गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

कहां कण कण में बिखरा है धर्म, कर्म और मोक्ष का ज्ञान..!!

यह कुरुक्षेत्र है.. पावन गीता के जन्म की पुण्य पावन भूमि..जहां सदियों पहले इस महाग्रंथ का प्रादुर्भाव हुआ जो आज भी दुनिया भर के लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। कुरुक्षेत्र भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म और दर्शन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह हरियाणा राज्य में स्थित वह पवित्र स्थल है जिसे भारतीय संस्कृति में धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे के नाम से जाना जाता है।

हमें भी इस पुण्य भूमि का स्पर्श करने और यहां कण कण में व्याप्त भगवान श्रीकृष्ण की कृपा को महसूस करने का अवसर मिला। इस दौरान गीता जयंती जैसा विशेष अवसर भी था। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 1 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी के दिन मनाया गया। माना जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। गीता में स्वयं कहा गया है- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः’ अर्थात यहाँ धर्म की स्थापना के लिए महान युद्ध हुआ। यह महान ग्रंथ कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और जीवन के हर पहलू पर गहन मार्गदर्शन देता है इसलिए कुरुक्षेत्र को गीतोपदेश स्थली भी कहा जाता है।

कुरुक्षेत्र में हर साल गीता जयंती पर लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन भी होता है। इसकी औपचारिक शुरुआत 2016 में हुई थी और प्रति वर्ष इस महोत्सव का फलक लगातार व्यापक होता जा रहा है। इस साल यह महोत्सव 25 नवंबर से 5 दिसंबर तक पवित्र ब्रह्म सरोवर परिसर में मनाया जा रहा है। ब्रह्म सरोवर के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी ने यही ब्रह्माण्ड की रचना की थी। सूर्यग्रहण के समय यहां स्नान-दान का विशेष महात्म्य है। पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए भी ब्रह्म सरोवर अत्यंत पवित्र माना जाता है।

हम मध्यप्रदेश के लोगों के लिए इस साल अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का खासतौर पर महत्व है क्योंकि मध्य प्रदेश अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव 2025 का भागीदार राज्य है और यहां हमारे प्रदेश के हस्तशिल्प, कला, कलाकारों, लोक संस्कृति और खानपान की धूम है। वहीं, इंग्लैंड को साझीदार देश घोषित किया गया।

मान्यता के अनुसार कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर नामक स्थान पर इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में वर्णित कौरव-पांडव युद्ध के दौरान युद्ध मैदान में विराट स्वरूप के दर्शन देते हुए अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। इसका मतलब यह हुआ कि इसी दिन अत्यंत पवित्र, पूजनीय और अनुकरणीय माने जाने वाले ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का जन्म हुआ था। कुरुक्षेत्र की इसी भूमि पर एक विशाल वट वृक्ष भी है जिसकी आयु करीब 5 हजार 126 साल बताई जाती है। इसके नीचे प्रतीकात्मक रूप में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का रथ खड़ा हुआ है। यहीं भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को भी दर्शाया गया है।

बताया जाता है कि अपनी हिमालय यात्रा के समय आदि गुरु शंकराचार्य ने सर्वप्रथम इस स्थान को चिन्हित किया था। सन् 1850 में महाराजा काश्मीर द्वारा यहाँ पर एक शिव मन्दिर की स्थापना की गई थी। इसके पश्चात् सन 1924 में महाराजा दरभंगा ने यहाँ पर गीता उपदेश के साक्षी वट वृक्ष के चारों ओर एक चबूतरे का निर्माण करवाया था। तीर्थ के इसी महत्व को दृष्टिगत रखते हुए सन् 1967 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य द्वारा मुख्य चबूतरे के साथ गीता उपदेश स्थल का निर्माण कराया गया ।

कुरुक्षेत्र के महत्व को अंतरराष्ट्रीय पटल पर और व्यापक बनाने के लिए यहां भगवान श्रीकृष्ण के शंख पाञ्चजन्य से प्रेरित ‘पाञ्चजन्य स्मारक’ की स्थापना भी गई है। इसके अलावा, ‘महाभारत अनुभव केंद्र’ भी बनाया गया है। इस अनुभव केंद्र में महाभारत की गाथा को 3 डी, लाइट एंड साउंड शो और डिजीटल तकनीकी से दिखाया जा रहा है। हम कह सकते हैं कि नई तकनीक की मदद से करीब 3 घंटे के समय और 200 रुपए का मामूली शुल्क देकर हजारों साल पहले हुए 18 दिन लंबे युद्ध को मौजूदा दौर में महसूस किया जा सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 नवंबर को इन नई सुविधाओं का शुभारंभ किया है। 

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का प्रतीक है जहाँ धर्म, कर्म, ज्ञान और मोक्ष की शिक्षा दी गई। इसलिए कुरुक्षेत्र को भारत का हृदयस्थल और देवभूमि भी कहा जाता है।

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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

एक अनूठा मंदिर…जहां प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े!!

जी हां, वाकई मंदिर में प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े और वे भी सफेद घोड़े, लाल घोड़े, पीले, काले, नारंगी, हरे घोड़े..बस घोड़े ही घोड़े। आप देखकर अचरज में पड़ जाएंगे क्योंकि मंदिर में तो नारियल- चिरौंजी या लड्डू-पेड़े चढ़ते हैं तो फिर इतने घोड़ों का क्या काम। दरअसल समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यहां प्रसाद के रूप में घोड़े अर्पित किए जाते हैं। 

अरे रुको जरा…आपकी बड़ी होती आंखों को थोड़ा छोटा कर लीजिए और कंफ्यूज मत होइए। हम बात कर रहे हैं खिलौने वाले घोड़ों की, न की असल की..आखिर, कितना भी बड़ा मंदिर हो वहां सैकड़ों घोड़े कैसे बन पाएंगे? लेकिन असलियत यही है कि कहानी असल घोड़ों से ही शुरू हुई थी..जो बदलते वक्त के साथ जरूर खिलौने वाले घोड़ों में तब्दील हो गई है। 


तो पहले जानते हैं असल घोड़ों की कहानी…महाभारत का युद्ध शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे। कौरवों की विशाल सेना और तैयारियों को देखकर पांडवों का मन भय से भरा था और वे कुछ विचलित नज़र आ रहे थे। यह बात युद्ध भूमि में गीता उपदेश के भी पहले की है। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के मन को पढ़कर मुस्कुराते हुए बोले- “जाओ, पहले माँ भद्रकाली के दर्शन कर आओ और हां, वहां घोड़ा चढ़ाना मत भूलना क्योंकि जिसने यहाँ घोड़ा चढ़ाया, वह कभी पराजित नहीं हुआ है।” पांडव भला भगवान कृष्ण का कहना कैसे टाल सकते थे इसलिए पाँचों भाई कुरुक्षेत्र से सटे थानेसर की पिहोवा रोड पर स्थित उस पवित्र भूमि पर पहुँचे जहाँ आज भी माँ भद्रकाली का मंदिर पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ मौजूद है। मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक भद्रकाली पीठ में पांडवों ने पांच घोड़े अर्पित किए और महाभारत युद्ध का नतीजा तो सब जानते हैं कि पांडवों की ही विजय हुई। कहा जाता है कि तभी से यहां मां भद्रकाली को मनोकामना पूरी होने पर घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।


जहां तक मंदिर की स्थापना से जुड़े इतिहास की बात है तो हम सभी जानते हैं कि शिवजी के अपमान से सती हुई मां भगवती से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक जब शिवजी माँ सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका क्रोध शांत करने और ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए सुदर्शन चक्र से सती की पार्थिव देह के 51 टुकड़े कर दिए थे। जिस जिस स्थान पर माता सती के अंग गिरे, वे सभी स्थान पवित्र शक्तिपीठ कहलाते हैं। हरियाणा का यह इकलौता शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र में स्थित है। माना जाता है कि यहां माँ का दाहिना टखना (ankle) गिरा था। इसे देवीकूप, सावित्रीपीठ, देवीपीठ, कालीपीठ और आदिपीठ जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।


आमतौर पर शक्तिपीठ पहाड़ों और दुर्गम स्थानों पर हैं लेकिन यह ऐसा मंदिर है जो समतल स्थान पर है और आप सीधे मंदिर की पार्किंग तक आसानी से पहुंच जाते हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही सन्नाटा, घंटियों की मधुर ध्वनि और सुगंध एक साथ महसूस होते हैं। गर्भगृह में माँ भद्रकाली की काले पत्थर की प्राचीन अष्ट भुजा वाली प्रतिमा है जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो मां अभी बोल पड़ेंगी। उनके सामने विशाल कमल की प्रतिकृति और राम सीता, राधा कृष्ण सहित विभिन्न प्रतिमाएं हैं।

 भद्रकाली मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यहां मौजूद सैकड़ों घोड़े और मन्नत के धागों से बना विशाल नारियल है। जो बरबस ही श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। घोड़ों का तो यह हाल है कि आप जहां दृष्टि दौड़ाएं आपको घोड़े ही नज़र आते हैं..मिट्टी,चीनी मिट्टी और अन्य सामग्री से बने छोटे छोटे रंग बिरंगे आकर्षक घोड़े। वैसे यहां सोने और चांदी के घोड़े भी बड़ी संख्या में अर्पित किए जाते हैं। इसका कारण वही पांडव कालीन मान्यता है कि यदि आपकी कोई मन्नत है या पूरी हुई है तो मां भद्रकाली को घोड़े अर्पित करें जिससे वे प्रसन्न होती हैं और आपकी तमाम मनोकामनाएं पूरी करती हैं। 

इसी तरह मन्नत का लाल-पीला धागा बांधने की प्रथा भी है। मन्नत पूरी हुई नहीं कि लोग दौड़े चले आते हैं – कोई घोड़ा चढ़ाने, कोई नारियल फोड़ने और कोई धागा खोलने। आज भी यहां परीक्षा में पास करने, संतान प्राप्त,व्यापार में लाभ और परिवार रक्षा जैसी मुरादों को लेकर बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।

भद्रकाली मंदिर तक पहुंचना बहुत आसान है। कुरुक्षेत्र दिल्ली से सिर्फ 160 किमी और चंडीगढ़ से करीब 100 किमी दूर है। यहां आप अपने वाहन से आ सकते हैं। वैसे कुरुक्षेत्र दिल्ली चंडीगढ़ रेलमार्ग से सीधे जुड़ा है और कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से मंदिर महज 3 किमी दूर है। यदि आप हवाएं मार्ग से आना चाहते हैं तो चंडीगढ़ या दिल्ली कहीं भी उतर कर टैक्सी से कुछ घंटे में यहां पहुंच सकते हैं। इसलिए जब भी कुरुक्षेत्र जाएँ, ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसर, बाण गंगा जैसे महाभारत कालीन स्थलों के साथ यहाँ जरूर आएँ।


शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

देश में इकलौता और दुनिया में सबसे अलग..क्या है ये !!


लकड़ी और पत्थर से बनी इस इमारत में कुछ तो खास बात है कि दुनिया भर से लोग इसे पैसे देकर देखने आते हैं। यहां भारतीय लोग 100 रुपए देकर और विदेशी 200 रुपए देकर अन्दर से देख सकते हैं। अचरज की बात यह है कि यह इमारत आगरा के ताजमहल या अयोध्या के राम मंदिर जैसा स्थान भी नहीं है कि दुनिया में और कहीं न हो। दुनिया भर के कई देशों में अपने हम नाम और समान आर्किटेक्चर  शैली के भाई बंधुओं के बाद भी इसका आकर्षण बरकरार है। शायद इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इसके समकालीन साथी समय के साथ दम तोड़ चुके हैं और दूसरा कारण यह भी है कि विदेशी पर्यटक और खासकर ब्रिटेन के लोग इसे अपनी विरासत से जोड़कर देखते हैं। 

हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के मशहूर गैटी/गेयटी थिएटर (Gaiety Theatre)  की । जिसे अब गेयटी हेरिटेज कल्चरल कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है।

जैसा कि हम जानते हैं कि अंग्रेजों ने लंबे समय तक शिमला का इस्तेमाल अपनी सत्ता के शीर्ष केंद्र की तरह किया है और इसीलिए अपने मनोरंजन के कई ठिकाने भी यहां बनाए। इनमें से मॉल रोड अंग्रेजों की शिमला को सबसे खूबसूरत देन है और इसी मॉल रोड पर स्थित है ब्रिटिश हुकूमत का एक तौर नायाब तोहफा-गेयटी थियेटर । 

30 मई 1887 से देशी विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र यह थियेटर आज भी उसी शान-ए-शौकत के साथ लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है। शिमला में रिज पर स्थित चर्च के बाद गेयटी थियेटर लोकप्रियता में संभवतः दूसरे स्थान पर है। अंग्रेज साहबों और मेम साहब के आमोद प्रमोद का पूरा ध्यान रखते हुए इसका डिजाइन गॉथिक व विक्टोरियन शैली के जानकार अंग्रेज आर्किटेक्ट हेनरी इरविन ने तैयार किया था। वैसे भी, उस दौर में अंग्रेज अफसरों और उनके परिवारों के अलावा किसी और का मॉल रोड पर आना प्रतिबंधित था।

