी के साथ उत्सव की इस श्रृंखला में भोपाल के हिस्से में वायुसेना का फ्लाईपास्ट आया और 30 सितंबर को हैरत अंगेज प्रदर्शन से पहले ही लड़ाकू विमानों की गर्जना ने भोपालियोँ को नींद से जगा दिया था। सोशल मीडिया में छाई तस्वीरों, इंस्टाग्राम रील,वीडियो और आसमान में गूंजती गड़गड़ाहट ने भोपालियों को पहले ही मुख्य इवेंट के लिए तैयार कर दिया था। इस शहर के लोग तो सौ रुपए टिकट देकर भी घण्टे भर के नाटक के लिए घंटों लाइन में लगने से भी परहेज नहीं करते तो फिर ये तो फ्लाईपास्ट था और वो भी मुफ़्त। ऐसा फ्लाईपास्ट, जो इस शहर में पहली बार हो रहा था…बस,फिर क्या था हो गई तैयारी शुरू और फिर परिवार कुटुंब में बदले और एकल फैमिली कालोनी में। कहने का आशय यह है कि भोपाल के लोगों के लिए यह पिकनिक का दिन था,उत्सव का दिन था,उल्लास का और एकजुट होकर मस्ताने का मौका था। अल सुबह से ही बड़े तालाब के रास्तों पर भीड़ उमड़ने लगी। प्रशासन ने मुख्यमंत्री निवास से बोट क्लब तक 'पास' अनिवार्य किया तो भोपाल के लोगों ने उसका भी रास्ता निकाल लिया । वे पास की अनिवार्यता लागू होने के पहले ही दरी-चटाई और सब्जी-पूरी के साथ आयोजन स्थल पर जम गए। जैसे ही आसमान में विमानों की अठखेलियां शुरू हुई, तो धरती पर चटाई दरी बिछ गई…धीरे-धीरे थैलों से डिब्बे और फिर डिब्बों के अंदर से डिब्बे तथा थर्मस निकलने लगे और अचार से लेकर चाय तक की खुशबू से बोट क्लब और वीआईपी रोड महकने लगी।

तेज़ धूप में डेढ़ घंटे के फ्लाईपास्ट के बाद जब पासधारी तबका भीड़ से किसी तरह निकलने की जद्दोजहद में जुटा था, वीआईपी कारें अपने हूटर के जरिए अपने ख़ास होने के दर्जे के बाद भी हजारों लोगों की भीड़ में छटपटा रही थीं और उनके प्रोटोकाल/सुरक्षा कर्मी ढंग से खुद निकलने का रास्ता भी नहीं बना पा रहे थे तब स्मार्ट भोपाली पूरी तरह से बोट क्लब पर फैल पसर चुके थे और तल्लीनता के साथ आलू की सब्जी पूरी, अचार के साथ चाय की चुस्कियां ले रहे थे। हम जैसे भीड़ में फंसे लोगों के साथ साथ कार में एसी की ठंडक में कैद वीआईपी लोगों को भी भोपालियों के इस मज़े से पक्का जलन हो रही होगी। इन लोगों को न जाम की परवाह थी, न आराम की और न ही घर जाने की। चार घंटे की भरपूर पिकनिक, तसल्ली से पेटपूजा और बच्चों की जीभर के धमा-चौकड़ी के बाद यहां से वापसी शुरू हुई। तब तक जाम भी खुल गया था और रास्ते भी…इसलिए लोग सुकून से घर लौटे और फिर किसी नए आयोजन की तैयारी में जुट गए क्योंकि कल इतवार है और सोमवार को बापू की मेहरबानी से एक और छुट्टी।

शनिवार, 8 जुलाई 2023

मप्र और आकाशवाणी भोपाल के बीच है जन्मजात रिश्ता

ये आकाशवाणी भोपाल है...सुबह घर घर में गूंजने वाली यह आवाज़ किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं।आज भी कई पीढ़ियों की आंख इस धुन और आवाज़ के साथ खुलती है। हालांकि अब  दिन के कुछ घंटों के दौरान इसे आकाशवाणी मध्य प्रदेश के नए और बड़े दायरे वाले नाम से भी पुकारा जाने लगा है।