बताया जाता है शिमला की शान यह गैटी या गेयटी थियेटर मूल रूप से पांच-मंज़िला इमारत थी, जिसमें थिएटर के साथ-साथ बैले रूम, शस्त्र भंडार, पुलिस कार्यालय, बार और गैलरी थीं। इसके निर्माण के लगभग दो दशकों बाद 1911 में इमारत की ऊपरी मंज़िलों को खतरनाक संरचनात्मक स्थिति के कारण गिरा दिया गया । फिर 2003 में करीब साढ़े 11 करोड़ रुपये की लागत से इसकी मरम्मत का काम शुरू हुआ और छह साल बाद 2009 में यह मौजूदा वैभव के साथ लौटा। इस मरम्मत की खासियत यह थी कि इसमें तमाम आधुनिकीकरण के बाद भी यहां के पुरानी शैली के परदे,परदे खोलने बंद करने की पारंपरिक व्यवस्था (रस्सी, पुली) जैसी कई वास्तुशिल्पीय एवं पुरातात्विक विशेषताओं से छेड़छाड़ नहीं की गई।

गॉथिक शैली में बनाई गई यह इमारत पत्थर और लकड़ी की पारंपरिक डिजाइन से सुसज्जित है। दरअसल, गॉथिक शैली 18वीं से 19वीं सदी में विकसित एक वास्तुशिल्प शैली है। इसकी मुख्य विशेषताओं में नुकीले मेहराब, ऊँची छतें,आर्च जैसी खूबियां शामिल हैं। यह शैली इमारतों में भव्यता के साथ साथ ऐतिहासिकता का बोध भी कराती है और खासतौर पर चर्चों, विश्वविद्यालयों एवं सरकारी भवनों के निर्माण में लोकप्रिय थी। ब्रिटेन का हाउस ऑफ पार्लियामेंट तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का सेंट पैट्रिक कैथेड्रल इस शैली के लोकप्रिय उदाहरण हैं । 

शिमला में स्थित गेयटी थिएटर करीब 300 लोगों के बैठने की क्षमता रखता है। इसके पास एक ओपन-एयर एम्फीथिएटर भी है। थिएटर में आधुनिक स्टेज लाइटिंग और साउंड सिस्टम सहित तमाम सुविधाएं हैं। गेयटी थियेटर को हम मौजूदा समय में दिल्ली के मंडी हाउस और भोपाल के भारत भवन की तरह शिमला का सांस्कृतिक केंद्र कह सकते हैं क्योंकि यहां भी नाटकों, संगीत कार्यक्रमों, लोक व शास्त्रीय नृत्य, कवि सम्मेलनों और व्याख्यान जैसे विभिन्न कार्यक्रम होते रहते हैं। इसलिए इसे गेयटी विरासत सांस्कृतिक परिसर भी कहा जाता है।

शिमला का गेयटी थिएटर इस मामले में किस्मत का धनी है कि दुनिया भर के नामचीन लोग यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं जिनमें रुडयार्ड किपलिंग, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, अनुपम खेर एवं नसीरुद्दीन शाह जैसे कई बड़े नाम शामिल है। बताया जाता है मौजूदा दौर के लोकप्रिय गायक अरिजीत सिंह का एक लोकप्रिय गाना 'पछताओगे.. ' भी यहीं फिल्माया गया है। कहने का आशय यह है कि इस थियेटर ने पृथ्वीराज कपूर से लेकर अरिजीत सिंह तक को अपने मोहपाश में बांध रखा है।

जब हम गूगल गुरू एवं इनकी नई पीढ़ी के एआई साथियों की मदद से गेयटी थियेटर का इतिहास खंगालने की कोशिश करते हैं तो अलग अलग तथ्य सामने आते हैं। मसलन कुछ स्रोतों में कहा गया है कि दुनिया में इसतरह के केवल छह थियेटर हैं लेकिन इस नाम से मिलती जुलती कुछ अन्य संस्थाएँ भी हैं।

यदि हम शिमला की तरह दुनिया में अन्य स्थानों पर निर्मित एवं लोकप्रिय गेयटी थियेटर की बात करें तो आयरलैंड के डबलिन में स्थित गेयटी थिएटर शिमला से कुछ साल पहले 27 नवम्बर 1871 को शुरू हुआ था। विक्टोरिया शैली में बना यह थियेटर अभी भी चालू है। ब्रिटेन के डगलस में भी गेयटी थिएटर सह ओपेरा हाउस है। विक्टोरियन के साथ साथ फ्रेंच शैली में बना यह थियेटर शिमला के गेयटी थियेटर के एक दशक बाद 1899 में शुरू हुआ था और यह आज भी अपना जलवा बिखेर रहा है।ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में भी एक गेयटी थियेटर है जो 9 अक्टूबर 1898 को प्रारम्भ हुआ था। यह 19वीं सदी के ऑस्ट्रेलियाई हिस्टोरिक थिएटर भवन शैली में बना है और 2006 में पुनर्निर्माण के बाद से सिनेमा और लाइव-इंटरटेनमेंट का प्रमुख केंद्र है।

लेकिन कुछ गेयटी थियेटर ऐसे भी हैं जो प्राकृतिक आपदाओं और रखरखाव के अभाव में समय के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गए जैसे जापान के याकोहामा में स्थित पश्चिमी-शैली का वुडन स्टेज शैली वाला गेयटी थिएटर 1908 में शुरू हुआ था लेकिन  1923 में आए विनाशकारी भूकंप में पूरी तरह नष्ट हो गया और इसे फिर से बनाने का कोई प्रयास भी नहीं हुआ। लंदन में 1864-68 के दरम्यान शुरू हुआ विक्टोरियन शैली का गेयटी थियेटर भी वक्त के झंझावतों के साथ खुलता बंद होता रहा और अंततः 1956 में अपना मूल स्वरूप गंवा बैठा। कुछ यही हाल इंग्लैंड के मैनचेस्टर में 1884 में शुरू हुए और स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 1899 में बने गेयटी थियेटर का हुआ। ये थियेटर भी वक्त की मार बर्दाश्त नहीं कर पाए और समय के साथ अपना अस्तित्व खो बैठे।

वैसे, गेयटी थियेटर के नामकरण की कहानी भी हमारी जीवनशैली से जुड़ी है। Gaiety का अर्थ होता है- उल्लास, खुशी, प्रसन्नता, या मौज-मस्ती। मतलब गेयटी थियेटर एक ऐसा स्थान है जिसका उपयोग किसी उत्सव और आनंद के लिए किया जाता है। ब्रिटिश हुकूमत के समय से लेकर आज तक यह थियेटर अपनी इस पहचान को क़ायम रखे हुए है। शायद, यही कारण है कि शिमला सहित दुनिया में कम संख्या में शेष बचे गेयटी परिवार के सदस्य आज भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब हैं।

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सोमवार, 17 नवंबर 2025

आइए, चले…देश के आखिरी गांव !!

 


वैसे तो, पूरा हिमाचल प्रदेश ही रोमांच और प्रकृति के अबूझ रहस्यों से भरपूर है लेकिन यहां भी कुछ इलाके ऐसे हैं जहां सड़क मार्ग से गुजरकर आप देश की सबसे रोमांचक यात्राओं में से एक का आनंद ले सकते हैं। तो चलिए, हम चलते हैं हिमाचल में स्थित और भारत चीन सीमा के पास देश के सबसे आखिरी गांव की यात्रा पर।

करीब साढ़े 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित छितकुल की यात्रा एक रोमांचक तीर्थयात्रा की तरह है। यहां आकर हमारी सड़क यात्रा भी खत्म हो जाती है और हमारा धैर्य भी, फिर हमसे रूबरू होती हैं बर्फ़ की सफेद चादर ओढ़े हिमालय की गर्वीली चोटियां। छितकुल को भारत तिब्बत सीमा पर देश का आखिरी गांव कहा जाता है। यदि सकारात्मक अंदाज़ में कहें तो यह इस इलाके में देश का पहला गांव है क्योंकि इसके जरिए ही हम देश के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। यहाँ की हवा इतनी शुद्ध है कि इसे भारत की सबसे स्वच्छ हवा माना जाता है तो जाहिर है आपको हर सांस में ताजगी का अहसास भी होता है और आप इस शुद्धता को फेफड़ों में सहेजकर अवश्य ले जाना चाहेंगे।


हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में सतलुज और बस्पा नदियों के संगम के पास बसा भारत का आखिरी/पहला गाँव छितकुल एक ऐसी जगह है जहाँ प्रकृति पूरी शिद्दत से नजर आती है और रोमांच हर कदम पर आपका इंतजार करता है। छितकुल न केवल एक भौगोलिक आश्चर्य है, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक वैभव का संगम भी है। यहाँ की ताज़गी से भरी हवा, बर्फीली चोटियाँ और किन्नौरी संस्कृति का अनूठा मिश्रण इसे एक ऐसी जगह बनाता है, जो हर यात्री के दिल में बस जाती है। 


छितकुल तक का सफ़र भी खट्टे मीठे अनुभवों से भरपूर है। हमें लगातार पहाड़ पर सर्पीली और पतली घुमावदार सड़कों से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसी सड़कें, जहां आगे हमें भी नहीं पता चलता कि कितना और कैसा मोड़ हमारे सामने आ सकता है, कहां पहाड़ झुककर हमारी गाड़ी का माथा चूमना चाहता है, कब सड़क पगडंडी बन सकती है और कब आप पहाड़ के सीने को चीरते हुए निकल जाते हैं। रास्ते में कई जगह पहाड़ों की चोटी से निकलते छोटे बड़े झरने आपको भिगो सकते हैं और सड़क पर जमा विशाल चट्टानें और बड़े पत्थर बारिश में आमतौर पर यहां होने वाले भूस्खलन (लैंडस्लाइड) का डरावना अहसास भी कराते हैं। इसी तरह, नाथपा झाकड़ी और करछम-वांगटू जैसी बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं, गर्म पानी के सोते और गंगारंग जैसे पवित्र स्थान भी आपको रुक कर प्राकृतिक सौंदर्य निहारने का अवसर देते हैं। वैसे, अब सरकार ने सड़कों का इतना मजबूत जाल बिछाया है कि यह सफर मजेदार बन गया है।


अब बात छितकुल की, तो यहां की सुंदरता ऐसी है, मानो प्रकृति ने इसे अपने हाथों से सजाया हो। रास्ते में सड़क के दोनों ओर सेब के बगीचे आपका इठलाकर स्वागत करते हैं…और यदि आप ‘एप्पल सीजन’ में यहां आए हैं तो सुर्ख लाल, कत्थई,  हरे, पीले और सुनहरे रंग में रंगे सेब से लदे हुए पेड़ झुककर आपका इस्तकबाल करते हैं। पेड़ से टूटते और पेटियों में सजते सेब देखना और ‘ऑन द स्पॉट’ ताजे रसीले सेब खाने का अनुभव विलक्षण है। वहीं, सुबह की पहली किरण के साथ बर्फीली चोटियाँ के बीच किन्नर कैलाश की सुनहरी चमक अलग ही आभा बिखेरती है। सर्दियों में बर्फ का कंबल ओढ़े यह गाँव एक शांत स्वप्नलोक-सा प्रतीत होता है जबकि गर्मियों में रंग-बिरंगे जंगली फूलों के बगीचे सा। खासतौर पर गुलाबी रोडोडेंड्रोन और पीले प्राइमरोज़ की छटा देखते ही बनती है। 

साहसिक यात्राओं, ट्रेकिंग और कैंपिंग के शौकीन लोगों के लिए तो यह स्वर्ग है। छितकुल में कैंपिंग का एक अलग ही अनुभव है। रात में तारों भरा आकाश और चारों ओर हिमालय की चोटियों की पहरेदारी के बीच स्वच्छ हवा,नदी की कलकल आवाज  और आध्यात्मिक शांति से भरपूर वातावरण इसे दुर्लभ पहचान प्रदान करता है। 

छितकुल केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है बल्कि यह किन्नौरी संस्कृति का जीवंत चित्र है। यहाँ तिब्बती प्रभाव को दर्शाते लकड़ी के घर, नक्काशी और छतें इस गाँव को एक प्राचीन आकर्षण देती हैं। स्थानीय व्यंजन, जैसे सोग, थुकपा स्वाद और संस्कृति का अनूठा संगम हैं। यहां आप देश के आखिरी पोस्ट ऑफिस और देश के अंतिम ढाबे से भी रूबरू होते हैं। इनसे भले ही ब्रांडिंग नजर आती हो लेकिन पर्यटकों के लिए यह वाकई अनूठा अनुभव होता है। 