 मप्र और आकाशवाणी भोपाल के बीच जन्मजात रिश्ता है। बस,दोनों के जन्म में महज 24 घंटों का अंतर है और इस फर्क के लिहाज़ से आकाशवाणी भोपाल को मप्र का बड़ा भाई होने का गौरव हासिल है। दरअसल, आकाशवाणी भोपाल की स्थापना 31अक्तूबर 1956 में एक छोटे से काशाना बंगले से प्रायोगिक स्टूडियो और महज 200 वॉट के ट्रांसमीटर से हुई थी जबकि मप्र राज्य की इसके केवल एक दिन बाद, यानि 1 नवंबर 1956 को। हां, भोपाल से समाचारों का प्रसारण ज़रूर मध्य प्रदेश के जन्म के साथ ही हुआ । आकाशवाणी भोपाल ने मध्य प्रदेश की स्थापना के दिन से ही यहां की विकास यात्रा,संस्कृति,विरासत,साहित्य,संगीत और राजनीतिक घटनाक्रम को पूरी विश्वसनीयता के साथ बताना और सहेजना शुरू कर दिया था। 

करीब तीन दशक से ज्यादा समय से भोपाल केंद्र की इस यात्रा के साक्षी अनिल मुंशी बताते है कि 'भोपाल ने दिसंबर 1984 में दुनिया की सबसे भीषण आपदा का सामना किया तब भी आकाशवाणी ने यहां के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस भयावह दुर्घटना का सामना किया था । भोपाल गैस त्रासदी के दौरान जब लोग घरों से वापस निकलने में घबरा रहे थे तब आकाशवाणी भोपाल ने मौके पर जाकर जुटाए गए तथ्यपरक समाचारों और जन सरोकारी कार्यक्रमों से न केवल लोगों का मनोबल बढ़ाया बल्कि सही समय पर मदद पहुंचाने में भी भूमिका निभाई।'

इस दौरान कार्यक्रम अधिकारी रहे चित्रेंद्र स्वरूप राजन बताते हैं कि आकाशवाणी भोपाल ने आपदा में भी नॉन स्टॉप प्रसारण जारी रखा।उन्होंने बताया कि 'गैस त्रासदी के अलावा, मानस गान और फिर 104 एपिसोड की मानव का विकास श्रृंखला का उर्दू अनुवाद जैसे कार्यक्रमों से भी इस केंद्र ने खूब नाम कमाया है।'

हाल ही में कोरोना संक्रमण के दौरान समाचारों का घर से प्रसारण कर भोपाल के प्रादेशिक समाचार एकांश ने ऐसी मिसाल कायम की कि प्रसार भारती के तत्कालीन सीईओ शशि शेखर वैंपति तक ने इसकी जमकर सराहना की थी।


अब हो सकता है रेडियो सेट के जरिए आकाशवाणी भोपाल से जुड़ने वाले श्रोता कम हो लेकिन न्यूज ऑन एआईआर ऐप और  5यूट्यूब, ट्विटर और फेसबुक के जरिए नई पीढ़ी भी तेजी से जुड़ रही है इसलिए छह दशक बाद भी मप्र के साथ आकाशवाणी भोपाल की यह यात्रा लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही है।


अब करिए प्रधानमंत्री के साथ कदमताल और खिंचवाइए तस्वीर...!!

एक समय हम आप अपने पसंदीदा नेता की एक झलक देखने के लिए परेशान रहते थे लेकिन अब आप उनके साथ तस्वीर निकलवा सकते हैं,घूम सकते हैं और उनके ऑटोग्राफ हासिल कर सकते हैं…वह भी महज पचास रुपए में। इतने कम पैसे में इंदिरा गांधी आपको हस्ताक्षरित पत्र लिख सकती हैं और पचास रुपए में ही अटल बिहारी वाजपेई आपके साथ फोटो खिंचवा सकते हैं..कुछ और पैसे खर्च करें तो आप सौ रुपए में पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक और राजीव गांधी से लेकर चंद्रशेखर तक किसी के भी साथ वॉक कर सकते हैं…और बिना फूटी कौड़ी खर्च किए भी आप अपनी तस्वीर के साथ ज्ञान बांट सकते हैं और हाथों में हाथ डालकर एकता श्रृंखला यानि यूनिटी चेन बना सकते हैं… इतना ही नहीं, और भी बहुत कुछ है दिल्ली में सुप्रसिद्ध तीन मूर्ति के साथ बने अनूठे प्रधानमंत्री संग्रहालय यानि पीएम म्यूज़ियम में। वैसे, प्रधानमंत्री संग्रहालय में लगने वाली फीस केवल हमारे अंदर जिम्मेदारी का भाव जगाने के लिए है क्योंकि मुफ़्त में तो ताजमहल की भी कद्र नहीं है। 

43 गैलरी में सजायी गई 15 प्रधानमंत्रियों की जीवन गाथा,उपलब्धियों,फैसलों और तस्वीरों को ऑडियो,वीडियो, लाइटिंग,आईटी और एआई जैसी तमाम तकनीकों के जरिए इतने अद्वितीय तरीके से संजोया गया है कि आप यहां घंटों गुजारने के बाद भी अतृप्त लौटते हैं। हमारी आज़ादी की लड़ाई से लेकर उसके बाद के 75 सालों की सभी बड़ी घटनाएं यहां जीवंत हो उठी हैं। 

हम कह सकते हैं कि प्रधानमन्त्री संग्रहालय स्वतंत्रता के बाद से भारत के प्रत्येक प्रधान मंत्री को एक आदरांजलि है, और पिछले 75 वर्षों में हमारे देश के विकास में उनके योगदान का एक वर्णनात्मक रिकॉर्ड है। यह प्रधानमंत्रियों के सामूहिक प्रयास का इतिहास है और भारत के लोकतंत्र की रचनात्मक सफलता का शक्तिशाली प्रमाण भी ।

इसलिए, दिल्ली जाएं तो प्रधानमंत्री संग्रहालय ज़रूर जाए…यह इंडिया गेट,नया संसद भवन और कर्तव्य पथ जैसा ही एक प्रमुख आकर्षण है।

मानवीय बुद्धिमत्ता के सामने कृत्रिम ज्ञान की क्या बिसात…!!


इन दिनों सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल है जिसमें एआई यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बने फोटो से यह बताया जा रहा है कि भगवान राम 21 साल की उम्र में कैसे दिखते थे!! इसमें दावा किया गया है कि फोटो के लिए राम के स्वरूप के इनपुट देश विदेश में उपलब्ध रामायणों, रामचरित मानस और भगवान राम पर केंद्रित पुस्तकों से लिए गए हैं। सीधी भाषा और बिना किसी लाग लपेट के कहा जाए तो सभी मसालों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मिक्सी में मिलाकर पीस दिया। हालांकि, यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ऐसे तमाम एप्लिकेशन हैं जो हमें यह बताते रहते हैं कि हम बचपन में कैसे दिखते थे या वृद्धावस्था में कैसे दिखेंगे। बस,इस बार नया यह था कि भगवान के स्वरूप के साथ छेड़छाड़ की गई।

अब बंदर के हाथ में उस्तरा की तर्ज पर सोशल मीडिया के नौसिखियों के हाथ चैट जीपीटी नाम का नया खिलौना लग गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (अलादीन) के चिराग़ से निकले इस नए जिन्न ने तूफ़ान सा ला दिया है। यह वाकई जिन्न की तरह चमत्कारी है और बस आपके आदेश देते ही जो हुक्म मेरे आका के अंदाज़ में उस आदेश पर झट से अमल कर देता है। यह काम भी यह चैट जीपीटी इतने सपाटे और सफाई से करता है कि दुनिया भर के विषेशज्ञ चमत्कृत और सहमे हुए हैं।