छितकुल तक पहुँचने के लिए आपको शिमला से रिकॉन्गपिओ तक करीब 200 से 250 किमी सड़क मार्ग से आना पड़ेगा और फिर सांगला वैली होते हुए छितकुल तक की 40 से 50 किमी की सबसे रोमांचक सड़क यात्रा करनी पड़ेगी । आप चाहे तो रास्ते में ठियोग, रामपुर, सराहन, करछम, सांगला घाटी और कल्पा में रुककर खुद को रिचार्ज भी कर सकते हैं। यहां घूमने के लिए मई से अक्टूबर तक का समय सबसे उपयुक्त रहता है क्योंकि ठंड में सामान्य रूप से बर्फबारी के कारण रास्ते खुलते/बंद होते रहते हैं । 

कुल मिलाकर छितकुल कोई साधारण गंतव्य नहीं बल्कि एक असाधारण अनुभव है। जहाँ प्रकृति की विशालता और मानव की सादगी एक-दूसरे से गले मिलते हैं। यहाँ की शांति, रोमांच और सांस्कृतिक छाप आपको सीधे प्रकृति से जोड़ती है। चाहे आप ट्रेकर हों, फोटोग्राफर,पर्यटक या शांति की तलाश में निकले एक यात्री, छितकुल आपको निराश नहीं करेगा । 

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रविवार, 2 नवंबर 2025

राष्ट्रपति निवास,नाटी किंग और लज़ीज़ धाम

175 साल का सफर पूरा कर रहे मशोबरा के राष्ट्रपति निवास की पृष्ठभूमि, पहाड़ों पर बहती ठंडी हवा, देवदार के घने जंगलों से गुजरकर आती भीनी भीनी खुशबू, लोकधुनों की मिठास और हिमाचल के पारंपरिक धाम की लज़ीज़ महक और इन सबके साथ नाटी किंग कुलदीप शर्मा और उनकी दिलकश आवाज पर झूमते लोग…किसी भी दिन का इससे बेहतर आगाज और क्या हो सकता है।

तकरीबन चार घंटे का वक्त किसी मनपसंद फिल्म की तरह कब गुजर गया,पता ही नहीं चला। जब चलने की बारी आई तो मन ने कहा कुछ देर और ठहर जाएं लेकिन जिम्मेदारी ने कहा और ठहरे तो फिर काम का क्या होगा क्योंकि जो देखा है उसे ख़बर बनाकर मीडिया के साथियों को भी तो भेजना है। तभी तो, हिमाचल के लोगों को पता चल पाएगा कि राज्य में सांस्कृतिक मोर्चे पर कितना कुछ हो रहा है।

दरअसल, राष्ट्रपति निवास, शिमला में शनिवार एक नवंबर को सालाना शरद उत्सव का आयोजन किया गया था। यह तारीख हमारे लिए तो वैसे भी खास है क्योंकि यह हमारे राज्य मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस है और यदि आज हिमाचल प्रदेश में नहीं होते तो पक्का भोपाल में किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा होते। शायद, मन को पढ़कर यह अवसर खुद चलकर हमारे पास आया क्योंकि रितेश भाई ने आमंत्रण भेजकर आने का आग्रह किया तो प्रकाश भाई ने समय पर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाने का दायित्व उठाया। राष्ट्रपति निवास में मैनेजर संजू डोगरा जी और अजय भारद्वाज जी की गर्मजोशी ने यहां आना सार्थक बना दिया।

वैसे तो,शरद उत्सव में स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन का बोलबाला था लेकिन उनकी युवा ऊर्जा, उत्साह, सांस्कृतिक परिपक्वता और प्रदर्शन इतना दमदार था कि दर्शक उनकी ताल पर ही झूमने लगे। देशप्रेम के गीत से शुरू हुआ यह सिलसिला जब हिमाचल की लोकप्रिय नाटी तक पहुंचा तो संगीत की गरमाहट में ठंड पता नहीं कहां छूमंतर हो गई। फिर तो बस नाटी ही चली..पहले विद्यार्थियों की और उसके बाद नाटी किंग कुलदीप शर्मा ने जब तान छेड़ी तो फिर किसी के लिए भी रुक पाना मुश्किल था। 

अब तक स्टेज के सामने कुर्सियों पर जमे लोग एक एक कर स्टेज के सामने आ गए और फिर क्या था..नाटी,नाटी और बस नाटी..स्टेज पर भी एवं स्टेज के चारों ओर भी। वाकई, कुलदीप शर्मा को इसलिए नाटी किंग कहा जाता है क्योंकि वे ऑडियंस से तुरंत कनेक्ट कर लेते हैं तथा सबसे अहम बात..उन्होंने युवाओं से कहा कि नशे से दूर रहो क्योंकि मैं नशे के कारण अपना जीवन तबाह कर चुका था। सही समय पर नहीं संभला होता तो आज शायद होता भी नहीं। 

आखिर में, लज़ीज़ भोज का उल्लेख करे बिना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता। पारंपरिक हिमाचली धाम में सेपू बड़ी, कढ़ी, सरसों के तड़के के साथ काली दाल, बदाने का मीठा और पता नहीं क्या क्या।

बाकी हिमाचल से बाहर के लोगों के लिए नाटी का अर्थ है नृत्य/लोक नृत्य और कुलदीप शर्मा इस कला के सम्राट हैं। उनका नाम आज हिमाचल की नाटी और लोकसंगीत का सबसे बड़ा परिचय है। उनकी आवाज़ में पहाड़ों की मिट्टी की खुशबू, देवभूमि का संस्कार और लोकधुनों की आत्मा बसती है। वे सिर्फ गायक नहीं, बल्कि हिमाचली लोकसंस्कृति के गर्व और पहचान बन चुके हैं। नाटी को देश-विदेश तक पहुँचाने में उनकी भूमिका अद्भुत है। महज बारहवीं तक पढ़े (उनके शब्दों में तीन बार फेल) कुलदीप को हाल ही में लंदन में वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा ‘इंटरनेशनल एक्सलेंस अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। अब तक सैकड़ों सम्मान हासिल कर चुके कुलदीप एक सशक्त उदाहरण हैं कि मामूली शिक्षा के बाद भी यदि जज़्बा हो तो कैसे लोक संस्कृति की महक राज्य से होते हुए देश और दुनिया में खुशबू बिखेर सकती है।

जहां तक राष्ट्रपति निवास की बात है तो यह शिमला से करीब 13 किलोमीटर दूर मशोबरा नाम की जगह में स्थित है। इसे राष्ट्रपति का समर रिट्रीट भी कहा जाता है। यह जगह ऊँचे पहाड़ों, घने देवदार-चीड़ के जंगलों और ठंडी हवा के बीच बनी है। यहाँ की शांति और ताज़गी भरी हवा इसे बहुत खास बनाती है।

क़रीब 7 हजार फीट की ऊंचाई पर बना यह भवन ब्रिटिश शासन के समय, लगभग 1850 के आसपास बनाया गया था। उस समय इसे गर्मियों में आराम करने और काम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आज़ादी के बाद वर्ष 1965 में इस भवन को भारत के राष्ट्रपति का गर्मियों में रहने वाला आधिकारिक निवास घोषित कर दिया गया। अब भी गर्मियों में राष्ट्रपति कुछ दिन यहाँ बिताते हैं और उस समय राष्ट्रपति कार्यालय का एक हिस्सा भी यहीं से काम करता है।

राष्ट्रपति निवास की इमारत लकड़ी और पत्थरों से बनी हुई है। इसे खास पहाड़ी तरीके से बनाया गया है ताकि भूकंप से सुरक्षा मिल सके। घर के चारों तरफ हरे-भरे लॉन, फूलों के बगीचे और सेब के पेड़ हैं। यहाँ से दिखाई देने वाले पहाड़ों और आसमान का नज़ारा बेहद सुंदर लगता है। अब यह स्थान आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया  है, लेकिन इसके लिए पहले ऑनलाइन या ऑफिस से बुकिंग करनी होती है। यहाँ आने वाले लोग इतिहास, प्रकृति और शांति का सुंदर अनुभव लेते हैं। शिमला घूमने वाले पर्यटकों के लिए राष्ट्रपति निवास एक ऐसा स्थान है जहाँ वे प्रकृति की गोद में बैठकर इतिहास को महसूस कर सकते हैं। यह जगह सच में शांति, सौंदर्य और सम्मान का संगम है।



शनिवार, 1 नवंबर 2025

नए राज्य: विकास, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ

बहु भाषा बोली, विविध संस्कृति, खानपान, क्षेत्रीय ढांचा, विशाल क्षेत्रफल से परिपूर्ण हमारा देश अपनी प्रशासनिक और क्षेत्रीय जटिलताओं के कारण हमेशा से ही दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही देश में नए राज्यों के गठन की मांग उठती रही है और तत्कालीन सरकारों ने समय समय पर क्षेत्रीय, भाषाई और विकास की जरूरत के आधार पर इन मांगों को पूरा भी किया है।  

 यदि हाल के वर्षों की बात करें तो वर्ष 2000 में एक साथ तीन राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के गठन ने भारत के संघीय ढांचे में एक नया अध्याय जोड़ दिया था। ये तीनों राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुके हैं और इस अवधि में इन्होंने विकास, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। 

हालांकि, नए राज्यों के गठन के साथ देश में प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि, संसाधनों के बंटवारे की चुनौतियाँ और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं लेकिन इन राज्यों की विकास यात्रा ने कई नए राज्यों की उम्मीदों को भी जन्म दिया है। भविष्य में नए राज्यों के गठन के फायदे और नुकसान पर बात करने से पहले हम छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड की 25 वर्षों की यात्रा पर संक्षेप में नजर डालना जरूरी है ।

 जैसा कि हम सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ का गठन वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से एक हिस्से को अलग करके किया गया था। यह राज्य प्राकृतिक संपदा और आदिवासी संस्कृति का अनमोल खजाना है। इन 25 वर्षों में राज्य ने औद्योगिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की। खनिज संसाधनों से समृद्ध छत्तीसगढ़ ने इस्पात, सीमेंट और ऊर्जा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। रायपुर और भिलाई जैसे शहर औद्योगिक विकास के केंद्र बने, जबकि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत ने पर्यटन को बढ़ावा दिया।राज्य सरकार ने ग्रामीण विकास और आदिवासी कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। 

'नरवा, गरवा, घुरवा, बारी' जैसी योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त किया, वहीं जैविक खेती और हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदायों को रोजगार मिला। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सुधार हुआ, जिससे साक्षरता दर और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुईं।हालांकि, नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती रहा, जिसने कई क्षेत्रों में विकास को प्रभावित किया। बुनियादी ढाँचे की कमी और ग्रामीण-शहरी असमानता भी प्रगति में बाधक रही। पर्यावरण संरक्षण और खनन के बीच संतुलन बनाना भी एक जटिल मुद्दा है।

इन चुनौतियों के बावजूद, छत्तीसगढ़ ने अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा का उपयोग कर विकास की राह पर कदम बढ़ाए। अब नक्सलवाद पर मजबूत नियंत्रण, सतत विकास और समावेशी नीतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ भारत के विकसित राज्यों में शुमार हो रहा है। हिमालय की गोद में बसा एक खूबसूरत सा राज्य उत्तराखंड भी वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आया था। इन 25 वर्षों में उत्तराखंड ने विकास, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देहरादून, राज्य की राजधानी, एक प्रमुख शैक्षिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरी, जबकि हरिद्वार और ऋषिकेश आध्यात्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुए।

 चारधाम यात्रा ने न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दी। राज्य ने ऊर्जा क्षेत्र में विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से भी कदम बढ़ाए हैं। टिहरी बांध इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, आयुष और जैविक खेती को बढ़ावा देकर उत्तराखंड ने नवाचार की दिशा में प्रगति की। शिक्षा के क्षेत्र में, आईआईटी रुड़की और अन्य संस्थानों ने राज्य को तकनीकी शिक्षा का केंद्र बनाया है। हालांकि, प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूस्खलन और बाढ़ ने विकास में जरूर कुछ बाधाएँ डालीं। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और पलायन भी चिंता का विषय है। 

फिर भी, उत्तराखंड ने अपनी सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और विकास की संभावनाओं के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है।   वनांचल के नाम से मशहूर झारखंड 15 नवंबर 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था और इसकी 25 वर्षीय विकास यात्रा गौरव, चुनौतियों और संभावनाओं का संगम रही है। प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों से समृद्ध इस राज्य ने अपनी स्थापना के बाद से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। 

शुरुआती वर्षों में, झारखंड ने खनन और औद्योगिक विकास पर खास ध्यान केंद्रित किया। टाटा स्टील और सेल जैसे उद्योगों ने राज्य को औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। हाल के दशकों में, रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचारों में प्रगति की। झारखंड ने बुनियादी ढांचे में निवेश किया, जिसमें सड़कें, रेलवे और बिजली उत्पादन शामिल हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को जोड़ने का काम किया है। राज्य में सामाजिक क्षेत्र में, आदिवासी समुदायों के कल्याण के लिए योजनाएं शुरू की गईं हैं। 