सबसे पहले यह जान लेते हैं कि आख़िर यह चैट जीपीटी है क्या बला? चैट जीपीटी (Chat GPT) का पूरा नाम चैट जेनरेटिव प्री ट्रेंड ट्रांसफार्मर (Chat Generative Pre-trained Transformer) है । इसके माध्यम से आप किसी भी सवाल का जवाब जान सकते हैं । यहां तक इसकी प्रक्रिया गुगल सर्च की तरह ही है लेकिन दोनों का फर्क इसके बाद दिखता है । गूगल सर्च और चैट जीपीटी के बीच में सबसे बड़ा अंतर ये है कि गूगल सर्च में हम किसी विषय को सर्च करते है और गूगल हमें उस विषय से संबंधित विभिन्न वेबसाइट पर ले जाता है जबकि चैट जीपीटी विभिन्न वेबसाइटों को खंगालकर सवालों का सीधा जवाब बनाकर देता है। इसमें वांछित उत्तर तलाशने के लिए संबंधित वेबसाइट पर जाने की जरूरत नहीं होती बल्कि पका पकाया उत्तर मिल जाता है। एक और बड़ा अंतर यह है कि चैट जीपीटी पर प्रश्नों के उत्तर भर नहीं बल्कि निबंध, स्क्रिप्ट, कवर लेटर, बायोग्राफी, छुट्टी की एप्लीकेशन,समीक्षा,शोध जैसे तमाम काम कराए जा सकते हैं । 

चैट जीपीटी की खूबियों में यह भी शामिल है कि यह अपने यूजर की सौ फीसदी संतुष्टि तक काम करता है मसलन यदि यूजर चैट जीपीटी द्वारा दी गई जानकारी से सन्तुष्ट नहीं है तो Chat GPT अपने डेटा में फिर से बदलाव कर प्रदर्शित करता है। यह लगातार तब तक अपने डेटा में परिवर्तन करता रहता है जब तक की यूजर्स जानकारी से संतुष्ट नहीं हो जाता।

इटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ चैट जीपीटी को 30 नवंबर 2022 में सैम अल्टमैन ने लांच किया था और इतने कम समय में ही इसके यूजर की संख्या कई मिलियन तक पहुंच गई है। इसके साथ एलन मस्क और बिल गेट्स जैसे दिग्गज कभी न कभी जुड़े रहे हैं। चैट जीपीटी की मातृ वेबसाइट chat.openai.com है और कंपनी ने इसे फिलहाल अंग्रेजी भाषा में लांच किया गया है लेकिन इसको लेकर आम लोगों में जिसतरह उत्साह दिख रहा है उससे साफ जाहिर है कि जल्दी ही यह उन सभी भाषाओं में उपलब्ध होगा जिनकी दुनिया भर में मांग है और क़रीब 130 करोड़ की आबादी के कारण भारत और हिंदी सहित हमारी भाषाएं इसकी पहुंच से दूर नहीं हैं। कंपनी की तरफ से भी संकेत दिए जा रहे है कि आने वाले दिनों में यह कई भाषाओं में उपलब्ध होगा।  