शिक्षा के क्षेत्र में बिरसा मुंडा विश्वविद्यालय और आईआईटी (आईएसएम) धनबाद जैसे संस्थानों ने युवाओं को सशक्त बनाया। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, नक्सलवाद, गरीबी और बेरोजगारी जैसी कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। फिर भी, झारखंड की सांस्कृतिक समृद्धि, आदिवासी कला और पर्यटन स्थल जैसे बेतला और दस्सम फॉल्स इसे वैश्विक मंच पर आकर्षक बनाते हैं। आने वाले वर्षों में, नवीकरणीय ऊर्जा, स्टार्टअप्स और कौशल विकास पर ध्यान देकर झारखंड समृद्धि की नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

 नए राज्यों का गठन क्यों है जरूरी:

 भारत में नए राज्यों के गठन का इतिहास पुराना है। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद से, भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक आधार पर कई राज्यों का निर्माण हुआ। छोटे राज्यों के गठन के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं मसलन: 

प्रशासनिक दक्षता: बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ और संसाधनों का असमान वितरण आम समस्याएँ हैं। छोटे राज्य स्थानीय समस्याओं पर अधिक ध्यान दे सकते हैं और शासन को जनता के करीब ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासी समुदायों की समस्याओं पर केंद्रित नीतियाँ बनाई गईं, जो बड़े राज्यों में संभव नहीं था।

 क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण: कई क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के आधार पर अलग राज्य की माँग करते हैं। यह न केवल उनकी संस्कृति को संरक्षित करता है, बल्कि उन्हें स्वशासन का अवसर भी देता है। उत्तराखंड इसका एक उत्तम उदाहरण है, जहाँ पहाड़ी संस्कृति और भाषा को बढ़ावा मिला। 

आर्थिक विकास: छोटे राज्य अपनी विशिष्ट संसाधनों और संभावनाओं का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का उपयोग करके औद्योगिक विकास को गति दी। 

राजनीतिक सशक्तिकरण: छोटे राज्य स्थानीय नेतृत्व को उभरने का अवसर देते हैं, जिससे राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है। यह विशेष रूप से उपेक्षित क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। 

नए राज्यों के गठन की चुनौतियाँ  

नए राज्यों के गठन के कई लाभ हैं, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं जैसे: 

प्रशासनिक खर्च में वृद्धि: नए राज्यों के गठन से नई राजधानियाँ, सचिवालय, विधानसभाएँ और अन्य प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता होती है। यह केंद्र और राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में देहरादून को राजधानी बनाने,छत्तीसगढ़ में नया रायपुर बसाने और नई प्रशासनिक संरचनाएँ विकसित करने में भारी लागत आई। आंध्रप्रदेश भी अपनी नई राजधानी के निर्माण पर आ रहे भारी खर्च को लेकर ऊहापोह में है। 

संसाधनों का बँटवारा: नए और पुराने राज्यों के बीच जल, बिजली, खनिज और अन्य संसाधनों के बँटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीच जल संसाधनों को लेकर कई बार तनाव देखा गया। क्षेत्रीय असंतुलन: नए राज्यों के गठन से कुछ क्षेत्रों में विकास तेजी से होता है, जबकि अन्य क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। यह असमानता सामाजिक और आर्थिक तनाव को बढ़ा सकती है।

 राजनीतिक अस्थिरता: नए राज्यों की माँग कभी-कभी अलगाववादी आंदोलनों को हवा दे सकती है। तेलंगाना के गठन के बाद विदर्भ, गोरखालैंड और बोडोलैंड जैसे क्षेत्रों में भी अलग राज्य की माँग तेज हुई। 

प्रशासनिक क्षमता की कमी: नए राज्यों में प्रशासनिक ढाँचे को स्थापित करने और कुशल अधिकारियों की नियुक्ति में समय लगता है, जिससे शुरुआती वर्षों में शासन प्रभावित हो सकता है। 

इन सभी विषयों के विश्लेषण के बाद हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या भारत को और नए राज्यों की आवश्यकता है? इसका कारण यह है कि भारत की जनसंख्या, भौगोलिक विविधता और सांस्कृतिक बहुलता को देखते हुए नए राज्यों की माँग समय-समय पर उठती रहती है। वर्तमान में विदर्भ (महाराष्ट्र), गोरखालैंड (पश्चिम बंगाल), बोडोलैंड (असम), बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) और सौराष्ट्र (गुजरात) जैसे क्षेत्रों में अलग राज्य की माँग तेजी पकड़ रही है। मसलन यह तर्क दिया जा है कि विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र लंबे समय से उपेक्षित हैं। अलग राज्य बनने से इन क्षेत्रों में केंद्रित विकास संभव हो सकता है। वहीं, गोरखालैंड के पक्ष में यह बात कही जा रही है कि इस क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करने के लिए अलग राज्य जरूरी है। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ हैं। इसे छोटे राज्यों में विभाजित करने से शासन अधिक प्रभावी हो सकता है। 

वहीं, नए राज्यों के गठन का विरोध करने वालों का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए नए राज्यों का निर्माण महँगा सौदा है। मौजूदा आर्थिक स्थिति में यह बोझ और बढ़ सकता है और आर्थिक संतुलन गड़बड़ा जाएगा। इसके साथ साथ नए राज्य राष्ट्रीय एकता को भी प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि अधिक राज्यों के गठन से क्षेत्रीयता की भावना बढ़ सकती है। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नए राज्य बनने से विकास की गारंटी नहीं होती। झारखंड इसका उदाहरण है, जहाँ खनिज संपदा के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी की स्थिति में आशानुरूप सुधार नहीं आ पाया है । 

 कुल मिलाकर नए राज्यों के गठन का निर्णय लेते समय आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता,प्रशासनिक क्षमता, राष्ट्रीय हित जैसे तमाम बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नए राज्यों के गठन के स्थान पर सरकारें कई अन्य विकल्पों पर काम कर सकती हैं मसलन केंद्र और राज्य सरकारें मौजूदा राज्यों में ही क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए विशेष क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण स्थापित कर सकती हैं जो बिना नए राज्य गठन के इन क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। 

छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के 25 वर्षों की यात्रा से यह साबित हुआ है कि नए राज्यों का गठन विकास और स्थानीय शासन को तो बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी आती हैं।  इसलिए भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में नए राज्यों के गठन का निर्णय सावधानीपूर्वक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ लिया जाना चाहिए। 

70 साल बाद भी 'यंग' है आकाशवाणी का भोपाल केंद्र..!!


मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के सबसे खूबसूरत और वीवीआईपी इलाके श्यामला हिल्स में बने आकाशवाणी केंद्र में बारिश के बाद हल्की ठंडक है। सुबह सुबह स्टूडियो में मानस गान के बाद संगीत की स्वर लहरी बह रही है, जबकि पास ही न्यूज रीडर प्रदेश भर के श्रोताओं को लाइव ताजातरीन खबरें सुनाने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। बाहर पार्किंग में आकाशवाणी से जुड़े स्टाफ की आवा जाही शुरू हो गई है और यहां के शांत वातावरण में कारों के हॉर्न की आवाजें गूंज रही हैं। आज यह केंद्र अपना 70 वां स्थापना दिवस मना रहा है, लेकिन उत्साह और युवा ऊर्जा से लबरेज इस केंद्र को देखकर लगता है जैसे यह कल ही शुरू हुआ हो। 

सात दशक पहले, 1956 में 31 अक्टूबर को और मध्यप्रदेश के बनने से महज एक दिन पहले भोपाल के काशाना बंगले में स्थापित यह केंद्र आज भी शिक्षा, मनोरंजन, सूचना' के मंत्र को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि 70 साल बाद भी, यह केंद्र युवा ही लगता है। आकाशवाणी भोपाल का सफर भारत के रेडियो इतिहास से जुड़ा है। 1927 में मुंबई और कोलकाता में निजी ट्रांसमीटरों से रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई, लेकिन 1936 में इसे 'ऑल इंडिया रेडियो' नाम मिला और 1957 में आज का स्थाई नाम 'आकाशवाणी' । 

 भोपाल में रेडियो केंद्र खोलने का उद्देश्य आम लोगों खासकर ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच, किसानों को मौसम की जानकारी, और युवाओं तक संगीत की पहुंच आसान बनाना था। एफएम और मीडियम वेव पर चलने वाला यह स्टेशन आज मध्य भारत के दिल की धड़कन है। आकाशवाणी भोपाल ने न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच दिया बल्कि लोकगीतों से लेकर हिंदी कविताओं तक मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का रखवाला भी बना।

70 साल का यह सफर आसान नहीं था। चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो या 1971 का भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध हो या फिर कोई अन्य सैन्य संघर्ष आकाशवाणी भोपाल ने मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाकर उनका और उनके परिवारों का हौंसला बुलंद किया । वहीं, भोपाल ही क्या देश के सबसे काले अध्याय 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान आकाशवाणी भोपाल के स्टाफ ने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए निरंतर राहत सूचनाओं का प्रसारण किया। अस्पतालों के पते, उपलब्ध सुविधाओं, सरकारी सहायता केंद्रों की सूचना, दवाओं की जानकारी और सरकारी मदद से जुड़ी खबरों एवं जानकारियों के जरिए यह केंद्र पीड़ित परिवारों की उम्मीद की किरण बन गया।

आज आकाशवाणी भोपाल सिर्फ रेडियो नहीं, एक डिजिटल हब है। फेसबुक जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भरपूर फॉलोअर्स और व्यूज के साथ यह युवा पीढ़ी का भी चहेता बन गया है।  अपने करीब 17 घंटे प्रतिदिन के प्रसारण में ‘नमस्कार भोपाल' से लेकर 'महिला मंच' तक, ‘युववाणी’ से लेकर ‘ग्राम सभा और बुंदेली समाचारों’ तक अपने विविध कार्यक्रमों के जरिए आकाशवाणी भोपाल ने खुद को हर वर्ग के साथ जोड़ लिया है। तभी तो एक बुजुर्ग श्रोता कहते हैं कि "रेडियो ने मुझे जवानी दी और आज भी मेरी शामें सजाता है।" वहीं, युवाओं की कार में विविध भारती की गूंज इसे नई पीढ़ी से जोड़ रही है। इसी तरह, स्टूडियो में काम करने वाले युवा कलाकारों और फ्रेश आवाज से यहां पारंपरिक गरिमा के बीच प्रसारण की नई कहानियां लिखी जा रही हैं।

आज 70 साल बाद भी, आकाशवाणी भोपाल का प्रसारण युवा सा और नया सा लगता है क्योंकि यह बिना अपनी जड़ें छोड़े समय के साथ खुद को बदलता रहा है । रेडियो सेट से डीटीएच, फिर मोबाइल फोन और कार के भीतर घुसपैठ कर आकाशवाणी भोपाल ने प्राइवेट एफएम चैनलों की चमक-दमक के बीच अपनी सार्वजनिक सेवा और ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की पहचान कायम रखी है। आने वाले वर्षों में, नवाचार, डिजिटलीकरण, 5G इंटीग्रेशन और ज्यादा लोकल कंटेंट से यह केंद्र लगातार अपनी प्रतिष्ठा में चार चांद लगाता रहेगा। 

और अंत में,  "ये आकाशवाणी भोपाल है..." आवाज भले ही तरंगों के माध्यम से आकाश से आती है, लेकिन निकलती सीधे दिल से है और उतरती भी सीधे दिल में ही है। अपने सतत् विकास,बदलाव और इंद्रधनुषी कार्यक्रमों से आकाशवाणी भोपाल केंद्र ने यह साबित कर दिया है कि उम्र सिर्फ संख्या है, जज्बा हमेशा जवान रहता है..तो सुनते रहिए आकाशवाणी, क्योंकि कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं।

#आकाशवाणी #रेडियो #radio आकाशवाणी भोपाल @highlight Rajesh Vanjani Rajesh Bhat #भोपाल #bhopal #MadhyaPradesh

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

8 हजार फीट ऊंचे शिखर पर 108 फीट के हनुमान…अद्भुत!!

हिमाचल प्रदेश में ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ शिमला के सबसे लोकप्रिय स्थान मॉल रोड पहुंचते ही दूर पर्वत की चोटी पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा बरबस ही सभी का ध्यान खींच लेती है। इस प्रतिमा और बादलों की आंख मिचौली से शिमला के बदलते मौसम का अंदाजा भी लगता रहता है क्योंकि कभी यह प्रतिमा बादलों में छिपकर अदृश्य हो जाती है तो कभी सूर्य की किरणें को आत्मसात कर दिव्यता से चमकने लगती है। 

यह प्रतिमा इस तरीके से स्थापित की गई है कि मॉल रोड से लेकर इसके आसपास के कई इलाकों से आप हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं और अब यह मॉल रोड के एक प्रमुख आकर्षणों में से एक है। इस पहाड़ को जाखू हिल्स और हनुमान जी को ‘शिमला के रक्षक’ कहा जाता है। आख़िर, हनुमान चालीसा में ऐसे ही थोड़ी लिखा गया है..’तुम रक्षक काहू से डरना।’

जाखू वाले हनुमान जी केवल एक मंदिर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यहां की गाथा रामायण काल से जुड़ी है और यह अकाट्य आस्था का स्थान है। शिमला की ऊंची चोटियों के बीच, समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह जाखू मंदिर आस्था, प्रकृति और रोमांच का एक अद्भुत संगम है एवं शिमला के 'ताज' से कम नहीं  है।

मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के दौरान युद्ध में मेघनाद द्वारा शक्ति बाण चलाने से मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय की और जा रहे थे तो अचानक उनकी दृष्टि जाखू पर्वत पर तपस्या लीन यक्ष ऋषि पर पड़ी। संजीवनी बूटी का परिचय जानने के लिए हनुमान जी यहां पर उतर गए।  बताया जाता है कि उनके वेग से जाखू पर्वत जो पहले काफी उँचा था, आधा पृथ्वी के गर्भ में समा गया। बूटी का परिचय प्राप्त करने के उपरान्त हनुमान  द्रोण पर्वत की और चले गए। 

जाखू पर्वत पर जिस स्थान पर हनुमान जी उतरे थे वहां पर आज भी उनके चरण चिन्हों को संगमरमर से निर्मित करके सुरक्षित रखा गया है। 

हनुमान ने ऋषि यक्ष को वापसी में इसी स्थान पर उनसे मिलते हुए लौटने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा के दौरान हनुमान को मार्ग में कालनेमी राक्षस के कुचक्र सहित कई बाधाओं को पार करना पड़ा और समय अधिक लग गया। 

तब हनुमान समय पर संजीवनी बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने के लिए इस रास्ते की बजाए दूसरे छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए लंका चले गए। जाखू हिल्स पर अन्न जल त्यागकर हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे ऋषि यक्ष की व्याकुलता बढ़ने लगी। उनकी व्याकुलता देख हनुमान जी ने ऋषि को दर्शन दिए और न आने का कारण बताया। उनके अंतर्ध्यान होने के तुरन्त बाद यहां बजरंग बली की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई जो आज भी मन्दिर में पूजी जाती है। यक्ष ऋषि ने ही हनुमान जी के यहां ठहराव की स्मृति में इस मन्दिर का निर्माण किया। ऋषि 'यक्ष' के नाम पर ही पर्वत का नाम पहले 'यक्ष' था, जो समय के साथ बदलते हुए 'याक', फिर 'याखू' और अंत में 'जाखू' बन गया।

जाखू मंदिर का अब सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फीट ऊँची सिंदूरी प्रतिमा है । वर्ष 2010 में स्थापित यह मूर्ति इतनी विशाल है कि इसे शिमला के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है। हनुमान जी की इस मूर्ति का निर्माण बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नन्दा और दामाद निखिल नन्दा ने करवाया है। साल 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इस उद्घाटन किया था. इस दौरान मौके पर अभिनेता और श्वेता के भाई अभिषेक बच्चन भी मौजूद थे। यह प्रतिमा शहर की पहचान बन चुकी है और इसे 'प्राइड ऑफ शिमला' भी कहा जाता है। 2025 में यहां विशाल ध्वज भी स्थापित कर दिया गया है। 

जाखू मंदिर तक पहुँचना भी अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। पर्यटक मॉल रोड के रिज मैदान से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल या टैक्सी का उपयोग कर सकते हैं। पैदल रास्ता घने देवदार के जंगल से होकर गुज़रता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। वहीं संकरे पहाड़ी कच्चे-पक्के मार्ग पर टैक्सी की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। वहीं, जो पर्यटक खड़ी चढ़ाई से बचना चाहते हैं उनके लिए जाखू रोपवे एक बेहतरीन विकल्प है। रिज मैदान से शुरू होकर यह रोपवे कुछ ही मिनटों में सीधे मंदिर परिसर तक पहुँचा देता है, साथ ही शिमला शहर के मनमोहक नज़ारे भी दिखाता है।

जाखू पहाड़ी की चोटी से शिमला शहर, आसपास की चोटियों और घाटियों का मनोरम और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। कुल मिलाकर जाखू मंदिर केवल पत्थर और मूर्तियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह सिद्ध स्थान है जहाँ देवत्व और प्रकृति का मिलन होता है इसलिए शिमला की यात्रा जाखू हनुमान के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

क्या है शिमला का इटली से प्राकृतिक कनेक्शन..!!

क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के बारे में यह तो सभी को पता है कि अंग्रेजों ने अपने आराम के लिए इस स्थान को सजाया संवारा था लेकिन यहां इटेलियन कनेक्शन भी है। अंग्रेजों ने भले ही इसे सत्ता प्रतिष्ठान का केंद्र बनाया था और यहां की वादियों से देश दुनिया को रूबरू कराया लेकिन अन्य देशों के लोग भी शिमला के कैनवास को अपने रंगों से रंगने में पीछे नहीं रहे हैं। इसी शृंखला में एक बेहतरीन स्थान है - क्रेग्नानो नेचर पार्क। 

क्रेग्नानो नेचर पार्क प्रकृति के चितेरो के लिए एक ऐसा कैनवास है जिसपर वे अपनी कलात्मकता से नए नए रंग भर सकते हैं, मनमाफिक पटकथा लिख सकते हैं और सुकून और सेहत के खुशनुमा पल गुजार सकते हैं। देवदार, चीड़ और चिनार के पत्तों के बीच से झांकती सूरज की नटखट किरणें हो या खूबसूरत फूलों पर अठखेलियां करती रंग बिरंगी तितलियां या पक्षियों के कलरव से उपजा दिलकश संगीत..या फिर अनोखी दिल को छू लेने वाली शांति। यहां आकर आपको प्रकृति से निकटता का अनूठा अनुभव होता है।  


शिमला से मशोबरा की ओर तथा लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस क्रैग्नानो नेचर पार्क तक महज 40 मिनट की हरीभरी और ऊंचे देवदार की छत्रछाया में ड्राइव आपको इस मामूली सी दूरी का भी अहसास नहीं होने देती।   मशोबरा में 7,700 फीट की ऊँचाई पर करीब 9.6 हेक्टेयर में फैला यह क्रैग्नानो  पार्क हरी-भरी वादियों में बसा एक ऐसा स्वर्ग है, जहाँ पहाड़ों की ठंडी हवा, घने जंगलों की सिहरन और इतालवी शैली का ऐतिहासिक आकर्षण एक साथ मिल जाते हैं।


 यहां से हिमालय की चोटियाँ बादलों को छूती नजर आती हैं। यह जगह मूल रूप से 19 वीं सदी में इतालवी व्यवसाई और फोटोग्राफर चेवालियर फ्रेडरिको पेलिटी द्वारा बनाई गई थी, जिन्होंने इसे अपने जन्मस्थान क्रैग्नानो (इटली) के नाम पर बसाया था। इस पार्क की खूबसूरती इतनी विविध और मोहक है कि हर मौसम में यह नया रंग-रूप धारण कर लेता है। वसंत और ग्रीष्म में पार्क रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है एवं लाल, पीले और गुलाबी फूलों की चादर यहां बिछी रहती है तो शरद ऋतु में पेड़ सोने-चाँदी के रंगों से जगमगा उठते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर इस जगह को एक परी लोक जैसा बना देती है। 

यहाँ देवदार, ओक और पाइन के घने जंगल हैं, जिनके बीच से बहती ठंडी ताजी हवा जीवन को नए अहसास और मन को शांति से भर देती है। यहाँ तीन ट्रेल्स (रास्ते) हैं – पाइन ट्रेल, ओक ट्रेल और एकेडमी ट्रेल – जो पैदल चलने वालों के लिए अनूठा अनुभव देते हैं। इन रास्तों पर चलते हुए आप तितलियों के झुंड, रंगीन फूलों और शांत वादियों का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहाँ बने ट्री हाउस में पहुँचकर आप शहर की भागदौड़ भूलकर प्रकृति की गोद में सुकून से आराम कर सकते हैं। 

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का..!!

फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्ति/परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?  हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। 

जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।  दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? 

इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।   बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। 

दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं। हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों। 

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी  स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और  2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।   

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं ।   

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।  

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

‘मन की बात’ कैसे बनी जन जन की बात..!!

रविवार को सुबह 11 बजे आकाशवाणी और दूरदर्शन से लेकर विभिन्न संचार माध्यमों पर गूंजने वाली आवाज ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ अब न केवल मासिक मंत्र बन गई है बल्कि जन संवाद की पहचान भी है। इसे हम सभी मन की बात कार्यक्रम के नाम से जानते हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के साथ अराजनीतिक और प्रेरक संवाद करते हैं। 3 अक्टूबर को इस कार्यक्रम की 11वीं वर्षगांठ है। दरअसल श्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के करीब 5 महीने बाद बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व विजयादशमी के दिन 3 अक्टूबर 2014 को अपने इस सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ की शुरुआत की थी। आज यह कार्यक्रम महीने के आखिरी रविवार की पहचान और एक अनिवार्य जरूरत बन गया है।

इस कार्यक्रम को रेडियो माध्यम को नया जन्म देने की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। खास तौर पर जब दुनिया संचार के नए युग के विभिन्न प्लेटफॉर्म के पीछे भाग रही हो तब किसी राष्ट्र प्रमुख द्वारा पारंपरिक और केवल आवाज़ पर केंद्रित माध्यम पर विश्वास जताना वाकई प्रशंसनीय एवं अचरज भरा प्रयास था लेकिन आज मन की बात कार्यक्रम के सवा सौ एपिसोड पूरे हो जाने के बाद हम कह सकते हैं कि श्री मोदी ने रेडियो का चयन कर जमीनी स्तर तक संवाद कायम करने की जो शुरुआत की थी वह आज सफलता का नया इतिहास रच रही है।

मन की बात कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री ने आम जनता के साथ सहज तरीके से सरल भाषा में संवाद कायम किया है। आसान शब्दों में कहें तो अब यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री और आम नागरिकों के बीच सीधे संवाद का एक मजबूत सेतु बन चुका है।  मन की बात कार्यक्रम ने 30 अप्रैल 2023 को 100 एपिसोड का सफर पूरा कर लिया था और अब यह सवा सौ एपिसोड का आंकड़ा पार कर चुका है। बीते रविवार को मन की बात के 126 वे अंक का प्रसारण हुआ। हालांकि, देश में आम चुनाव के मद्देनजर चुनावी आचार संहिता के कारण 2019 में मार्च, अप्रैल और मई माह में यह कार्यक्रम प्रसारित नहीं हुआ था।

मन की बात कार्यक्रम से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके पहले एपिसोड का प्रसारण शुक्रवार के दिन हुआ था तब से लेकर मार्च 2015 तक इसका प्रसारण हर महीने शुक्रवार को ही होता था लेकिन अप्रैल 2015 से इसके प्रसारण का दिन बदल दिया गया और फिर यह हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने लगा। एक अन्य मजेदार बात यह है कि पहला एपिसोड करीब 14 मिनट का था जबकि नवंबर 2014 में प्रसारित दूसरा एपिसोड 19 मिनट का और तीसरा एपिसोड 26 मिनट अवधि का था। हालांकि चौथे एपिसोड से इसकी अवधि 30 मिनट तय कर दी गई और तब से अब तक यह प्रतिमाह 30 मिनट की अवधि में ही प्रसारित होता है। आकाशवाणी पर यह कार्यक्रम 22 भारतीय भाषाओं, 29 बोलियों और 11 विदेशी भाषा में प्रसारित होता है। इसके अलावा दूरदर्शन तथा अन्य निजी समाचार चैनलों, यूट्यूब और कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी इस कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है।

 मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक करीब 1000 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, प्रेरित करने वाली शख्सियतों और संगठनों का उल्लेख कर चुके हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व के कारण मन की बात कार्यक्रम अब सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात नहीं रह गया है बल्कि यह करोड़ों भारतीय लोगों के मन की बात बन चुका है ।

मन की बात के सौवें एपिसोड के पहले भारतीय प्रबंध संस्थान, रोहतक द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मन की बात के बारे में लगभग 96 प्रतिशत लोग जानते हैं और यह कार्यक्रम 100 करोड़ लोगों तक पहुँच चुका है। इतना ही नहीं, 23 करोड़ लोग नियमित रूप से यह कार्यक्रम देखते/सुनते हैं, जबकि अन्य 41 करोड़ लोग कभी कभी इस कार्यक्रम से जुड़ते हैं। इस कार्यक्रम ने अब तक करीब 35 करोड़ रुपए का राजस्व भी अर्जित किया है। अब सवा सौ एपिसोड का सफर तय कर यह कार्यक्रम सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहा है।