अब सवाल यह उठता है कि जब चैट जीपीटी इतना अच्छा है तो फिर दिक्कत कहां है और इसको लेकर विवाद क्यों है? दरअसल, दिक्कत चैट जीपीटी या इसकी चमत्कारिक कार्यप्रणाली में नहीं है बल्कि विभिन्न कंपनियों द्वारा इसके इस्तेमाल में है। अभी तक विवाद कुछ उसी अंदाज़ में सामने आ रहे हैं जैसे रोबोट की लांचिंग के समय आए थे। आपको याद होगा कि एक समय रोबोट को मानव जाति के लिए खतरा मान लिया गया था। कुछ ऐसी ही चिंता अभी चैट जीपीटी को लेकर हो रही है। कोई इसे रचनात्मक लेखन के लिए खतरा बता रहा है तो कोई शोध के लिए और कोई रोज़गार के लिए। इस चिंता के कारण भी हैं क्योंकि कथित प्रयोगधर्मी कंपनियां लेखन के बाद चैट जीपीटी के जरिए एआई बेस्ड हेल्पलाइन, वकील,सलाहकार और समाचार वाचक तक बनाने लगी हैं। इसका अर्थ यह है कि आपकी मानसिक या कानूनी समस्या का समाधान कोई मानवीय संवेदनाओं वाला व्यक्ति या विशेषज्ञ नहीं बल्कि चैट जीपीटी से तैयार डाटा करेगा। इसी प्रकार किसी समाचार चैनल पर आपको चैट जीपीटी द्वारा तैयार समाचार पढ़ती कोई मशीन दिख सकती है या भविष्य का कोई संपादक चैट जीपीटी जैसे किसी एआई से बना हो सकता है। इसमें सबसे बड़ा खतरा सूचनाओं के गलत विश्लेषण का है जो सुरक्षा से लेकर परस्पर संबंधों तक के लिए खतरनाक हो सकता है। अभी एआई आधारित तमाम ऐप प्रायोगिक परीक्षण की स्थिति में है और उनके उपयोग को लेकर सरकारों के स्तर पर कोई गाइड लाइन नहीं बनी हैं इसलिए इनके उपयोग से धोखाधड़ी का खतरा है। विदेशों में तो ऐसे ऐप द्वारा यूज़र के साथ बदतमीजी करने या गलत भाषा का इस्तेमाल करने की खबरें भी आई हैं। वहीं, कुछ लोगों ने इसे कमाई का धंधा बना लिया है। जैसे लेंस जंक नामक एक शख्स ने एक ऑनलाइन कोर्स लॉन्च किया था. ये कोर्स लोगों को चैट जीपीटी इस्तेमाल करना सिखा रहा है और वह अब करीब 28 लाख रुपए कमा चुका है।

इस सारी कवायद का लब्बो लुआब यह है कि चैट जीपीटी हो या कोई अन्य एप्लीकेशन, वह होगा तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित ही। जब उसका ज्ञान ही आर्टिफिशियल या कृत्रिम है तो वह मूल या मानवीय ज्ञान की बराबरी कैसे कर सकता है। वह उपलब्ध आंकड़ों के गुणा भाग से कोई समाधनपरक जवाब तो बना देगा लेकिन मानवीय सोच,समझ और त्वरित बौद्धिकता का मुकाबला कैसे करेगा। खुद चैट जीपीटी की मातृ कंपनी OpenAI ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि यह एप्लीकेशन कभी-कभी ऐसा उत्तर या लेखन करता है जो देखने में तो प्रशंसनीय लगता है लेकिन होता गलत या निरर्थक है।इसलिए फिलहाल चिंतित होने की नहीं बल्कि चैट जीपीटी को परखने की जरूरत है।

ढाई राज्यपाल और दो मुख्यमंत्रियों वाला अनूठा शहर…!!

ढाई राज्यपाल और दो मुख्यमंत्री…शीर्षक चौंकाता है न? वैसे, पत्रकारिता की पहली सीख  यही है कि शीर्षक चौंकाने वाला या आश्चर्य चकित करने वाला हो ताकि पाठक आपकी ख़बर पढ़ने के लिए मजबूर हो जाए लेकिन यहां शीर्षक से ज्यादा कमाल का यह शहर है जो खुद आपको अपनी कहानी सुनाने के लिए मजबूर करता है। 

अब तक मुख्यमंत्री पद पर एक से ज्यादा दावेदारियां, ढाई-ढाई के मुख्यमंत्री और कई उपमुख्यमंत्री जैसी तमाम कहानियां हम आए दिन समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते रहते हैं लेकिन कोई शहर अपने सीने पर बिना किसी विवाद के दो मुख्यमंत्रियों की कुर्सी रखे हो और उस पर तुर्रा यह कि मुख्यमंत्रियो से ज्यादा राज्यपाल हों तो उस शहर पर बात करना बनता है। 