मन की बात परस्पर संवाद का मंच इसलिए भी बन गया है क्योंकि आम लोग इस कार्यक्रम के संबंध में न केवल प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं बल्कि अपने रिकॉर्ड किए गए संदेश भी भेजते हैं इसलिए यह दो तरफा संवाद सकारात्मक पहलुओं को सामने लाने और समाज में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बन गया है। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर नागालैंड तक और पंजाब से लेकर लक्षद्वीप तक से जुड़े मुद्दों को उठाया जाता है,वहां की समस्याओं पर बातचीत होती है और जनसहयोग से उनके समाधान पर भी बात होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वच्छता अभियान है । प्रधानमंत्री ने मन की बात के पहले एपिसोड में ही स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की अपील की थी और अब करीब 10 साल बाद देश स्वच्छता में किन बुलंदियों पर है, यह किसी से छिपा नहीं है। 

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने जुलाई 2022 में घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने की अपील की थी और कभी आयात पर निर्भर मृतप्राय भारतीय खिलौना उद्योग अब लगभग 3000 करोड रुपए के निर्यात का आंकड़ा हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने खादी के वस्त्र खरीदने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने जैसी कई मुहिम इस कार्यक्रम के जरिए शुरू की और आज ये सभी क्षेत्र विकास की रफ़्तार पर सवार हैं ।

विशेषज्ञों का मानना है कि मन की बात कार्यक्रम के लोकप्रिय होने की वजह इसका पारिवारिक शैली में संवाद है और यह बचपन में दादी नानी से सुनी गई कहानियों की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरल, सहज और व्यक्तिगत संवाद शैली लोगों को जोड़ती है। वे आम लोगों की भाषा में बात करते हैं, जिससे श्रोता अपनेपन का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं,पत्रों या MyGov प्लेटफॉर्म के माध्यम से आम लोगों की कहानियों और सुझावों को शामिल करना इसे जन-आधारित बनाता है। यह कार्यक्रम हमें अपने त्योहार, संस्कृति, परंपराओं, समुदाय और परिवेश से जोड़ने में भी मदद करता है। 

मन की बात एआई और मशीन लर्निंग के दौर में पारंपरिक संचार माध्यम के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है जो चुपचाप सामाजिक क्रांति का जरिया भी बन गया है। सेल्फी विद डॉटर, देश के गुमनाम नायकों का गौरवपूर्ण स्मरण, पर्यावरण संरक्षण, वोकल फॉर लोकल,एक पेड़ मां के नाम, कुपोषण से मुक्ति और जल शक्ति अभियान जैसे कई उदाहरण है जिन्हें इस कार्यक्रम के जरिए न केवल राष्ट्रव्यापी सफलता मिली है बल्कि उन्होंने देश की सूरत और सीरत बदलने का काम किया है।


कुल मिलाकर यह कार्यक्रम प्रेरणादायक और सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और लोगों को अच्छा करने के लिए प्रेरित एवं उत्साहित करता है। यही वजह है कि मन की बात भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय हो रहा है। यह हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील का सामूहिक रूप से पालन करें और देश को विकास,बदलाव और सकारात्मक सोच के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर रखने में कोई कसर नहीं छोड़े।

#Mannkibaat #NarendraModi #Radio #Akashvani

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

शिव और प्रकृति का मेल है डमरू घाटी

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के  गाडरवारा शहर के करीब स्थित डमरू घाटी एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण भक्तों के मन को मोह लेता है। यह घाटी शक्कर नदी के तट पर स्थित है, जो नर्मदा की सहायक नदियों में से एक है। 

घाटी का आकार भगवान शिव के डमरू के समान होने के कारण इसका नाम 'डमरू घाटी' पड़ा है। यहाँ की शांत वादियाँ और हरे-भरे पेड़ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करते हैं। गाडरवारा पहले से ही आचार्य रजनीश (ओशो) के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर का उद्घाटन 1980 के दशक में हुआ, और तब से यह शिवभक्तों का प्रमुख केंद्र बन गया है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका विशाल शिवलिंग, जो मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है। यह शिवलिंग लगभग 20-21 फुट ऊँचा है। 

डमरू घाटी का वातावरण इतना शांतिपूर्ण है कि आने वाला हर यात्री मन की शांति का अनुभव करता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 

डमरू घाटी न केवल एक मंदिर है, बल्कि भक्ति, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति का जीवंत चित्रण है। यदि आप मध्य प्रदेश की यात्रा पर हैं, तो यहाँ शिव के दर्शन अवश्य करें । यह जबलपुर-भोपाल मार्ग पर कुछ वक्त गुजारने के लिए बेहतरीन स्थान है।


केवल गंभीर नहीं, विनोदप्रिय भी थे बापू

आज 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन है। आज अगर बापू हमारे बीच होते तो वे 156 साल के होते लेकिन कहते हैं न कि उम्र बड़ी नहीं होनी चाहिए बल्कि जीवन में किए गए कार्य बड़े होने चाहिए और यह बात मोहनदास करमचंद गांधी पर सौ फीसदी लागू होती है। महात्मा गांधी अपने कार्यों, आदर्शों, विचारों, सिद्धांतों और जीवन के उदाहरणों से इतना ऊंचा दर्जा रखते हैं कि देश क्या, दुनिया में उनकी बराबरी का कोई और शख्स नहीं दिखता। आमतौर पर गांधीजी जी की छवि को गंभीर, अत्यधिक अनुशासित और नीरस आंका जाता है लेकिन असलियत यह है कि गांधीजी विनोदप्रियता और हंसी मजाक में किसी से कम नहीं थे लेकिन गांधीजी की विनोदप्रियता में सबसे बड़ा अंतर यह था कि महात्मा गांधी का हास्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि उसमें हमेशा गहरा संदेश छिपा होता था।

हम यह कह सकते हैं कि महात्मा गांधी का व्यक्तित्व जितना गंभीर, त्यागपूर्ण और आदर्शवादी था, उतना ही सहज और विनोदी भी था। उनका हास्य-बोध भी उनके अन्य कार्यों की तरह असाधारण था। अपनी विनोदप्रियता के कारण ही वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सहज भाव बनाए रखते थे । 

गांधीजी अक्सर अपने बारे में ही मजाक करते थे, जो उनकी विनम्रता को दर्शाता है । एक बार, जब किसी ने उनकी पतली काया का मजाक उड़ाया तो गांधीजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, लेकिन मेरी आत्मा में ताकत है। एक अन्य मौके पर, जब किसी ने उनकी सख्त दिनचर्या और कम खाने की आदत पर टिप्पणी की, तो उन्होंने मजाक में कहा कि मैं अपने पेट को ज्यादा काम नहीं देता, ताकि मेरा दिमाग ज्यादा काम कर सके।

इसी तरह, एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े देश का प्रतिनिधित्व करते हुए भी केवल एक धोती क्यों पहनते हैं? तो गांधीजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया कि मेरे देश के करोड़ों लोग पूरे कपड़े नहीं पहन पाते। जब वे सब पहनने लगेंगे, तब मैं भी पहन लूंगा। यह उत्तर व्यंग्य के साथ  करुणा भी जगाता है ।

बताया जाता है कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब बापू जेल में थे, तो एक जेलर ने उनसे मजाक में कहा कि गांधीजी, आप बार-बार जेल क्यों आ जाते हैं? इस पर गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि यहाँ का खाना मुझे घर से बेहतर लगता है। यह जवाब न केवल हास्यपूर्ण था, बल्कि उनकी निर्भीकता को भी दर्शाता है।

गांधीजी बच्चों के साथ विशेष रूप से विनोदप्रिय हो जाते थे। वे बच्चों के साथ मजाक करते, कहानियाँ सुनाते और उनके सवालों का जवाब हल्के-फुल्के अंदाज में देते थे। एक बार, एक बच्चे ने उनसे पूछा कि बापू, आप इतने पतले क्यों हैं? तो गांधीजी ने हँसते हुए कहा कि मैं अपनी सारी ताकत तुम जैसे बच्चों को देने के लिए बचाता हूँ।

इसी प्रकार, एक बार, जब एक ब्रिटिश पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने कम कपड़ों में लंदन की सर्दी में क्या करेंगे? तो गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि मेरे पास तो मेरे देशवासियों से ज्यादा कपड़े हैं, वे तो और भी कम पहनते हैं। यह जवाब न केवल विनोदी था, बल्कि भारत की गरीबी और ब्रिटिश शोषण की ओर भी इशारा करता था।

एक अन्य उदाहरण ऐसा भी है जिसमें भूख से भी उन्होंने हास्य पैदा कर दिया था। एक बार अनशन के दौरान किसी ने  उनसे पूछा कि बापू भूख तो नहीं लग रही? तो उन्होंने हँसकर कहा कि भूख तो लगती है, पर सोच रहा हूँ कि भूख भी कितनी सहनशील है। 

सबसे खास बात यह है कि गांधीजी की विनोदप्रियता कभी किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं होती थी। वह हास्य में व्यंग्य का सहारा लेते थे, लेकिन उसमें करुणा और आत्मीयता झलकती थी। यही कारण है कि उनका विनोद प्रेरक बन जाता था। महात्मा गांधी की विनोदप्रियता उनकी विनम्रता, बुद्धिमत्ता, और मानवता का प्रतीक थी। उनका हास्य न तो आक्रामक था और न ही अपमानजनक, बल्कि यह विचारशील, प्रेरणादायक और सकारात्मक था। यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू था, जो उन्हें न केवल एक महान नेता, बल्कि एक सहज और प्रिय इंसान बनाता था। महात्मा गांधी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गंभीरता और विनोद साथ-साथ चल सकते हैं और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।


रविवार, 28 सितंबर 2025

जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों का खजाना है ‘थैंक यू यारा’

‘थैंक यू यार’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जिसमें दस भावनात्मक और संवेदनशील कहानियाँ शामिल हैं, जो हमारे आसपास की रोज़मर्रा की जिंदगी, मानवीय रिश्तों और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से उकेरती हैं। यह संग्रह पाठकों को भावनाओं के एक गहरे समुद्र में ले जाता है, जहाँ प्रेम, दुख, संघर्ष, और उम्मीद की बारीकियां हर कहानी में स्पष्ट रूप से झलकती हैं।

#थैंकयूयारा की कहानियाँ सामान्य लोगों के जीवन, उनके छोटे-छोटे सपनों, और रोज़मर्रा के संघर्षों को केंद्र में रखती हैं। ये कहानियाँ न केवल भावनात्मक गहराई लिए हुए हैं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों को भी उजागर करती हैं। ‘कटघरे’ से लेकर ‘यूं भी होता है’ तक संग्रह की हर कहानी एक अलग रंग और स्वाद लिए हुए है, फिर भी सभी में एक सामान्य सूत्र है—मानवीय संवेदनाओं का चित्रण और जीवन की साधारण परिस्थितियों में छिपी असाधारणता ।

‘थैंक यू यारा’ संग्रह की तमाम कहानियाँ सीधे हमारे दिल को छूती हैं। चाहे वह ‘कटघरे’ कहानी में एक शिक्षक शबनम में अपने छात्र विजय भूषण के प्रति अपने बच्चे जैसी तड़प हो, ‘दूर्वा’ में शिक्षक और छात्रा रुचिरा के बीच मार्गदर्शन की गर्माहट हो या  ‘सुर्ख गुलाब’ में युवावस्था की दहलीज पर खड़ी तीन सहेलियों के भीतर प्रेम की अनकही पीड़ा...हर कहानी में भावनाएँ जीवंत रूप में उभरती हैं। 

दस कहानियों का यह संग्रह विभिन्न विषयों को छूता है—प्रेम, दोस्ती, परिवार और सामाजिकता। प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है, फिर भी संग्रह के रूप में ये एक-दूसरे की पूरक बनकर मोतियों की माला सी बन जाती हैं।
‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ रिश्तों की विभिन्न छवियों को भी सामने लाती हैं जैसे ‘प्रार्थना’ कहानी में माँ का अपनी बेटी के लिए प्रेम है, तो ‘मावठा’ में दोस्तों के बीच अनकहा विश्वास। 

इस संग्रह की कहानियाँ आधुनिक जीवन की जटिलताओं और उससे उत्पन्न होने वाली भावनात्मक दूरी को भी दर्शाती हैं। जैसे ‘परिक्रमा’ कहानी में कला की कद्र हमें स्कूल के दिनों में पढ़ी महान कहानीकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘ठेस’ और उसके कलाकार सिरचन का स्मरण करा देती है जबकि ‘गोल्डन कर्ल’ कहानी बच्चों की मासूमियत से रूबरू कराती है। पुस्तक का शीर्षक बनी कहानी ‘थैंक यू यारा’ लेखक के मन की उथल पुथल को आत्म संवाद शैली की कहानी में पेश करती है।

आकाशवाणी भोपाल  की लोकप्रिय एनाउंसर Amita Trivedi जी ने संवेदनाओं को इतनी बारीकी से बुना है कि हम स्वतः ही किरदारों के साथ जुड़ते जाते हैं ।  ‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ हमारे आसपास की परिस्थितियों को दर्शाती हैं—चाहे वह मध्यमवर्गीय परिवारों का मानसिक संघर्ष हो, रिश्तों में विश्वास की कमी हो या समाज की छोटी-छोटी रूढ़ियों से जूझते लोग हों । ये कहानियाँ सामाजिक यथार्थ को न केवल उजागर करती हैं, बल्कि उन पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

अमिता जी की भाषा सरल, सहज, और प्रवाहमयी है। यह संग्रह आम पाठक से लेकर साहित्य प्रेमी तक सभी को आकर्षित करेगा । संवाद और वर्णन में एक आत्मीयता है, जो कहानियों को और भी प्रभावी बनाते हुए सीधे दिल से जोड़ देती हैं ।

अमिता त्रिवेदी ने कहानियों को इस तरह बुना है कि वे न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि विचारोत्तेजक भी हैं। किरदारों का चित्रण इतना जीवंत है कि वे हमारे सामने साकार हो उठते हैं। संग्रह की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी और सच्चाई है—यह न तो अतिशयोक्ति में बहता है और न ही बनावटीपन में। हर कहानी में एक ऐसी सच्चाई है, जो हमें अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों से जोड़ती है।

कुल मिलाकर ‘थैंक यू यारा’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जो न केवल पढ़ने में आनंद देता है, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे पलों की गहराई को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। यह उन पाठकों के लिए आदर्श है, जो साहित्य में भावनात्मक गहराई और सामाजिक यथार्थ की तलाश करते हैं। अमिता जी का यह पहला ही कहानी संग्रह हमें याद दिलाता है कि हमारे आसपास की साधारण सी दिखने वाली जिंदगियों में भी असाधारण कहानियाँ छिपी हुई हैं बस, उन्हें देखने और शब्दों में उकेरने की दृष्टि चाहिए । किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है  

पुस्तक: थैंक यू यारा (कहानी संग्रह)
लेखक: अमिता त्रिवेदी 
पृष्ठ: 94  मूल्य: 200 रुपए 
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर

सोमवार, 22 सितंबर 2025

हिमाचल में फलों का गोविंदा...!!

न न, यह टमाटर नहीं है और न ही तेंदू है। रंग भले ही नारंगी है परन्तु संतरा भी नहीं है। यह है हिमाचल का अमर फल या चीनी सेब…जो स्वाद और सेहत का खजाना है। फिल्मों में जैसे पहले मिथुन चक्रवर्ती और बाद में गोविंदा को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था इसी तरह इस फल को भी पहले गरीबों का सेब कहा जाता था लेकिन धीरे धीरे इसने अपने स्वाद,कीमत और सेहत से भरपूर गुणों के कारण अलग पहचान कायम कर ली है..और अब यह सेब का विकल्प बन रहा है।

स्थानीय भाषा में इसे 'जापानी फल' या 'काकी' कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros kaki है और पहली बार 1940 के दशक में शिमला के नारकंडा इलाके में इसका पदार्पण माना जाता है। 

वैसे, अपने जन्मस्थान जापान में इसका मूल नाम काकी है, जिसका अर्थ होता है देवताओं का फल। अंग्रेजी में इसे पर्सिमन (Persimmon) के नाम से जाना जाता है। इजराइल में इसे शैरॉन फ्रूट तो कुछ देशों एबेन फ्रूट कहा जाता है। हिमाचल में इसे लंबे समय तक खराब नहीं होने के कारण अमर फल और सेब से सस्ता और उसका विकल्प होने के कारण चीनी सेब भी कहा जाता है।

दूर से टमाटर की तरह दिखने वाला यह चमकीला नारंगी फल अपने भीतर शहद की मिठास समेटे है। यह अपने स्वाद से हिमाचल के किसानों के लिए न केवल आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के खजाने के रूप में भी उभर रहा है। 

देश में हिमाचल प्रदेश को वैली ऑफ फ्रूट्स कहा जाता है क्योंकि अपने पहाड़ों, ठंडी हवाओं और उपजाऊ मिट्टी के कारण यह सदियों से फलों का स्वर्ग है। यहां सेब की लालिमा से लेकर खुबानी की सुनहरी चमक तक हर मौसम में फलों की खुशबू बिखरी रहती है ।

ऐसा माना जाता है हिमाचल में फलों के राजा सेब ने अपनी यात्रा की शुरुआत ब्रिटिश काल में शुरू की थी । मौसम में बदलाव के साथ यहां की फ्रूट बास्केट में कई फल जुड़ते जा रहे हैं। यह सेब पर निर्भरता कम करने और कमाई के नए रास्ते तलाशने की कवायद भी है। शायद, यही कारण है कि जापानी फल अब शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और चंबा जिलों तक में भरपूर पैदा हो रहा है । 

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल फल उत्पादन 7.53 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें जापानी फल, कीवी और जैकफ्रूट जैसे वैकल्पिक फल भी भरपूर मात्रा में हैं।  जापानी फल की खूबी यह है कि इसे सेब के साथ भी लगाया जा सकता है, जिससे मिश्रित खेती संभव हो जाती है।  सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है ताकि छोटे किसान परिवारों की आय दोगुनी हो सके। हिमाचल में इसकी फ़ुयू और हेचिया जैसी प्रजातियाँ बाजार में लोकप्रिय हैं। 

 जापानी फल स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का खजाना भी है। इसमें आंखों के लिए विटामिन ए, नींबू से दोगुना विटामिन सी और पाचन के लिए भरपूर फाइबर है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे टैनिन, कैटेचिन और गैलिक एसिड कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों से लड़ने में मदद करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह सूजन कम करता है, कोलेस्ट्रॉल घटाता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है। 

पारंपरिक चिकित्सा में, इसके पत्तों की चाय पेट दर्द और दस्त ठीक करती है, जबकि फल रक्तचाप नियंत्रित रखता है। डायबिटीज वाले मरीजों के लिए यह आदर्श है, क्योंकि यह ब्लड शुगर स्थिर रखता है। जापानी फल पोटेशियम और फॉस्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है। 

कुल मिलाकर यह किसी 'सुपरफूड' से कम नहीं है। लेकिन ज्यादा खाने से इसमें मौजूद टैनिन के कारण पेट में गांठ बनने का खतरा भी रहता है। 


संक्षेप में कहें तो जापानी फल हिमाचल में एक फल भर नहीं है, बल्कि आशा का प्रतीक बन रहा है। यह न केवल किसानों को सेब की एकतरफा निर्भरता से मुक्त कर रहा है बल्कि पर्यटकों को नई स्वाद यात्रा पर भी ले जाने के साथ साथ स्वास्थ्य का अनमोल उपहार भी दे रहा है। इसलिए अगली बार जब आप हिमाचल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों तो प्रकृति की इस नारंगी स्वादिष्ट और सेहतमंद नेमत को नजरअंदाज न करें ।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

ये Gen Z- जेन जी क्या है..ये जेन जी?

जब से नेपाल में आंदोलन और सत्ता में बदलाव की खबरें मीडिया में दौड़ रही हैं तब से ‘जेन जी’ और ‘नेपो किड्स’ जैसे शब्द घर-घर में सुनाई देने लगे हैं। हालांकि नेपो किड्स हमारे देश में नया शब्द नहीं है क्योंकि मनोरंजन जगत और खासतौर पर बॉलीवुड, खेल, व्यवसाय एवं राजनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में इसका भरपूर इस्तेमाल होता आ रहा है।  

सामान्य रूप से समझे तो नेपो किड्स  (Nepo Kids) शब्द नेपोटिज्म (Nepotism) से लिया गया है, जिसका सामान्य अर्थ है भाई-भतीजावाद। यह तमगा उन युवाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो अपने परिवार के प्रभाव के कारण राजनीति,मनोरंजन, फिल्म, खेल, व्यवसाय जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आसानी से अवसर प्राप्त कर लेते हैं। इन पर यह आरोप लगता है कि वे प्रतिभा या मेहनत के बजाय अपने परिवार के नाम पर सफलता हासिल कर रहे हैं। हालांकि कई मामलों में यह बात सही नहीं है क्योंकि नेपो किड्स में कई युवा वाकई प्रतिभाशाली होते हैं और वे अपनी लगन, मेहनत और कौशल से लंबी रेस का घोड़ा साबित होते हैं। 

 जहां तक मौजूदा वक्त के सबसे चर्चित शब्द ‘Gen Z’ या जेनरेशन Z की बात है तो यह शब्द आमतौर पर उन युवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। जैसे भारतीय संदर्भ में परदादा, दादा, पिता और बेटे के जरिए पीढ़ियों को समझा जाता है उसी तरह पश्चिमी संदर्भ में पीढ़ियों को अलग अलग नाम से वर्गीकृत किया गया है। फिलहाल जेन जी सबसे युवा पीढ़ी है जो डिजिटल युग में पग कर एवं रच बसकर तैयार हुई है । 

यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है इसलिए कुछ लोग इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहते हैं।  Gen Z को तकनीकी दक्षता, सामाजिक जागरूकता और वैश्विक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के लिए भी जाना जाता है।  

ऐसा भी नहीं है कि पीढ़ियों का नामकरण कोई पहली बार हो रहा है। दशकों से पश्चिमी समाज में बदलती पीढ़ियों को उनके दौर और तात्कालिक घटनाओं के मुताबिक अलग अलग दिलचस्प नामों से संबोधित किया जाता रहा है। मसलन नामकरण की इस श्रृंखला की सबसे पहली एवं 1883–1900 के बीच जन्मी पीढ़ी को ‘लॉस्ट जेनरेशन’ कहा जाता है । 

यह पीढ़ी प्रथम विश्व युद्ध के समय की थी। इस समूह ने युद्ध और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया।  इसके बाद की पीढ़ी को नाम मिला ‘ग्रेटेस्ट जेनरेशन’ । इसमें 1901–1927 के बीच जन्में लोगों को शामिल किया गया ।  देशभक्ति, कठिन परिश्रम और सामूहिक बलिदान से अपनी पहचान बनाने वाली इस पीढ़ी ने प्रथम विश्व युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव किया था।     

 इसके बाद नंबर आता है ‘साइलेंट जेनरेशन’ का । हालांकि इस नाम का इनके चुप/मौन रहने से कोई मतलब नहीं है बल्कि मौन रहकर परिश्रम करने से है। इस पीढ़ी में 1928–1945 के बीच जन्में लोग शामिल किए गए । इस पीढ़ी ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण का दौर देखा है और अपनी मेहनत से अपना संसार रचा था । 

साइलेंट जनरेशन के बाद आई पीढ़ी के नामकरण की वजह भी बहुत ही दिलचस्प है। इन्हे ‘बेबी बूमर्स’  कहा जाता है और इसमें 1946–1964 के बीच जन्में लोग शामिल हैं। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्म दर में एकाएक हुई वृद्धि के कारण इस पीढ़ी को यह नाम मिला।  

यह पीढ़ी आर्थिक समृद्धि, सामाजिक परिवर्तन और उपभोक्तावाद के लिए भी जानी जाती है।  मौजूदा वक्त में अपनी कलम, लेखन, परिश्रम, विचारों और आविष्कारों से दुनिया को समृद्ध करने वाली और अब अधेड़ हो चली पीढ़ी को ‘जेनरेशन X’ कहा जाता है। इसमें 1965–1980 के बीच जन्में हम जैसे तमाम लोग शामिल हैं। 

हमारी यह पीढ़ी इस मामले में सबसे खास है कि इसने परंपराओं और तकनीकी बदलावों को साथ-साथ जिया है। जेन एक्स ने लैंडलाइन फोन से लेकर पेजर एवं मोबाइल फोन के विकास तक और कैसेट से फ्लॉपी,सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव और अब क्लाउड स्टोरेज तक का लंबा परन्तु तेजी से बदलता सफर तय किया है।   

इसके बाद आती है ‘जेनरेशन Y’ अर्थात् वो लोग जिन्होंने 1981–1996 के बीच जन्म लिया है। हम कह सकते हैं कि इसमें हमारे परिवार के बड़े बच्चे शामिल हैं। यह पीढ़ी डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में जवान हुई है और तकनीक समझ के साथ इसके अनुभवों से भी सराबोर है।  अब आती है बारी बहुचर्चित ‘जेनरेशन Z’ या जेन जी की। यह हमारी युवा पीढ़ी है क्योंकि इन्होंने 1997–2012 के बीच जन्म लिया है।  मोबाइल, गेमिंग, सोशल मीडिया में डूबती उतराती इस पीढ़ी के सदस्य अधिकतम 25 से 28 साल के युवा हैं और इन्हें पढ़ाई, नौकरी, बढ़िया लाइफ और व्यक्तिगत हितों की सबसे ज्यादा फिक्र है। इसलिए यह पीढ़ी दुनिया भर में धमा चौकड़ी मचाए हुए है।  

 ऐसा नहीं है कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण जेन जी पर आकर रुक गया है बल्कि इनके पीछे पीछे एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है जिसे ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम मिला है। इसमें 2013 से लेकर मौजूदा साल यानि 2025 तक पैदा हुए बच्चे  शामिल हैं। यह मानव सभ्यता की सबसे नवीनतम पीढ़ी है, जो पूरी तरह से 21वीं सदी में जन्मी है।       

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण मोटे तौर पर जन्म वर्ष, सामाजिक-आर्थिक घटनाओं, और सांस्कृतिक बदलावों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक पीढ़ी को उस समय की प्रमुख घटनाओं और मूल्यों के आधार पर परिभाषित किया जाता है और उसी के मुताबिक उनका नामकरण किया जाता है। बस, सोचने वाली बात यह है कि जब जेन जी दुनिया भर में ऐसा जबरदस्त हड़कंप मचाए हुए है तो जनरेशन अल्फा क्या और कितना कमाल नहीं करेगी।

और हमने नलिनी के ‘गुलाब जामुन’ खा ही लिए..!!