देश का सबसे सुव्यवस्थित शहर चंडीगढ़ वैसे तो अपने आंचल में अनेक खूबियां समेटे है लेकिन दो मुख्यमंत्री और ढाई राज्यपाल की खूबी इसे देश ही क्या दुनिया भर में अतिविशिष्ट बनाती है। जैसा की हम सभी जानते हैं कि चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा की राजधानी है इसलिए यहां पंजाब के मुख्यमंत्री भी रहते हैं तो हरियाणा के मुख्यमंत्री का भी सचिवालय है। अब जब मुख्यमंत्री दो हैं तो पंजाब और हरियाणा के राज्यपालों को मिलाकर राज्यपाल भी दो ही होंगे? लेकिन लेख का शीर्षक तो 'ढाई राज्यपाल' की बात कर रहा है तो फिर सवाल उठता है कि यह आधे राज्यपाल का क्या गणित है? 

दरअसल चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा की राजधानी होने के साथ साथ केंद्रशासित प्रदेश भी है इसलिए यहां लेफ्टिनेंट गवर्नर भी होते हैं। चूंकि, अभी यह दायित्व भी पंजाब के राज्यपाल के पास है इसलिए हम उन्हें आम बोलचाल में समझने के लिए आधा राज्यपाल कह सकते हैं। वैसे, लेफ्टिनेंट गवर्नर के 'पॉवर' की बात करें तो कई मामलों में आधा राज्यपाल पूरे मुख्यमंत्री पर भारी पड़ता है और दिल्ली से बेहतर इसका ज्वलंत उदाहरण और क्या हो सकता है।

राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के कारण चंडीगढ़ का सेक्टर एक और दो वीआईपी रुतबा रखते हैं पर इतना अहम शहर होने के बाद भी यहां 'वीआईपी मूवमेंट' हमारे शहरों की तरह परेशान नहीं करता बल्कि आम लोगों की आवाजाही के बीच वीआईपी भी समन्वय के साथ 'मूव' करते रहते हैं। वैसे चंडीगढ़ का इतिहास और दो मुख्यमंत्रियों वाला शहर बनने की कहानी तो हम सब जानते ही हैं कि आजादी के बाद कैसे पंजाब का एक हिस्सा पाकिस्तान चला गया और उसकी तत्कालीन राजधानी लाहौर भी।  फिर शेष पंजाब,हरियाणा और हिमाचल को मिलाकर बने संयुक्त प्रांत की राजधानी के लिए 1953 में चंडीगढ़ बनाया गया। बताया जाता है कभी शिमला भी पंजाब की राजधानी थी। एक नवम्बर 1966 को पंजाब और हरियाणा अलग हो गए और इसके बाद, 1971 में हिमाचल प्रदेश का स्वतंत्र अस्तित्व वजूद में आ गया। हिमाचल को तो शिमला के रूप राजधानी की सौगात मिल गई परंतु हरियाणा और पंजाब का मन चंडीगढ़ पर अटक गया और महाभारत में द्रौपदी को पांच पांडवों को पत्नी का दर्जा मिला था तो चंडीगढ़ को दो राज्यों की राजधानी का गौरव। तब यही तय हुआ था कि हरियाणा के लिए अलग राजधानी मिलने तक चंडीगढ़ उसकी भी राजधानी बनी रहेगी। खास बात यह है कि छह दशक पूरे करने जा रहे इस शहर ने द्रौपदी की तरह कभी अपने आत्मसम्मान को खंडित नहीं होने दिया और अपने गौरव को हमेशा सर्वोपरि रखा है। शायद, इस शहर की खूबसूरती, व्यवस्थापन, पर्यावरण देखकर ही केंद्र सरकार का भी इस पर मन आया होगा और 1966 में उसने अपना एक प्रतिनिधि यहां बिठा दिया और इस तरह देश के खूबसूरत शहरों में से एक चंडीगढ़ दो मुख्यमंत्रियों और ढाई राज्यपालों का अनूठा शहर बन गया।

#Chandigarh #CityOfBeauty  #Rock Garden 

कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...