हिल क्वीन शिमला में आमद दर्ज कराने के बाद से ही दोस्तों/परिचितों और शुभ चिंतकों ने सुझाव देना शुरू कर दिया था कि शिमला में क्या करना है और क्या नहीं, कहां घूमना है और पता नहीं क्या क्या। खाने पीने को लेकर भी आमतौर पर सुझाव मिलते रहते हैं। सेव और ताजे पहाड़ी फलों का स्वाद लेने के साथ एक सुझाव दो तीन जगह से आया कि  शिमला में नलिनी के गुलाब जामुन जरूर खाना। अब तक तो हम नलिनी को साड़ी के मशहूर ब्रांड के तौर पर जानते थे, लेकिन गुलाब जामुन का ब्रांड..!!


 गुलाब जामुन का ज़िक्र हो और मुंह में पानी न आए,ऐसा संभव ही नहीं है। यह छोटा-सा सुनहरा गोला अपने अंदर स्वाद और नफासत का पूरा रुतबा समेटे है। यह न केवल स्वाद की दुनिया का कोहिनूर है, बल्कि भारतीय पर्वों, घरेलू आयोजनों और शादी ब्याह जैसे आयोजनों का अनिवार्य हिस्सा भी है इसलिए, सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर्स की मीठे से परहेज करने की तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए हम नलिनी तक पहुंच ही गए।

 

माना जाता है कि गुलाब जामुन की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप में खोया और चाशनी की परंपरा में पगी और बढ़ी हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह मिठाई मध्यकालीन भारत में फारस से आई थी और मुगल काल में गुलाब जल और केसर के उपयोग ने इसे और लज़ीज़ बना दिया। 


खैर, अपने को इतिहास से ज्यादा इसके स्वाद से सरोकार था इसलिए इतिहास में ज्यादा सिर नहीं खपाया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नरम,मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला गुलाब जामुन बनाना वाकई एक कला है, जिसमें मीठे से धैर्य और खोया जैसे मुलायम प्यार के बीच संतुलन की जरूरत होती है। इनके बीच सौ फीसद तालमेल से ही बनता है अतुलनीय स्वाद से भरा गुलाब जामुन..एकदम नरम, रसीला और हर टुकड़े में मिठास एवं स्वाद का संसार समेटे हुए ।


स्वाद के ऐसे ही सपने संजोए हम भी पहुंच गए शिमला में मॉल रोड स्थित नलिनी के पास। यदि आप रिज से लिफ्ट की ओर जाएंगे तो आपके बाएं हाथ पर और लिफ्ट से चर्च की ओर आयेंगे तो दाहिने हाथ पर खुशबू बिखेरती यह दुकान मिल जाएगी। वैसे, हमारे यहां गुलाब जामुन को रंग रूप एवं आकार प्रकार के कारण काला जामुन, लाल मोहन, मावा बाटी, बंगाली में पंतुआ, कहीं खीर मोहन तो कहीं रसगुल्ला जैसे कई नामों से जाना जाता है। दरअसल उत्तर भारत में आम बोलचाल में गुलाब जामुन अपने ठंडे और श्वेत वर्णी बिरादर रसगुल्ला के नाम से मशहूर हैं… आखिर है तो यह भी रस का गोला, भले ही सांवला सलोना है।


अब गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। दीवाली हो, राखी हो, जन्मदिन या शादी का भोज, खाने पीने की सूची में गुलाब जामुन का स्थान अडिग है। जब इसे गर्म परोसा जाता है तो यह जीभ पर मिठास बिखेरता हुआ होले से पिघल सा जाता है और ठंडा खाएं तो चाशनी की मिठास तालू पर रच-बस जाती है। आजकल पार्टियों में इनकी जोड़ी वनीला आइसक्रीम के साथ भी खूब जम रही है जो ठंडे और गर्म के सम्मिश्रण से अलग स्वाद रचता है।


नलिनी पर गुलाब जामुन का स्वाद और आकार तो बेजोड़ है ही, मूल्य की भी अलग कहानी है। यदि आप नलिनी के काउंटर पर ही खड़े होकर गुलाब जामुन खाते हैं तो यह 50 रुपए में मिल जाता है लेकिन यदि आप इनके रेस्तरां में बैठकर सुकून से कतरा कतरा इसका स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको 80 रुपए चुकाने पड़ते हैं। हालांकि हमें तो काउंटर पर खाना ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि आप मॉल रोड की ठंडी बयार के बीच गरमागरम गुलाब जामुन का आनंद ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं। इस रसीले जादूगर का जादू अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा है बल्कि यह अब वैश्विक मंच पर भी पहचान बना रहा है। अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक और ब्रिटेन से लेकर कनाडा तक यह भारतीय रेस्तरां से लेकर मिठाई की दुकानों तक, लोकप्रियता का नया मुकाम बना रहा है। 


कुल मिलाकर गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि खुशियों का प्रतीक है। शायद, सबसे तेजी से डोपामिन भी यही बढ़ाता होगा। इसका हर टुकड़ा आपको प्यार भरे स्वाद, मिठास की परंपरा और उत्सव की याद दिलाता है। चाहे आप इसे नलिनी जैसी आपके शहर की किसी भी मशहूर मिठाई की दुकान से खरीदें या घर पर बनाएं, इसका स्वाद हमेशा मन को मिठास से भर देता है। 


तो अगली बार जब आप कहीं भी गुलाब जामुन के स्वाद का आनंद लें और वह आपको अच्छा लगे तो इसके पीछे की कहानी और कारीगरी को भी जानने का प्रयास करिए ताकि गुलाब जामुन की मिठास की स्मृतियां जीभ भर के लिए नहीं, दिल और दिमाग के लिए भी अमिट हो जाएं ।


सोमवार, 8 सितंबर 2025

देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!!

देवभूमि में डायनों का क्या काम? तो फिर हिमाचल में इन दिनों डायन या चुड़ैल क्यों नाच रही हैं ? और ऐसा क्या है कि आम लोग भी उनका रंग रूप धरकर नाचने गाने में मशगूल है? क्यों महिलाएं घर में बैठकर कभी डायन की नाक तो कभी हाथ पैर काट रही है ? और डायनों के इतने खुले प्रदर्शन के बाद भी देवता क्यों चुप है? आप भी यह सब सवाल पढ़कर चौंक रहे होंगे और अचरज में पड़ना लाजमी भी है क्योंकि देवभूमि हिमाचल प्रदेश में जहां पग पग पर देवताओं का वास है ऐसे में किसी भी बुरी आत्मा की मौजूदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या पर करीब दो दिन तक राज्य के कई इलाकों में कथित तौर पर डायनों का बोलबाला रहता है।कहीं यह स्थिति जन्माष्टमी के हफ्ते भर बाद बनती है तो कहीं रक्षाबंधन के पखवाड़े भर बाद।  

दरअसल,हिमाचल प्रदेश की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ साथ समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। यहां के पर्व, मेलों और परंपराओं में पहाड़ के लोगों की आस्था, डर, विश्वास और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं लोकपर्वों में से एक है डगैली पर्व, जो इन दिनों मनाया जाता है। इसे डगयाली, दगाली, अघोरा चतुर्दर्शी, कुशाग्रहणी अमावस्या और डायनों का पर्व जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है। 

हम इसे हिमाचल का हैलोवीन भी कह सकते हैं। मेक्सिको का डिया डे लॉस मुर्टोस भी कुछ इसी तरह का पर्व है।  हम यह पर्व सीधे-सीधे उन कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा है जिनमें डायन का जिक्र आता है। लोकमान्यता के अनुसार डायन बुरी शक्तियों का प्रतीक होती है, और डगैली पर्व उसी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाने का सामूहिक प्रयास है। 

 डगैली पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह पर्व सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं। 

धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है।  जानकारों के अनुसार डगैली शब्द का संबंध डग यानी चलने या घूमने से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की रात डायनें गांव में डग भरती हैं और लोग सामूहिक नृत्य-गीतों के जरिए उन्हें भगाते हैं। 

डगैली पर्व में डायन का रूप धारण करने के लिए चेहरे पर कालिख लगाई जाती है और डरावने मुखौटे पहने जाते हैं। कांगड़ा और मंडी क्षेत्र में इसे मुखौटों के साथ तो कुल्लू और चंबा में यह लोकगीत और घर-घर टोली जाने की परंपरा के साथ मनाया जाता है। 

यह पर्व शिमला, सिरमौर और सोलन जैसे शहरी जिलों में भी मनाया जाता है। लद्दाख़, नेपाल और सिक्किम में भी इसतरह के आयोजन होते हैं।   आजकल कुछ जगहों पर प्रतीकात्मक रूप से डायन का पुतला भी जलाया जाता है। 

डगैली पर्व में गाए जाने वाले गीतों में अक्सर डायन के स्वभाव, उसकी शरारतों और उससे मुक्ति पाने के उपायों का जिक्र होता है। यह कुछ कुछ मैदानी इलाकों में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन बुराई के प्रतीक चुगलखोर की पिटाई जैसा पर्व है। यहां भी डायन या बुराई से बचने के लिए दरवाजों पर कांटे लगाए जाते हैं,हाथ में मंत्र शक्ति वाले कलावे या रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।  

डगैली पर्व का असली महत्व इसकी सामूहिकता है। पूरा गांव एक साथ मिलकर नृत्य करता है, गीत गाता है और भोज का आनंद उठाता है। इससे लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत होती है। वहीं,धार्मिक दृष्टि से देखें तो डगैली पर्व गांव को बुरी शक्तियों से बचाने का सामूहिक प्रयास है। 

सौम्य सूरज का मतवाला अंदाज़

लगातार कई दिन की घनघोर और तबाही भरी बारिश के बाद शिमला में आज शाम को सूरज ने बादलों का सीना चीरकर अपनी आमद दर्ज करा ही दी। 

जब देशभर में सूरज ढल रहा हो तब पहाड़ों की रानी के माथे पर सूरज निकलना प्रकृति का जादू ही है।  बादलों और बूंदों में जकड़े पहाड़ भी सूरज की शह पाकर जकड़न को तोड़कर चमक उठे। 

सूरज की किरणें अपनी सुनहरी तूलिका से पाइन और देवदार के पेड़ों के साथ साथ लाल हरी छतों पर हल्के-हल्के रंग बिखेर रहीं हैं। गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में तैर रही है, और कोहरे की पतली चादर धीरे-धीरे हट रही है, मानो सूरज के स्वागत में रास्ता दे रही हो।

 कई दिन बाद सूरज भी पूरी सौम्यता से बादल और बूंदों के रथ पर सवार मतवाला होकर अपने प्रिय पहाड़ों से मिलने आ गया है।

पेड़ों की पत्तियों पर कब्जा जमाए बूंदों की लड़ियां भी चमकने लगी हैं जैसे सूरज के स्वागत में वंदनवार सज गए हो । रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर खड़े होकर देखो, तो लगता है सूरज ने बादलों के साथ लुकाछिपी का खेल खत्म कर दिया है। 

कल तक बारिश की मोटी और ढीठ बूंदे में छिपी दूर हिमालय की चोटियाँ अब सुनहरे और गुलाबी रंग में नहाई दिखती हैं। सूरज के करीब कुछ चोटियों ने तो स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है जैसे अब सूरज के साथ उनकी सत्ता लौट आई है। 

चाय की दुकानों से उठती अदरक इलायची की भाप के बीच चुस्कियां लेते हुए स्थानीय लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं- "सूरज निकला, अब शिमला की रौनक लौट आएगी!"

यह नजारा सिर्फ़ आँखों का सुख नहीं, बल्कि आत्मा को ताज़गी देने वाला अनुभव है—जैसे शिमला ने बारिश की थकान उतारकर सूरज को गर्मजोशी से गले लगा लिया हो।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...